करौली में पांच रुपये के गुलाब लच्छे आज भी बच्चों के बने हैं पसंदीदा, बुजुर्गों को याद दिलाते हैं बीता जमाना आधुनिक मिठाइयों के दौर में भी करौली के गुलाब लच्छे अपनी खास मिठास, अनोखी बनावट और 5 रुपये की मामूली कीमत की वजह से हर उम्र के लोगों को लुभा रहे हैं। बाजार में चॉकलेट और फैंसी कन्फेक्शनरी के बढ़ते चलन के बीच पारंपरिक भारतीय मिठास का जादू आज भी फीका नहीं पड़ा है। राजस्थान के करौली में मिलने वाली पारंपरिक मिठाई गुलाब लच्छे आज भी हर उम्र के लोगों को अपनी ओर खींच रही है। अनोखे रूप-रंग और पुरानी मिठास से सजी यह मिठाई केवल नन्हे बच्चों का ही मन नहीं ललचाती, बल्कि परिवार के बुजुर्गों को भी उनके सुनहरे बचपन की यादों में ले जाती है। सड़क पर गूंजता अनोखा नारा और बच्चों की दीवानगी करौली की गलियों और ग्रामीण हाट-बाजारों में इस मिठाई को लेकर बच्चों के बीच एक खास तुकबंदी बरसों से दोहराई जाती रही है। बच्चे खेलते-कूदते अक्सर कहते हैं कि गुलाब लच्छे, खाने में अच्छे, 10 के दो, लपक कर लो। इस मजेदार नारे के साथ बिकने वाली यह रंग-बिरंगी मिठाई देखते ही बच्चों का ध्यान खींच लेती है। ठेले या दुकान पर इसे सजा देखकर बच्चे अक्सर अपने अभिभावकों से इसे दिलाने की जिद करने लगते हैं। यह स्थानीय बाल संस्कृति का एक जीवंत हिस्सा बन चुकी है। पीढ़ियों का जुड़ाव और पुरानी यादों का अहसास यह पारंपरिक मिठास सिर्फ आज की नई पीढ़ी को ही नहीं लुभा रही, बल्कि बड़े-बुजुर्गों के दिल में भी इसके लिए खास जगह है। पुरानी पीढ़ी के लोगों का कहना है कि जब वे खुद छोटे थे, तब मेलों और बाजारों में इसी मिठाई का भरपूर स्वाद लेते थे। अब दशकों बाद जब वे अपने पोते-पोतियों के हाथ में इसे देखते हैं, तो उन्हें अपना बीता हुआ दौर याद आ जाता है। पीढ़ियां बदलने के बाद भी इस मिठाई का यह भावनात्मक रिश्ता जस का तस बना हुआ है। महंगाई के दौर में सिर्फ 5 रुपये का किफायती भाव मौजूदा समय में जहां आम जरूरत की चीजों और ब्रांडेड मिठाइयों के दाम आसमान छू रहे हैं, वहीं गुलाब लच्छे अपनी बेहद कम कीमत की वजह से चर्चा में रहते हैं। आज भी यह मिठाई मात्र 5 रुपये में आसानी से मिल जाती है। दस रुपये में दो मिलने वाली यह किफायती मिठास समाज के हर तबके के बजट में पूरी तरह फिट बैठती है। यही वजह है कि कम जेब खर्च में भी बच्चे इसे खुशी-खुशी खरीद लेते हैं। गजक की तरह खींचकर तैयार करने की मुश्किल कारीगरी इस मिठाई के निर्माण से जुड़े स्थानीय व्यापारी राजेश गुप्ता का कहना है कि गुलाब लच्छे तैयार करना काफी मेहनत का काम है। इसे बनाने का तरीका काफी हद तक सर्दियों में बनने वाली गजक से मिलता-जुलता है, जिसमें चाशनी को हाथों से लगातार खींचा जाता है। कारीगर सबसे पहले गाढ़ी चाशनी तैयार करते हैं और फिर उसमें भुना हुआ मैदा मिलाया जाता है। इसके बाद मिश्रण को बार-बार खींचकर लच्छेदार रेशेदार रूप दिया जाता है और अंत में मनचाहा आकार बनता है। राजेश गुप्ता के अनुसार, एक घंटे की कड़ी मेहनत के बाद लगभग 100 गुलाब लच्छे बनकर तैयार होते हैं। समय बदला लेकिन नहीं बदली करौली की यह मिठास खान-पान की दुनिया में नित नए बदलाव आने के बावजूद करौली और उसके आसपास के देहाती इलाकों में गुलाब लच्छे का क्रेज जरा भी कम नहीं हुआ है। हाथों की इस पारंपरिक कारीगरी ने खुद को बदलते वक्त के थपेड़ों से बचाकर रखा है और यह मिठाई आज भी स्थानीय सांस्कृतिक पहचान का एक मीठा प्रतीक बनी हुई है। इसका आप पर असर पारंपरिक मिठाई गुलाब लच्छे आम जनता के लिए जेब पर भारी पड़े बिना मीठे का आनंद लेने का बेहतरीन जरिया है। • किफायती विकल्प: मात्र पांच रुपये की कीमत में उपलब्ध होने से यह मिठाई हर आम परिवार के बजट में आसानी से समा जाती है। महंगाई के इस दौर में भी बच्चे अपनी छोटी पॉकेट मनी से इसे खरीद सकते हैं। • स्थानीय कारीगरी: करौली में यह मिठाई छोटे कारीगरों और पारंपरिक हलवाइयों के रोजगार का बड़ा सहारा बनी हुई है। स्थानीय स्तर पर ऐसी मिठाइयां खरीदने से पारंपरिक शिल्प और छोटे व्यापारियों को सीधा प्रोत्साहन मिलता है। • पारंपरिक स्वाद: आधुनिक रसायनों और पैकेज्ड चॉकलेट के मुकाबले यह पारंपरिक चाशनी और भुने मैदे की सादी मिठास प्रदान करती है। परिवार अपने बच्चों को पुरानी खानपान परंपराओं से जोड़ने के लिए इसे अपना सकते हैं। • करौली में: करौली के बाजारों और ग्रामीण मेलों में घूमने वाले लोग बहुत कम खर्च में इस पुरानी धरोहर मिठाई का लुत्फ उठा सकते हैं। स्थानीय निवासियों के लिए यह अपनी सांस्कृतिक विरासत और बचपन की यादों को जीवंत रखने का माध्यम है। ऐसा क्यों हुआ गुलाब लच्छे की लोकप्रियता आज भी बरकरार रहने के पीछे इसकी सादगी, पारंपरिक स्वाद और कम लागत का विशेष योगदान है। बाजार में कई नए विकल्प आने के बाद भी लोग अपनी पुरानी आदतों और भरोसेमंद स्वाद से जुड़े रहना पसंद करते हैं। • अत्यंत कम लागत: इस मिठाई की तैयारी में चाशनी और भुने मैदे जैसी बुनियादी सामग्री का उपयोग होता है, जिससे इसकी लागत नियंत्रित रहती है। इसी वजह से निर्माता इसे आज भी पांच रुपये जैसी सस्ती दर पर बेचने में सक्षम हैं। • पारंपरिक कारीगरी का आकर्षण: गजक की तरह चाशनी खींचकर बनाए जाने वाले इसके लच्छेदार रेशे और रंग-बिरंगे रूप बच्चों को सहज ही आकर्षित करते हैं। यह खास बनावट मशीनी चॉकलेट्स से एकदम अलग अनुभव देती है। • पीढ़ियों की भावनात्मक यादें: बुजुर्गों ने बचपन में इस मिठाई का स्वाद लिया था, जो अब एक भावनात्मक धरोहर बन चुकी है। यही वजह है कि माता-पिता और दादा-दादी आज भी अपने बच्चों को बड़े चाव से यह मिठाई दिलाते हैं। सवाल-जवाब 1. गुलाब लच्छे क्या हैं और यह कहां सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं? गुलाब लच्छे एक पारंपरिक लच्छेदार मीठा व्यंजन है, जो राजस्थान के करौली और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों और बड़ों के बीच बेहद लोकप्रिय है। 2. गुलाब लच्छे की मौजूदा कीमत क्या है? यह पारंपरिक मिठाई आज भी बेहद सस्ती है और मात्र 5 रुपये में एक तथा 10 रुपये में दो पीस मिलती है। 3. गुलाब लच्छे बनाने के लिए किन सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है? इसे मुख्य रूप से चीनी की गाढ़ी चाशनी और भुने हुए मैदे के मिश्रण से तैयार किया जाता है। 4. गुलाब लच्छे को तैयार करने की प्रक्रिया क्या है? कारीगर चाशनी और भुने मैदे के घोल को गजक की तरह हाथों से बार-बार खींचते हैं, जिससे इसमें रेशेदार लच्छे बनते हैं और फिर इन्हें खास आकार दिया जाता है। 5. एक घंटे में लगभग कितने गुलाब लच्छे बनाए जा सकते हैं? स्थानीय व्यापारी राजेश गुप्ता के अनुसार, एक घंटे की कड़ी मेहनत में लगभग 100 गुलाब लच्छे बनकर तैयार होते हैं। 6. गुलाब लच्छों को लेकर बच्चों के बीच कौन सा नारा प्रसिद्ध है? करौली में बच्चों के बीच 'गुलाब लच्छे, खाने में अच्छे, 10 के दो, लपक कर लो' का तुकबंदी भरा नारा काफी मशहूर है। https://trendkia.com/food/karauli-men-pancha-rupaye-ke-gulab-lachhe-aja-bhi-bachchon-ke-bane-hain-pasndida-bujurgon-ko-yada-dilate-hain-bita-jamana-35408 TrendKia — Har trend, sabse pehle.