गाजीपुर में सिर्फ बीस रुपये में मिलता है उड़द और चने की दाल से तैयार यह पारंपरिक व्यंजन गाजीपुर के सिंचाई विभाग फूड मार्केट में पिछले तीन-चार दशकों से बफ़्फोरी परोसी जा रही है। उड़द और चने की दाल से बनने वाली यह पौष्टिक डिश आज भी बेहद कम कीमत पर उपलब्ध है। फास्ट फूड और आधुनिक व्यंजनों के इस दौर में गाजीपुर के सिंचाई विभाग फूड मार्केट का एक खास कोना अपनी पुरानी तहजीब और स्वाद को जिंदा रखे हुए है। यहां मिलने वाली बफ़्फोरी, जिसे कई लोग भभौरी भी कहते हैं, पिछले तीन-चार दशकों से स्थानीय लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय बनी हुई है। हालांकि नई पीढ़ी इस पारंपरिक जायके से काफी हद तक दूर हो चुकी है, लेकिन बुजुर्गों और पुराने शहरवासियों के दिलों में इसका स्थान आज भी पूरी तरह सुरक्षित है और इसे खाने के लिए दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं। यह पुश्तैनी जायका संदीप गुप्ता द्वारा पिछले तीस-पचास सालों से पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। इस अनोखी रेसिपी के इतिहास के बारे में संदीप बताते हैं कि यह कोई नई शुरुआत नहीं है बल्कि उनके दादा और बाबा के जमाने से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है। इसे तैयार करने के लिए सबसे पहले उड़द और चने की दाल को पानी में भिगोया जाता है, जिसके बाद इसमें अदरक, लहसुन और कुछ खास मसालों का मिश्रण मिलाया जाता है। इस व्यंजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके पकौड़ों या वड़ों को कड़ाही के खौलते तेल में डीप फ्राई करने के बजाय पारंपरिक शैली में पकाया जाता है। इसके अलावा इसकी एक बेहद स्वादिष्ट मसालेदार ग्रेवी भी तैयार की जाती है जिसमें प्याज, लहसुन और अदरक का तड़का लगाया जाता है। पूरी पकाने की यह प्रक्रिया महज तीस मिनट के भीतर पूरी हो जाती है और वेंडर इसे केवल बीस रुपये में दो पीस के हिसाब से बेचते हैं। खान-पान की बदलती आदतों और जीवनशैली के कारण इस पारंपरिक व्यंजन की मांग पर गहरा असर पड़ा है। इस बारे में वेंडर संदीप का कहना है कि एक दौर ऐसा भी था जब उनके स्टॉल पर रोजाना तीन सौ से चार सौ प्लेट बफ़्फोरी बिक जाती थी, लेकिन अब ग्राहकों की यह संख्या घटकर मात्र पचास से साठ पीस तक सिमट कर रह गई है। उनके अनुसार अब इसे मुख्य रूप से उम्रदराज लोग ही चाव से खाना पसंद करते हैं क्योंकि युवा पीढ़ी इस अनोखे स्वाद और नाम से लगभग अनजान होती जा रही है। आज के समय में जब लोग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होकर फैट-फ्री और हेल्दी डाइट की तलाश करते हैं, तब बफौरी जैसी पारंपरिक रेसिपी अपनी बेहतरीन न्यूट्रिशनल वैल्यू पर पूरी तरह खरी उतरती है। इसे खाने के लिए वहां पहुंची पैंतीस-छत्तीस वर्षीय नीतू कुमारी बताती हैं कि वह बचपन से इस स्वाद का आनंद लेती आ रही हैं। नीतू कहती हैं, उड़द और चने की दाल से तैयार होने के कारण यह प्रोटीन का बेहतरीन स्रोत है और इसमें अत्यधिक तेल या हानिकारक मसालों का प्रयोग नहीं होता जो पेट और सेहत दोनों के लिए बेहद हल्की और फायदेमंद साबित होती है। इसका आप पर असर यह स्थानीय खान-पान और पारंपरिक व्यंजनों से जुड़ी खबर है जिसका कोई प्रत्यक्ष आर्थिक या व्यापक नीतिगत असर आम पाठकों पर नहीं पड़ता है। • उत्तर प्रदेश में: गाजीपुर या आसपास के जिलों के स्थानीय निवासी और पारंपरिक खान-पान के शौकीन लोग इस किफायती और पौष्टिक डिश का आनंद मात्र बीस रुपये में ले सकते हैं। • अन्य क्षेत्रों में: देश के बाकी हिस्सों में रहने वाले सामान्य पाठकों के दैनिक जीवन, वित्त या यात्रा योजनाओं पर इस स्थानीय स्ट्रीट फूड की उपलब्धता का कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा। ऐसा क्यों हुआ यह पारंपरिक व्यंजन पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक पाक कला और स्थानीय खान-पान की आदतों का परिणाम है। समय के साथ आधुनिक फास्ट फूड के प्रसार और नई पीढ़ी की प्राथमिकताओं में बदलाव के कारण ऐसे पारंपरिक व्यंजनों की मांग में कमी आई है। • पुश्तैनी परंपरा: यह रेसिपी विक्रेताओं के दादा-परदादा के जमाने से चली आ रही है जिसे आज भी पुराने तरीकों से तैयार किया जाता है। • खान-पान में बदलाव: आधुनिक समय में पिज्जा और मोमोज जैसे फास्ट फूड के चलन बढ़ने से युवा पीढ़ी इस तरह के पारंपरिक और देसी जायकों से दूर होती गई है। सवाल-जवाब 1. गाजीपुर में बफौरी कहां मिलती है? यह गाजीपुर के सिंचाई विभाग फूड मार्केट के एक नुक्कड़ पर मिलती है। 2. बफौरी को बनाने में किन मुख्य चीजों का इस्तेमाल होता है? इसे उड़द और चने की दाल को भिगोकर अदरक, लहसुन और चुनिंदा मसालों के साथ तैयार किया जाता है। 3. बफौरी की कीमत कितनी है? संदीप गुप्ता इसे मात्र बीस रुपये में दो पीस के हिसाब से बेचते हैं। 4. इस पारंपरिक डिश को कौन बेचता है? इसे पिछले तीस-चालीस सालों से स्ट्रीट वेंडर संदीप गुप्ता बेच रहे हैं। https://trendkia.com/food/gajipura-men-sirpha-bisa-rupaye-men-milata-hai-urada-aura-chane-ki-dala-se-taiyara-yaha-parnparika-vynjana-58127 TrendKia — Har trend, sabse pehle.