# लखीमपुर खीरी में दूध की मलाई से ऐसे बनता है शुद्ध देसी घी, जानिए क्या है पूरी पारंपरिक विधि

> उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के ग्रामीण इलाकों में आज भी मलाई और मक्खन से पारंपरिक तरीके से शुद्ध देसी घी तैयार किया जाता है। घर पर घी बनाने की इस पुरानी विधि में किसी तरह की मिलावट नहीं होती है और इसकी खुशबू बेहद खास होती है।

**Type:** article · **Category:** खानपान · **Published:** 2026-10-23 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/food/lakhimpur-kheri-mein-doodh-ki-malai-se-aise-banta-hai-shuddh-desi-ghee-50951 · **Language:** Hindi
**Tags:** देसी घी, लखीमपुर खीरी, पारंपरिक विधि, मलाई से घी, शुद्ध घी रेसिपी, घरेलू नुस्खे

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के ग्रामीण अंचलों में आज भी दूध की मलाई और मक्खन का उपयोग करके पारंपरिक विधि से शुद्ध देसी घी तैयार करने की परंपरा जीवित है। आज के दौर में जब लोग अपनी सेहत और खान-पान को लेकर पहले से कहीं अधिक जागरूक हो चुके हैं, तब बाजार में मिलने वाले पैकेटबंद उत्पादों के साथ-साथ घर के बने शुद्ध घी की मांग भी लगातार बनी हुई है। ग्रामीण इलाकों के कई परिवार आज भी दूध और दही के जरिए अपने घरों में ही খাঁटी घी बनाते हैं, जिसके लिए पूरी तरह से पारंपरिक तौर-तरीकों का सहारा लिया जाता है।

घर पर देसी घी तैयार करने की यह पूरी प्रक्रिया ताजे दूध से शुरू होती है। सबसे पहले ताजे दूध को अच्छी तरह उबालकर ठंडा किया जाता है, जिसके बाद उसके ऊपर जमने वाली मलाई को एक अलग बर्तन में लगातार इकट्ठा किया जाता है। कई दिनों तक इस मलाई को जमा करने के बाद इसमें थोड़ा सा दही मिलाकर इसे खट्टा किया जाता है। इसके पश्चात इस मिश्रण को मथनी की सहायता से जोर-जोर से मथा जाता है, जिससे मलाई से मक्खन और छाछ दोनों अलग-अलग हो जाते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मक्खन निकालने के लिए विशेष रूप से लकड़ी की मथनी का ही उपयोग किया जाता है। मलाई को तब तक अच्छी तरह मथा जाता है जब तक कि उससे मक्खन के छोटे-छोटे गोले अपने आप बाहर न आने लगें। इन मक्खन के गोलों को छाछ से पूरी तरह अलग करके साफ पानी से अच्छी तरह धोया जाता है ताकि उसकी खटास निकल जाए। इसके बाद इस मक्खन को एक मोटे तले वाले बर्तन में ट्रांसफर किया जाता है और धीमी आंच पर गर्म करने के लिए रख दिया जाता है।

धीमी आंच पर पकने के दौरान मक्खन के अंदर मौजूद सारा अतिरिक्त पानी भाप बनकर धीरे-धीरे उड़ने लगता है और इसके परिणामस्वरूप शुद्ध घी बनकर तैयार होने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। कुछ समय तक उबालने के बाद घी के ऊपरी सतह पर उठने वाला झाग कम होने लगता है और बर्तन के निचले हिस्से में दूध के ठोस कण धीरे-धीरे बैठने लगते हैं। जब घी का सारा पानी पूरी तरह सूख जाता है और उसमें से एक सोंधी तथा शानदार खुशबू आने लगती है, तो बर्तन को तुरंत आंच से नीचे उतार लिया जाता है।

इसके बाद इस तैयार घी को कुछ देर के लिए ठंडा होने दिया जाता है और फिर इसे छानकर एक साफ कांच या अन्य बर्तन में सुरक्षित रख लिया जाता है। पारंपरिक विधि से बनाए गए इस देसी घी की असली पहचान उसकी बेहतरीन खुशबू, उसके प्राकृतिक रंग और उसकी दानेदार बनावट से की जाती है। जैसे-जैसे यह ठंडा होता है, यह पूरी तरह से जमने लगता है। हालांकि, घी का अंतिम रंग और उसकी बनावट इस बात पर भी निर्भर करती है कि दूध की गुणवत्ता कैसी थी, पशुओं को क्या आहार दिया गया था और उसे पकाने का तरीका क्या अपनाया गया था। उदाहरण के लिए, गाय के दूध से निकाले गए घी का रंग अलग-अलग परिस्थितियों में हल्का या गहरा पीला हो सकता है।

लखीमपुर खीरी के ग्रामीण इलाके की रहने वाली मुस्कान बताती हैं कि उनके घर पर आज भी देसी घी तैयार करने के लिए प्राचीन लकड़ी की मथनी का ही इस्तेमाल किया जाता है। इस विधि के तहत कई दिनों तक लगातार दूध से निकलने वाली मलाई को इकट्ठा करके फ्रिज के अंदर सुरक्षित रखा जाता है ताकि वह खराब न हो सके। जब पर्याप्त मात्रा में मलाई जमा हो जाती है, तब उसे पारंपरिक मथनी से मथा जाता है, जिससे मक्खन और छाछ एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। इसके बाद इस निकाले गए मक्खन को गैस पर गर्म करके शुद्ध घी तैयार किया जाता है। मुस्कान के अनुसार, मक्खन को धीमी आंच पर पिघलाकर घी बनाने की इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 20 से 30 मिनट का समय लगता है, जिसके बाद शुद्ध घी बनकर तैयार हो जाता है। उनका कहना है कि इस तरह घर पर पारंपरिक माध्यमों से बनाए जाने वाले घी में किसी भी प्रकार की मिलावट की कोई गुंजाइश नहीं रहती है।

## इसका आप पर असर
घर पर पारंपरिक तरीके से तैयार किए जाने वाले देसी घी से सेहत और शुद्धता को लेकर सीधा लाभ मिलता है, जिससे बाजार की मिलावट से बचा जा सकता है।

- **शुद्धता की गारंटी:** घर पर मलाई से घी बनाने पर किसी भी प्रकार के केमिकल या मिलावटी तत्वों का खतरा नहीं रहता है।
- **लखीमपुर खीरी में:** स्थानीय ग्रामीण परिवारों के लिए यह पारंपरिक विधि उनके खान-पान को पौष्टिक और पूरी तरह सुरक्षित बनाती है।
- **समय और मेहनत:** इस प्रक्रिया में मक्खन को गर्म करने में लगभग 20 से 30 मिनट का समय लगता है जिसके लिए धैर्य की आवश्यकता होती है।
- **स्वास्थ्य लाभ:** शुद्ध पारंपरिक घी का सेवन करने से शरीर को प्राकृतिक पोषण और ऊर्जा मिलती है जो पैकेटबंद उत्पादों में कम होती है।
- **भंडारण का तरीका:** मलाई को खराब होने से बचाने के लिए उसे लगातार फ्रिज में जमा करके रखना जरूरी होता है।

## ऐसा क्यों हुआ
बाजार में मिलने वाले पैकेटबंद घी की गुणवत्ता को लेकर बढ़ती चिंताओं और शुद्ध खानपान की आवश्यकता के कारण ग्रामीण इलाकों में लोग आज भी पुरानी पारंपरिक पद्धतियों का पालन करते हैं।

- **पारंपरिक जीवनशैली:** ग्रामीण परिवारों में पीढ़ियों से चली आ रही मलाई और मक्खन से घी निकालने की परंपरा आज भी जीवित है।
- **दूध की उपलब्धता:** ग्रामीण क्षेत्रों में ताजे दूध और दही की आसान उपलब्धता के कारण घर पर ही मक्खन और घी तैयार करना संभव होता है।
- **गुणवत्ता नियंत्रण:** घर पर घी बनाने से पशुओं के आहार और दूध की गुणवत्ता पर पूरा नियंत्रण रहता है जिससे मिलावट की संभावना खत्म हो जाती है।

## सवाल-जवाब

### 1. लखीमपुर खीरी में देसी घी किस चीज से तैयार किया जाता है?
लखीमपुर खीरी के ग्रामीण इलाकों में दूध की मलाई और मक्खन से पारंपरिक तरीके से देसी घी तैयार किया जाता है।

### 2. मक्खन निकालने के लिए किस उपकरण का उपयोग किया जाता है?
मक्खन निकालने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लकड़ी की मथनी का इस्तेमाल किया जाता है।

### 3. मक्खन को गर्म करने में कितना समय लगता है?
मक्खन को धीमी आंच पर गर्म करके घी तैयार करने में लगभग 20 से 30 मिनट का समय लगता है।

### 4. घर पर बने घी की पहचान कैसे की जाती है?
पारंपरिक घी की पहचान उसकी खास खुशबू, प्राकृतिक रंग और ठंडे होने पर जमने वाली दानेदार बनावट से की जाती है।

### 5. मलाई को खराब होने से बचाने के लिए क्या किया जाता है?
इकट्ठा की गई मलाई को कई दिनों तक फ्रिज में रखा जाता है ताकि वह खराब न हो।

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