# झारखंड के देवघर में पांच दशकों से महक रहा 1970 वाला चोप, सरसों तेल और घरेलू मसालों का देसी स्वाद

> देवघर के सत्संग नगर में 1970 से चल रही एक छोटी सी दुकान पर मिलने वाले देसी चोप, बैगनी और प्याजी का स्वाद आज भी लोगों को कई किलोमीटर दूर से खींच लाता है।

**Type:** article · **Category:** खानपान · **Published:** 2026-09-27 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/food/jharkhand-ke-deoghar-men-pancha-dashakon-se-mahaka-raha-1970-vala-chopa-sarason-tela-aura-gharelu-masalon-ka-desi-svada-39263 · **Language:** Hindi
**Tags:** देवघर, बाबा बैद्यनाथ, सत्संग नगर, स्ट्रीट फूड, आलू चोप, झारखंड पर्यटन, देसी खानपान

झारखंड राज्य का देवघर जिला देशभर में अपनी गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए प्रसिद्ध है। यहां बारह प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में शामिल बाबा बैद्यनाथ का पावन धाम स्थित है, जिसके दर्शन पूजन के लिए पूरे भारत से श्रद्धालु साल भर पहुंचते रहते हैं। लेकिन देवघर की यह शोहरत सिर्फ देवालयों और आध्यात्मिक वातावरण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां की गलियों में बसने वाली खान-पान की परंपरा भी बेहद अनूठी है। शहर के अलग-अलग कोनों में मिलने वाले खास पराठे, बेल का मुरब्बा और तरह-तरह के पारंपरिक नमकीन व्यंजन खाने के शौकीनों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। तीर्थाटन के साथ-साथ स्थानीय देसी व्यंजनों का जायका लेना यहां आने वाले लोगों की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुका है। इसी कड़ी में सत्संग नगर इलाके में मिलने वाला स्वादिष्ट चोप और पकौड़ी दशकों से लोगों के बीच विशेष चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

## सत्संग नगर की पुरानी दुकान और शाम की रौनक
सत्संग नगर क्षेत्र में स्थित यह छोटी सी दुकान बाहर से बेहद साधारण नजर आती है, लेकिन इसके पकौड़ों और नमकीन का स्वाद बहुत दूर-दूर तक अपनी पहचान बना चुका है। सूरज ढलने और शाम घिरने के साथ ही यहां गरमा-गरम चटपटे स्नैक्स खाने वालों का जमावड़ा लगना शुरू हो जाता है। कोई पारंपरिक आलू चोप की तलाश में यहां आता है, तो कई लोग कुरकुरी बैगनी और प्याजी का लुत्फ उठाने पहुंचते हैं। लोहे की बड़ी कढ़ाई में खौलते तेल के बीच से एक के बाद एक ताजा पकौड़े छनकर बाहर आते रहते हैं और खरीदार अपनी पसंद के अनुसार पत्तों या दोनों में इन्हें लेकर चाव से खाते हैं। ग्राहकों की लगातार कतार इस बात की गवाही देती है कि पचास से अधिक सालों बाद भी इस जायके का जादू बरकरार है।

## 1970 से जारी पारिवारिक परंपरा और शुद्ध सरसों तेल का उपयोग
इस प्रतिष्ठान की सबसे प्रमुख खासियत इसका पकाने का पारंपरिक माध्यम और पुरानी रेसिपी है। दुकान के वर्तमान संचालक प्रांजल कुमार बताते हैं कि इस काम की शुरुआत उनके पिता ने लगभग 1970 के आसपास की थी। उस दौर से लेकर आज तक पकौड़े तलने की प्रक्रिया और स्वाद के मूल स्वरूप में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है। आज प्रांजल कुमार दूसरी पीढ़ी के रूप में इस खानदानी कारोबार को आगे बढ़ा रहे हैं। इस तरह करीब आधी सदी यानी पांच दशकों से भी ज्यादा समय से यह दुकान देवघर के निवासियों और यात्रियों की जुबान पर अपनी अमिट छाप छोड़ रही है। यहां सभी पकौड़े विशुद्ध सरसों के तेल में तले जाते हैं, जिससे निकलने वाली सोंधी महक दूर से ही राहगीरों को अपनी तरफ खींच लेती है।

## बाजार के बदले घर में कुटे मसालों का जादू
आधुनिक समय में जहां अधिकांश दुकानों पर रेडीमेड या पैकेटबंद मसालों का चलन बढ़ चुका है, वहीं प्रांजल कुमार की दुकान पर पुरानी रवायत का ही पालन किया जाता है। दुकान में परोसे जाने वाले चोप, बैगनी और प्याजी में इस्तेमाल होने वाले तमाम मसाले सीधे बाजार से तैयार किए हुए नहीं खरीदे जाते, बल्कि उन्हें परिवार की देखरेख में घर पर ही कूट-पीसकर तैयार किया जाता है। यही घरेलू मसाला मिश्रण इन पकौड़ों को एक ऐसा विशिष्ट स्वाद और तीखापन देता है जो बाजार की सामान्य दुकानों पर मिलना नामुमकिन है। इसके अलावा बैंगन की पतली परतों से बनने वाली बैगनी और कटे प्याज के लच्छों से तैयार होने वाली प्याजी का कुरकुरापन लोगों को सादे बेसन के पारंपरिक नाश्ते का असली अहसास कराता है।

## दूर-दराज से खिंचे चले आते हैं कद्रदान
दुकान पर आने वाले पुराने और नए ग्राहकों का मानना है कि यहां का चोप चखते ही गुजरे जमाने के देसीपन की याद ताजा हो जाती है। घर के पिसे मसाले, सरसों तेल का तीखापन और गर्मागर्म तले जाने का मेल इसे पूरे शहर में सबसे जुदा बनाता है। आसपास अन्य कई विकल्प मौजूद होने के बावजूद इस ठिकाने पर ग्राहकों का तांता कभी कम नहीं होता। नियमित ग्राहक गगन कुमार का कहना है कि उन्हें इस दुकान के नमकीन इतने प्रिय हैं कि वे केवल इनका स्वाद लेने के लिए करीब 25 किलोमीटर की दूरी तय करके यहां पहुंचते हैं। उनके अनुसार आसपास खाने की कई दुकानें हैं, लेकिन ऐसा स्वाद अन्यत्र दुर्लभ है। वहीं सत्यम नामक एक अन्य ग्राहक ने बताया कि स्वाद के साथ-साथ यहां साफ-सफाई और शुद्धता पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है, जिससे खाने वालों का भरोसा और गहरा हो जाता है।

## इसका आप पर असर
देवघर जाने वाले तीर्थयात्रियों और स्थानीय भोजन प्रेमियों के लिए यह खबर पारंपरिक खान-पान की विश्वसनीय पहचान कराती है।

- **पर्यटकों के लिए:** यदि आप बाबा बैद्यनाथ मंदिर के दर्शन करने देवघर पहुंचे हैं, तो शाम के समय सत्संग नगर जाकर 1970 के दौर के पारंपरिक और सस्ते देसी नाश्ते का स्वाद ले सकते हैं।
- **खानपान के शौकीनों के लिए:** बाजार के मिलावटी तेल और रेडीमेड मसालों से बचते हुए शुद्ध सरसों तेल व घर पर तैयार मसालों से बने नमकीन का प्रामाणिक अनुभव प्राप्त किया जा सकता है।
- **स्थानीय अर्थव्यवस्था:** पांच दशकों से टिके ऐसे छोटे पारिवारिक उद्यम यह साबित करते हैं कि पारंपरिक स्वाद को बनाए रखकर दशकों तक ग्राहकों का विश्वास अर्जित किया जा सकता है।
- **यात्रा योजना:** देवघर के प्रसिद्ध पेड़े और बेल के मुरब्बे के साथ-साथ अब पर्यटक अपनी यात्रा सूची में सत्संग नगर के इस ऐतिहासिक स्ट्रीट फूड स्टॉप को भी शामिल कर सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
सत्संग नगर की इस दुकान की पचास वर्षों से अधिक समय तक लगातार सफलता के पीछे पारिवारिक अनुशासन, अपरिवर्तित नुस्खे और गुणवत्ता के प्रति निष्ठा मुख्य कारण हैं।

- **पारंपरिक रेसिपी का संरक्षण:** वर्ष 1970 में संस्थापक पिता द्वारा शुरू किए गए नुस्खे को दूसरी पीढ़ी के संचालक प्रांजल कुमार ने बिना किसी आधुनिक मिलावट के जस का तस बनाए रखा है।
- **घर के बने मसालों का इस्तेमाल:** दुकान में बाजार के रेडीमेड पाउच वाले मसालों के बजाय घर में तैयार किए गए साबुत मसालों का उपयोग किया जाता है, जो इसे विशिष्ट स्वाद देता है।
- **कच्ची घानी सरसों तेल का चुनाव:** पकौड़ों को तलने के लिए रिफाइंड तेल के बजाय शुद्ध सरसों तेल का उपयोग किया जाता है, जो पारंपरिक बिहारी और झारखंडी स्वाद की मुख्य पहचान है।
- **शुद्धता और सफाई का भरोसा:** ग्राहकों के अनुसार नियमित साफ-सफाई और ताजा तलकर परोसने की आदत ने दशकों से ग्राहकों का अटूट भरोसा कायम रखा है।

## सवाल-जवाब

### 1. देवघर की यह प्रसिद्ध चोप दुकान कहां स्थित है?
यह दुकान झारखंड के देवघर जिले के सत्संग नगर इलाके में स्थित है।

### 2. इस दुकान की शुरुआत कब और किसने की थी?
इस दुकान की शुरुआत वर्तमान संचालक प्रांजल कुमार के पिता ने करीब 1970 में की थी।

### 3. यहां पकौड़े बनाने के लिए किस तेल का उपयोग किया जाता है?
दुकान पर सभी पकौड़े और चोप शुद्ध सरसों के तेल में तले जाते हैं।

### 4. इस दुकान के मेनू में कौन-कौन से प्रमुख व्यंजन शामिल हैं?
यहां का आलू चोप, बैंगन से बनी बैगनी और प्याज से तैयार की जाने वाली प्याजी ग्राहकों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं।

### 5. दुकान के स्वाद को अन्य जगहों से अलग क्या बनाता है?
बाजार के मसालों के बदले घर में तैयार किए गए विशेष मसाले और सरसों तेल का उपयोग इसके स्वाद को अनोखा बनाता है।

### 6. क्या इस दुकान पर दूर से भी ग्राहक आते हैं?
जी हां, नियमित ग्राहक गगन कुमार के अनुसार वे केवल इस खास चोप का स्वाद लेने 25 किलोमीटर दूर से भी आते हैं।

## प्रेरणा और सबक
प्रांजल कुमार और उनके परिवार की यह यात्रा दिखाती है कि सादगी, गुणवत्ता और अपनी जड़ों से जुड़ाव किसी भी छोटे उद्यम को आधी सदी तक कामयाब रख सकता है।

- **विरासत का सम्मान:** नई पीढ़ी ने पुरानी दुकान के तौर-तरीकों को खारिज करने के बजाय पिता द्वारा 1970 में शुरू की गई परंपरा को गर्व के साथ आगे बढ़ाया।
- **गुणवत्ता से समझौता न करना:** मुनाफे की होड़ में बाजार के सस्ते रेडीमेड मसालों को अपनाने के बजाय घर के बने मसालों की मेहनत को प्राथमिकता दी गई।
- **ग्राहकों के साथ गहरा संबंध:** शुद्धता और प्रामाणिक स्वाद की बदौलत ऐसी साख बनाई कि ग्राहक 25 किलोमीटर दूर से भी केवल एक प्लेट पकौड़े खाने खिंचे चले आते हैं।

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