जमशेदपुर में मिट्टी के चूल्हे और कोयले की आंच पर सिकता है अनोखा डोसा, सखुआ के पत्तों पर परोसने की पुरानी परंपरा जमशेदपुर के काशीडीह में नरसिम्हा राव मिट्टी के चूल्हे और कोयले पर पारंपरिक डोसा तैयार करते हैं, जिसे चुकंदर और गाजर के मसाले के साथ सखुआ के पत्तों पर सिर्फ 40 रुपये में परोसा जाता है। झारखंड के औद्योगिक शहर जमशेदपुर में दक्षिण भारतीय व्यंजनों के प्रति लोगों की दीवानगी किसी से छिपी नहीं है। सुबह के नाश्ते में इडली और डोसा यहां की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन काशीडीह इलाके में नाश्ता करने का अनुभव पूरी तरह अलग है। काशीडीह गुरुद्वारा के ठीक बगल में स्थित एक छोटी सी दुकान में आज के आधुनिक दौर में भी भोजन पकाने के सबसे पुराने तरीकों को सहेज कर रखा गया है। यहां गैस सिलिंडर या आधुनिक बर्नर के बजाय पारंपरिक मिट्टी के चूल्हे और कोयले की धीमी आंच पर कुरकुरा डोसा सेका जाता है, जिसकी सौंधी खुशबू सुबह से ही राहगीरों को अपनी तरफ खींच लेती है। सुबह छह बजे से शुरू हो जाती है तैयारी इस दुकान को चलाने वाले नरसिम्हा राव हर रोज सुबह ठीक 6 बजे अपनी दुकान पर पहुंच जाते हैं। दुकान खोलते ही सबसे पहले मिट्टी के चूल्हे में कोयला सुलगाया जाता है और डोसा बनाने का तवा चढ़ाया जाता है। सुबह की शुरुआत होते ही यहां नाश्ता करने वालों का तांता लगना शुरू हो जाता है। जहां अधिकांश दुकानों और होटलों में समय बचाने के लिए गैस चूल्हों या ऑटोमैटिक तवों का इस्तेमाल होता है, वहीं नरसिम्हा राव का यह पारंपरिक तरीका उनके काम को बाकी सभी से पूरी तरह जुदा बना देता है। भट्टी से उठती सौंधी महक और तवे की छनछनाहट दूर से ही लोगों को आकर्षित करती है, जिसके चलते लोग सुबह की सैर के बाद सीधे यहीं पहुंचते हैं। कोयले की धीमी आंच और कुरकुरा स्वाद पारंपरिक तरीके से खाना पकाने के अपने इस हुनर को लेकर नरसिम्हा राव का मानना है कि कोयले की अंगीठी पर बने डोसे का स्वाद गैस पर बने डोसे के मुकाबले कहीं ज्यादा लाजवाब होता है। कोयले की आंच तवे पर एक समान फैलती है, जिससे घोल बेहद सलीके से पकता है और डोसा बाहर से बहुत ज्यादा कुरकुरा बनता है। हालांकि मिट्टी के चूल्हे और कोयले पर पका भोजन अपने आप में सेहत के लिए कोई अतिरिक्त फायदेमंद साबित हो ऐसा आवश्यक नहीं है, फिर भी स्वाद के शौकीनों को यह पारंपरिक देसी अंदाज और इसका खास जायका बेहद पसंद आता है। सब्जियों से भरपूर आलू का अनोखा मसाला स्वाद के अलावा इस डोसे की भरावन भी अपने आप में काफी अनूठी है। सामान्य दुकानों पर डोसे के अंदर केवल उबले आलू और हल्के मसालों का मिश्रण दिया जाता है, लेकिन यहां आलू के साथ गाजर और कद्दूकस किया हुआ चुकंदर भी प्रचुर मात्रा में मिलाया जाता है। इन रंग-बिरंगी सब्जियों के चलते भरावन का स्वाद चटपटा और अलग बन जाता है। गर्म और बेहद कुरकुरे डोसे के भीतर इन सब्जियों का यह मेल हर निवाले को खास बना देता है, जिस वजह से इलाके के नियमित ग्राहक सुबह का नाश्ता करने के लिए हमेशा इसी ठिकाने को प्राथमिकता देते हैं। सखुआ के पत्तों पर परोसने का सादगी भरा अंदाज इस पारंपरिक नाश्ते की लोकप्रियता की एक और बड़ी वजह इसका बेहद किफायती होना है। नरसिम्हा राव अपनी दुकान पर यह डोसा महज 40 रुपये में उपलब्ध कराते हैं। आधुनिक प्लास्टिक की प्लेटों या कागज के बर्तनों के बजाय इस डोसे को सखुआ के पत्तों पर परोसा जाता है। जंगल की पत्तियों से बनी यह प्राकृतिक पत्तल न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि भोजन के पारंपरिक अनुभव को और भी समृद्ध बना देती है। मिट्टी का चूल्हा, कोयले का धीमा ताप, पौष्टिक सब्जियों वाला मसाला और सखुआ के पत्तों की सादगी मिलकर इस दुकान को जमशेदपुर के खानपान का एक बेहद खास केंद्र बनाते हैं। इसका आप पर असर पारंपरिक तरीके से बने इस सस्ते और स्थानीय नाश्ते से शहरवासियों को किफायती और प्लास्टिक मुक्त खानपान का विकल्प मिलता है। • जमशेदपुर में: काशीडीह गुरुद्वारा के पास रहने वाले और सुबह की सैर पर निकलने वाले लोगों को महज 40 रुपये में ताजी सब्जियों से भरपूर गर्म नाश्ता मिल जाता है। सखुआ के पत्तों पर खाना मिलने से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले डिस्पोजल कचरे से भी राहत मिलती है। • भारत भर में: छोटे स्तर पर पारंपरिक चूल्हे और पत्तलों का यह प्रयोग दिखाता है कि आधुनिक तकनीक के बिना भी स्थानीय खानपान को लोकप्रिय रखा जा सकता है। यह सड़क किनारे लगने वाली दुकानों के लिए बिना प्लास्टिक कचरा बढ़ाए काम करने का एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है। • नाश्ते के बजट पर: महंगाई के दौर में भी भरपेट पौष्टिक नाश्ता आम नागरिक के बजट में आसानी से समा जाता है। कम लागत में गाजर और चुकंदर जैसी सब्जियों से युक्त भोजन मिलना रोजमर्रा के खर्च को नियंत्रित रखने में मदद करता है। • खानपान की आदतों पर: आधुनिक फास्ट फूड के मुकाबले पत्तल और कोयले की आंच पर बना सादा भोजन लोगों को पारंपरिक भारतीय स्वाद से जोड़े रखता है। इससे स्थानीय बाजारों में सखुआ के पत्तों जैसी प्राकृतिक चीजों की मांग भी बनी रहती है। ऐसा क्यों हुआ गैस सिलेंडरों के सामान्य चलन के बावजूद कोयले और मिट्टी के चूल्हे का उपयोग करने का मुख्य कारण भोजन का खास स्वाद और पुरानी परंपरा को बचाए रखना है। • धीमी आंच का विशेष प्रभाव: कोयले की भट्टी तवे को एक बराबर और स्थायी तापमान देती है, जो गैस बर्नर की तेज लौ से संभव नहीं होता। इसी स्थिर ताप की वजह से डोसा बिना जले चारों तरफ से एक समान रूप से सुनहरा और कुरकुरा सिक पाता है। • पारंपरिक स्वाद की निरंतर मांग: काशीडीह क्षेत्र के स्थानीय ग्राहक वर्षों से इस सौंधेपन और अनोखे जायके के आदी हो चुके हैं। नरसिम्हा राव ने आधुनिक मशीनों के बजाए पुरानी पद्धति को इसलिए जारी रखा क्योंकि ग्राहक इसी खास स्वाद के लिए उनकी दुकान पर आते हैं। • सब्जियों और पत्तलों की परंपरा: आलू के साथ गाजर और चुकंदर मिलाने तथा सखुआ पत्तल पर परोसने की शुरुआत सादगी और बेहतर अनुभव देने के लिए की गई थी। पर्यावरण के अनुकूल पत्तलें सस्ती भी पड़ती हैं और पारंपरिक खानपान के अनुभव को पूरी तरह जीवंत बनाए रखती हैं। सवाल-जवाब 1. जमशेदपुर में यह अनोखी डोसा दुकान कहां स्थित है? यह दुकान जमशेदपुर के काशीडीह में स्थित काशीडीह गुरुद्वारा के ठीक बगल में मौजूद है। 2. इस दुकान पर डोसा बनाने के लिए किस साधन का उपयोग किया जाता है? दुकानदार नरसिम्हा राव गैस के बजाय मिट्टी के चूल्हे और कोयले की आंच पर डोसा तैयार करते हैं। 3. इस डोसे के अंदर किस प्रकार की भरावन भरी जाती है? इसके अंदर उबले आलू के साथ प्रचुर मात्रा में गाजर और चुकंदर की मसालेदार भरावन डाली जाती है। 4. दुकान खुलने का समय क्या है और डोसे की कीमत कितनी है? नरसिम्हा राव सुबह 6 बजे दुकान पर तैयारी शुरू करते हैं और यहां एक डोसा 40 रुपये में मिलता है। 5. डोसा किस बर्तन या प्लेट में परोसा जाता है? यहां डोसा किसी प्लास्टिक या सामान्य प्लेट के स्थान पर सखुआ के पत्तों से बनी पारंपरिक पत्तल पर परोसा जाता है। 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