झारखंड के इकलौते जीआई टैग प्राप्त उत्पाद कोडरमा कलाकंद का विशेष स्वाद और इसकी प्रामाणिक रेसिपी कोडरमा के प्रसिद्ध केसरिया कलाकंद को जीआई टैग मिलने के बाद इसकी राष्ट्रीय मांग में भारी उछाल आया है। जानिए झुमरी तिलैया की इस पारंपरिक मिठाई को बनाने का सही तरीका और इसकी खासियत। झारखंड की पारंपरिक मिठाइयों की दुनिया में कोडरमा के केसरिया कलाकंद का स्थान हमेशा से बेहद खास रहा है। हाल ही में इस प्रसिद्ध मिष्ठान को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन यानी जीआई टैग प्रदान किया गया है, जिसके बाद से पूरे देश में इसकी लोकप्रियता और मांग लगातार बढ़ रही है। उल्लेखनीय है कि झारखंड में खाद्य उत्पाद श्रेणी के अंतर्गत जीआई टैग हासिल करने वाला यह राज्य का पहला और एकमात्र उत्पाद बन चुका है। इस प्रतिष्ठित सम्मान के मिलने के बाद देश के विभिन्न राज्यों से लोग न केवल इस पारंपरिक मिठाई का स्वाद चखने के लिए उत्साहित हैं, बल्कि इसकी पारंपरिक निर्माण विधि को समझने में भी गहरी रुचि दिखा रहे हैं। जो लोग दूर-दराज के क्षेत्रों में रहते हैं और सीधे कोडरमा नहीं पहुंच पा रहे हैं, वे इस अनोखी मिठाई को अपने घर पर तैयार करने के तरीके खोज रहे हैं। इसी संदर्भ में झुमरी तिलैया के प्रसिद्ध मिठाई प्रतिष्ठान स्वीट संगम के संचालक राजू मोदी ने इस जीआई टैग प्राप्त केसरिया कलाकंद को बनाने की पूरी प्रामाणिक विधि विस्तार से साझा की है। शुद्ध भैंस के दूध से तैयार होता है असली दानेदार स्वाद मिठाई विशेषज्ञ राजू मोदी ने बताया कि असली और गुणवत्तापूर्ण कलाकंद तैयार करने के लिए भैंस का दूध सबसे उत्तम विकल्प माना जाता है। भैंस के दूध में प्राकृतिक रूप से अधिक गाढ़ापन और वसा होती है, जो कलाकंद को उसकी पहचान यानी बेहतरीन दानेदार बनावट प्रदान करती है। इसे बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत एक बड़ी कड़ाही में दूध डालकर धीमी आंच पर पकाने से होती है। पकाने के दौरान दूध को लगातार चलाना अत्यंत आवश्यक होता है ताकि वह कड़ाही के तले में चिपके नहीं और न ही उसमें जलने की गंध आए। निरंतर पकाने की यह प्रक्रिया दूध को धीरे-धीरे गाढ़ा करती है और उसका स्वाभाविक स्वाद उभारती है। केसर का समावेश और ड्राई फ्रूट्स की गार्निशिंग दूध को पकाते समय ही इसमें उचित मात्रा में केसर मिलाया जाता है। केसर मिलाने से दूध का रंग धीरे-धीरे मनमोहक केसरिया हो जाता है और उसमें एक विशिष्ट सुगंध आने लगती है। काफी समय तक धीमी आंच पर पकने के बाद जब दूध गाढ़ा होकर स्वाभाविक रूप से दानेदार रूप लेने लगता है, तब इसमें स्वादानुसार हल्की चीनी मिलाई जाती है। राजू मोदी ने स्पष्ट किया कि पारंपरिक और असली कोडरमा कलाकंद की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें दूध और चीनी के अलावा किसी भी अन्य बाहरी सामग्री या मिलावट का प्रयोग नहीं किया जाता। जब कलाकंद का मिश्रण पूरी तरह तैयार हो जाता है, तो उसे एक समतल ट्रे में समान रूप से फैला दिया जाता है। इसके बाद ऊपर से अतिरिक्त केसर छिड़की जाती है और स्वाद व आकर्षण बढ़ाने के लिए बादाम, काजू तथा पिस्ता जैसे मेवों की बारीक कटाई से गार्निशिंग की जाती है। पकाने की समयावधि और कोडरमा के पानी का अनोखा योगदान कोडरमा कलाकंद को पूरी तरह तैयार होने में आमतौर पर 50 से 55 मिनट का समय लगता है। हालांकि, दूध की कुल मात्रा और आंच की तीव्रता के आधार पर इस समय में थोड़ा बदलाव हो सकता है। राजू मोदी के अनुसार, कोडरमा के कलाकंद की अद्वितीयता सिर्फ इसकी सदियों पुरानी निर्माण विधि तक सीमित नहीं है। इसमें झुमरी तिलैया क्षेत्र के स्थानीय पानी और विशिष्ट जलवायु का भी बहुत बड़ा योगदान है। यहां के प्राकृतिक पानी के गुण इस कलाकंद को एक ऐसा अनोखा स्वाद और बनावट प्रदान करते हैं, जो देश के किसी भी अन्य हिस्से में बनने वाले कलाकंद में पाना असंभव है। जीआई टैग मिलने से कोडरमा के कलाकंद की ब्रांड वैल्यू में जबरदस्त वृद्धि हुई है, जिससे स्थानीय कारोबारियों के लिए नए बाजार के रास्ते खुले हैं और इस पारंपरिक मिष्ठान को राष्ट्रीय पहचान मिली है। इसका आप पर असर भारत में: जीआई टैग मिलने के बाद देश के मिष्ठान प्रेमियों को झारखंड की शुद्ध और प्रामाणिक पारंपरिक मिठाई के बारे में प्रामाणिक जानकारी मिली है। झारखंड और कोडरमा में: स्थानीय मिठाई कारोबारियों को राष्ट्रीय स्तर पर नया बाजार मिला है और क्षेत्र के पारंपरिक डेयरी व मिष्ठान उद्योग की ब्रांड वैल्यू में ऐतिहासिक बढ़ोतरी हुई है। सवाल-जवाब 1. कोडरमा के कलाकंद को कौन सा विशेष दर्जा मिला है? कोडरमा के केसरिया कलाकंद को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन यानी जीआई टैग मिला है। यह झारखंड का खाद्य उत्पाद श्रेणी में जीआई टैग पाने वाला एकमात्र उत्पाद है। 2. असली कलाकंद बनाने के लिए किस दूध का उपयोग सबसे अच्छा माना जाता है? स्वीट संगम के राजू मोदी के अनुसार, असली कलाकंद बनाने के लिए भैंस का दूध सबसे अच्छा होता है क्योंकि इसमें प्राकृतिक गाढ़ापन और दानेदार बनावट बेहतर बनती है। 3. कोडरमा कलाकंद में कौन-कौन सी सामग्रियां मिलाई जाती हैं? इसमें केवल भैंस का दूध, केसर और स्वादानुसार थोड़ी सी चीनी मिलाई जाती है। गार्निशिंग के लिए बादाम, काजू और पिस्ता का उपयोग किया जाता है। 4. कलाकंद को तैयार होने में कितना समय लगता है? कलाकंद को धीमी आंच पर तैयार होने में सामान्यतः 50 से 55 मिनट का समय लगता है। 5. कोडरमा के कलाकंद का स्वाद अन्य जगहों से अलग क्यों होता है? कोडरमा कलाकंद की खासियत इसकी पारंपरिक विधि के साथ-साथ झुमरी तिलैया का स्थानीय पानी और जलवायु भी है, जो इसके स्वाद को अनोखी पहचान देते हैं। प्रेरणा और सबक स्थान पहचान से ब्रांड निर्माण: स्थानीय उत्पादों की विशिष्टता को पहचान कर उसे भौगोलिक संकेत (जीआई टैग) से जोड़ना राष्ट्रीय ब्रांड बनाने में मदद करता है। सामग्री की शुद्धता बनाए रखना: बिना किसी कृत्रिम मिलावट के केवल दूध और चीनी से गुणवत्ता बनाए रखना ग्राहकों का विश्वास जीतता है। पारंपरिक विरासत का संरक्षण: पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक निर्माण विधि को सहेज कर स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती दी जा सकती है। https://trendkia.com/food/jharkhand-ke-ikalaute-gi-tag-prapta-utpada-koderma-kalakand-ka-vishesha-svada-aura-isaki-pramanika-resipi-16114 TrendKia — Har trend, sabse pehle.