# कोट मोहल्ले में 1935 से महक रही विंध्याचल बाबा की मिठाई, छठी पीढ़ी संभाल रही रबड़ी और खुरमे का पारंपरिक जायका

> आजमगढ़ के कोट मोहल्ले में करीब नौ दशक पहले शुरू हुई मिठाई की एक दुकान आज भी शुद्ध दूध की मलाईदार रबड़ी और खुरमे के लिए मशहूर है, जहां परिवार की छठी पीढ़ी बिना किसी बाहरी कारीगर के पुरखों का काम आगे बढ़ा रही है।

**Type:** article · **Category:** खानपान · **Published:** 2026-10-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/food/kot-mohalle-men-1935-se-mahaka-rahi-vindhyachal-baba-ki-mithai-chhathi-pirhi-snbhala-rahi-rabari-aura-khurame-ka-parnparika-jayaka-43423 · **Language:** Hindi
**Tags:** आजमगढ़, रबड़ी, खुरमा, विंध्याचल बाबा, संतोष कुमार, पारंपरिक मिठाई, उत्तर प्रदेश खानपान

उत्तर प्रदेश का आजमगढ़ जिला अपनी ऋषि परंपरा और पौराणिक इतिहास के साथ-साथ पारंपरिक खानपान की समृद्ध धरोहर के लिए भी पहचाना जाता है। इस जिले की गलियों में तैयार होने वाले पकवानों और मिठाइयों का अपना एक अलग अंदाज है। यहां आने वाले किसी भी व्यक्ति का सफर तब तक पूरा नहीं माना जाता, जब तक वह स्थानीय मिष्ठान का आनंद न ले ले। आजमगढ़ में खानपान की कई खास चीजें उपलब्ध हैं, जिनमें प्रसिद्ध लौंगलता और बेहद अनोखा सफेद गाजर का हलवा अपनी अलग मिठास के लिए जाने जाते हैं। इसी कड़ी में जब भी शहर की पारंपरिक मिठास का जिक्र छिड़ता है, तो गाढ़ी मलाईदार रबड़ी और खुरमे का नाम सबसे पहले आता है।

## नौ दशकों से कोट मोहल्ले में बरकरार है विंध्याचल बाबा की दुकान
आजमगढ़ शहर के कोट मोहल्ले में स्थित विंध्याचल बाबा की मिठाई की दुकान करीब नौ दशकों से लोगों को वही पुराना स्वाद परोस रही है। इस दुकान पर मिलने वाली रबड़ी और खुरमा न केवल स्थानीय लोगों को पसंद है, बल्कि आसपास के कई अन्य जिलों से आने वाले ग्राहक भी इसका स्वाद लेने पहुंचते हैं। दुकान के संचालक संतोष कुमार के अनुसार, यह उनके पूरे मोहल्ले की सबसे पहली मिठाई की दुकान है। इस प्रतिष्ठान की शुरुआत साल 1935 के आसपास उनके बुजुर्गों द्वारा की गई थी। परिवार के वरिष्ठ सदस्यों विंध्याचल बाबा, दुर्गा जी और कृपा प्रसाद गुप्ता जी ने मिलकर इस पारंपरिक काम की नींव रखी थी।

## खपड़े की छत से पक्की दुकान तक, नहीं बदला बनाने का तरीका
शुरुआती दौर में यह दुकान केवल खपड़े की छत के नीचे संचालित होती थी। वक्त गुजरने के साथ दुकान की बनावट और आसपास का माहौल जरूर बदल गया, लेकिन मिठाइयां तैयार करने का घरेलू तरीका और उनका स्वाद बिल्कुल पहले जैसा ही बना हुआ है। वर्तमान में संतोष कुमार और उनके परिवार की छठी पीढ़ी इस पूरी व्यवस्था को संभाल रही है। यह परिवार अपनी पिछली पीढ़ियों से मिले हुनर और विरासत को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ाने में जुटा है। शुद्ध दूध और पारंपरिक मिठास के दम पर इस दुकान ने बाजार में अपनी मजबूत साख कायम रखी है।

## शुद्ध दूध की ताजी रबड़ी और घरेलू कारीगरी की खूबी
दुकान संचालक बताते हैं कि ग्राहकों के बीच सबसे ज्यादा मांग मलाईदार रबड़ी की रहती है। इसके साथ ही पारंपरिक खुरमा और पेड़ा भी लोग बेहद चाव के साथ खरीदते हैं। रबड़ी की लोकप्रियता की मुख्य वजह गुणवत्ता पर दिया जाने वाला ध्यान है। वे बताते हैं कि शुद्धता से कभी समझौता नहीं किया जाता। रोजाना जितना भी ताजा और शुद्ध दूध आता है, उसी से हर दिन ताजी रबड़ी पकाई जाती है और उसमें किसी भी तरह की मिलावट नहीं की जाती। इस दुकान की सबसे अनूठी बात यह है कि यहां मिठाई बनाने या बेचने के लिए किसी बाहरी कारीगर या नौकर की मदद नहीं ली जाती।

## परिवार के सदस्य ही संभालते हैं भट्ठी से लेकर बिक्री तक का काम
मिठाई तैयार करने का पूरा दायित्व परिवार के लोग ही आपस में बांटकर पूरा करते हैं। संतोष कुमार के साथ उनके भतीजे और घर के युवा लड़के खुद भट्ठी पर दूध पकाने से लेकर मिठाइयां बनाने और ग्राहकों को परोसने तक का हर काम संभालते हैं। इसी वजह से स्वाद और स्वच्छता का पैमाना हमेशा एक समान रहता है। इस स्वाद के प्रशंसक केवल शहर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे आजमगढ़ जिले के अलग-अलग कस्बों और गांवों से भी लोग यहां पहुंचते हैं। कई ग्राहक तो दूसरे शहरों में रहने वाले अपने रिश्तेदारों और परिचितों के लिए भी यहां से विशेष तौर पर खुरमा, रबड़ी और पेड़ा पैक कराकर ले जाते हैं।

## इसका आप पर असर
यह खबर आजमगढ़ के पारंपरिक खानपान की शुद्धता और स्थानीय कारीगरी के संरक्षण को दर्शाती है।

- **आजमगढ़ में:** कोट मोहल्ले जाने वाले लोग बिना किसी मिलावट के शुद्ध दूध से बनी ताजी रबड़ी और पारंपरिक खुरमे का प्रामाणिक स्वाद ले सकते हैं। त्योहारों या पारिवारिक दौरों के दौरान लोग अन्य शहरों में रहने वाले रिश्तेदारों के लिए भी यहां से पारंपरिक मिठाइयां पैक करा सकते हैं।
- **मिठाई प्रेमियों के लिए:** व्यावसायिक कारखानों और बाहरी हलवाइयों के बजाय घरेलू तरीके से बनी शुद्ध मिठाइयों का विकल्प मिलता है। यह उन ग्राहकों के लिए राहत की बात है जो मिलावटी मावा या केमिकल रहित पारंपरिक स्वाद की तलाश में रहते हैं।
- **पारंपरिक कारीगरों के लिए:** यह उदाहरण साबित करता है कि गुणवत्ता बनाए रखने से छोटी पुश्तैनी दुकानें भी दशकों तक ग्राहकों का भरोसा बनाए रख सकती हैं। नई पीढ़ी के युवा भी बिना किसी हिचक के अपने पुश्तैनी हुनर को गर्व से आगे बढ़ा सकते हैं।
- **स्थानीय पहचान:** जिले के खानपान पर्यटन को बढ़ावा मिलता है और बाहर से आने वाले आगंतुकों को स्थानीय संस्कृति का अनुभव होता है। आजमगढ़ आने वाले यात्री लौंगलता और सफेद गाजर के हलवे के साथ इस ऐतिहासिक दुकान का जायका ले सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
यह दुकान 1935 से आज तक इसलिए कायम है क्योंकि इसके संचालकों ने स्वाद, शुद्धता और पारिवारिक कार्यशैली में कोई समझौता नहीं किया।

- **पुश्तैनी नींव और निरंतरता:** साल 1935 के आसपास विंध्याचल बाबा, दुर्गा जी और कृपा प्रसाद गुप्ता जी ने मोहल्ले की पहली मिठाई की दुकान के रूप में इसकी शुरुआत की थी। खपड़े की दुकान से शुरू हुआ यह सफर परिवार की निष्ठा के चलते लगातार बढ़ता गया।
- **घर के सदस्यों द्वारा संचालन:** काम के लिए बाहरी कारीगरों पर निर्भर रहने के बजाय परिवार के सदस्य खुद दूध पकाने से लेकर बिक्री तक का काम संभालते हैं। इससे मिठाई बनाने की मूल विधि और गुणवत्ता पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना किसी बदलाव के सुरक्षित रही।
- **शुद्धता की सख्त नीति:** प्रतिदिन आने वाले ताजे दूध से ही रबड़ी तैयार की जाती है और इसमें कोई मिलावट नहीं की जाती। इसी भरोसे ने ग्राहकों को नौ दशकों तक दुकान से जोड़े रखा।
- **अगली पीढ़ी का जुड़ाव:** वर्तमान में संतोष कुमार और परिवार के युवा लड़के इस जिम्मेदारी को संभाल रहे हैं, जिससे विरासत टूटने के बजाय और मजबूत हुई है।

## सवाल-जवाब

### 1. विंध्याचल बाबा की मिठाई की दुकान आजमगढ़ में कहां स्थित है?
यह प्रसिद्ध दुकान आजमगढ़ शहर के कोट मोहल्ले में स्थित है।

### 2. इस दुकान की शुरुआत कब और किसने की थी?
इसकी शुरुआत 1935 के आसपास परिवार के बुजुर्गों विंध्याचल बाबा, दुर्गा जी और कृपा प्रसाद गुप्ता जी ने मिलकर की थी।

### 3. यहां की सबसे मशहूर मिठाइयां कौन सी हैं?
इस दुकान पर सबसे अधिक मांग मलाईदार रबड़ी की होती है, जिसके साथ पारंपरिक खुरमा और पेड़ा भी काफी पसंद किया जाता है।

### 4. वर्तमान में दुकान का संचालन कौन कर रहा है?
वर्तमान में संतोष कुमार, उनके भतीजे और उनके परिवार की छठी पीढ़ी मिलकर दुकान की सारी व्यवस्था संभाल रहे हैं।

### 5. दुकान में मिठाई बनाने का काम कौन संभालता है?
यहां किसी बाहरी कारीगर या नौकर को नहीं रखा गया है, बल्कि घर के सदस्य ही दूध पकाने से लेकर मिठाई तैयार करने तक का पूरा काम खुद करते हैं।

### 6. आजमगढ़ के अन्य कौन से पारंपरिक व्यंजन अपनी पहचान रखते हैं?
आजमगढ़ में विशेष रूप से मिलने वाला लौंगलता और अनूठा सफेद गाजर का हलवा भी अपनी खास पहचान के लिए जाने जाते हैं।

## प्रेरणा और सबक
विंध्याचल बाबा की इस दुकान की सफलता यह सिखाती है कि समर्पण, शुद्धता और पारिवारिक एकता से पुश्तैनी काम को पीढ़ियों तक कैसे जिंदा रखा जाता है।

- **गुणवत्ता से समझौता न करना:** संतोष कुमार और उनके परिवार ने बाजार के दबाव के बावजूद शुद्ध दूध से ताजी मिठाई बनाने की नीति कभी नहीं छोड़ी। काम में ईमानदारी ही लंबे समय तक ग्राहकों का अटूट भरोसा दिलाती है।
- **अपनी जड़ों और विरासत का सम्मान:** खपड़े की साधारण दुकान से शुरू होकर आज छठी पीढ़ी भी इस काम को गर्व के साथ संभाल रही है। अपने पुरखों के काम को आगे बढ़ाना परंपरा और आत्मसम्मान दोनों को सुरक्षित रखता है।
- **सामूहिक पारिवारिक सहयोग:** बाहर से कारीगर रखने के बजाय परिवार के सभी सदस्यों ने मिलकर जिम्मेदारी संभाली है। जब परिवार के लोग कंधे से कंधा मिलाकर मेहनत करते हैं, तो किसी भी कारोबार की प्रामाणिकता बनी रहती है।
- **साधारण शुरुआत से बड़ी पहचान:** साल 1935 में एक मोहल्ले से शुरू हुआ यह काम आज पूरे जिले और आसपास के क्षेत्रों में पहचान बना चुका है। निरंतर लगन से किया गया साधारण काम भी एक दिन ऐतिहासिक मिसाल बन जाता है।

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