महोबा के श्रीनगर में 40 वर्षों से जलवा बिखेर रहे घासीराम सैनी के हाथ से बनी मूंग दाल मंगोड़ी का अनोखा स्वाद उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में घासीराम सैनी और उनकी पत्नी पिछले चार दशकों से पारंपरिक मिट्टी के चूल्हे पर बनी स्वादिष्ट मूंग दाल मंगोड़ी से लोगों का दिल जीत रहे हैं। खौलते तेल से बिना किसी झारे के हाथ से मंगोड़ी निकालने की उनकी कला और खास अमचूर चटनी ने इस दुकान को बेहद लोकप्रिय बना दिया है। उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के अंतर्गत आने वाले श्रीनगर कस्बे में स्वाद और परंपरा का एक ऐसा संगम देखने को मिलता है, जो पिछले चार दशकों से लगातार कायम है। यहाँ बुजुर्ग घासीराम सैनी अपनी पत्नी के साथ मिलकर मूंग दाल की स्वादिष्ट मंगोड़ी तैयार करते हैं। पिछले 40 सालों से चल रही इस छोटी सी दुकान का जायका लोगों के दिलों पर इस कदर छाया हुआ है कि आसपास कोई दूसरी मंगोड़ी की दुकान अपनी पहचान नहीं बना सकी। सुबह तड़के से लेकर देर शाम तक यहाँ स्वाद के शौकीनों का जमावड़ा लगा रहता है। पति और पत्नी के बेहतरीन समन्वय से तैयार होता है स्वाद घासीराम सैनी के अनुसार, इस 40 साल लंबे सफर की सफलता का असली श्रेय उनकी पत्नी को जाता है। दुकान में बिक्री के लिए तैयार होने वाली मूंग दाल मंगोड़ी की पूरी तैयारी उनकी पत्नी ही संभालती हैं। दाल की पिसाई, मसालों का सही अनुपात और घोल तैयार करने की मुख्य जिम्मेदारी पत्नी निभाती हैं। इसके बाद घासीराम सैनी कढ़ाई के पास बैठकर मंगोड़ी को तलने और सिराने की कमान संभालते हैं। पति और पत्नी की यह आपसी समझ और साझी मेहनत ही इस मंगोड़ी के लाजवाब स्वाद का मुख्य आधार है। खौलते तेल से नंगे हाथों से मंगोड़ी निकालने का हैरतअंगेज हुनर इस दुकान की सबसे बड़ी खासियत घासीराम सैनी का मंगोड़ी तलने का अनोखा तरीका है। लगातार 40 वर्षों तक काम करने के अनुभव ने उन्हें ऐसा अभ्यास दे दिया है कि वे मंगोड़ी निकालने के लिए किसी झंझिया या पारंपरिक झारे का इस्तेमाल नहीं करते। वे खौलते हुए गर्म तेल की कढ़ाई में सीधे अपने हाथों का इस्तेमाल करते हैं और बड़ी ही सफाई से मंगोड़ी बाहर निकाल लेते हैं। हैरानी की बात यह है कि इतनी तेज आंच और उबलते तेल के बावजूद उनका हाथ कभी नहीं झुलसता। इस अद्भुत कला को देखने के लिए भी लोग अक्सर खिंचे चले आते हैं। मिट्टी के चूल्हे और लोहे की कढ़ाई का पारंपरिक अंदाज़ आधुनिक दौर में जहां ज्यादातर दुकानों पर गैस सिलेंडर का प्रयोग होता है, वहीं दादा घासीराम आज भी पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। वे अपनी मंगोड़ी मिट्टी के पारंपरिक चूल्हे पर ही पकाते हैं। मिट्टी के चूल्हे पर रखी लोहे की भारी कढ़ाई में धीमी और समान आंच पर जब मूंग दाल की मंगोड़ी फ्राई होती है, तो उसका सोंधापन और कुरकुरापन कई गुना बढ़ जाता है। यही वजह है कि सालभर इस दुकान पर मंगोड़ी की भारी मांग बनी रहती है। खास अमचूर चटनी और 10 रुपये में 100 ग्राम का किफायती भाव घासीराम सैनी का मानना है कि मंगोड़ी का असली मज़ा उसकी चटनी से आता है। अगर चटनी स्वादिष्ट न हो, तो मंगोड़ी की बिक्री पर असर पड़ता है। इसी सोच के साथ वे पिछले 40 सालों से अमचूर यानी सूखे आम से बनी अपनी खास खट्टी-मीठी चटनी तैयार कर रहे हैं। दुकान सुबह 5 बजे खुल जाती है और रात 8 बजे तक लगातार चाय व मंगोड़ी परोसी जाती है। महंगाई के दौर में भी यहाँ महज 10 रुपये में 100 ग्राम मंगोड़ी उपलब्ध कराई जाती है, जिसे खाने के लिए रोजाना औसतन 300 से अधिक ग्राहक पहुँचते हैं। पीढ़ियों से कायम है ग्राहकों का भरोसा इस दुकान पर आने वाले ग्राहकों का जुड़ाव बेहद पुराना है। यहाँ सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं, बल्कि युवा भी बड़ी संख्या में स्वाद का आनंद लेने आते हैं। दुकान पर आए एक युवा ग्राहक ने बताया कि वे पिछले 20 सालों से लगातार यहाँ की मंगोड़ी खा रहे हैं। बचपन में वे अपने पिता के साथ यहाँ आते थे और अब बड़े होने के बाद भी यह सिलसिला जारी है। चार दशकों की यह अटूट परंपरा महोबा के श्रीनगर की स्थानीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन चुकी है। इसका आप पर असर यह समाचार महोबा के स्थानीय निवासियों और भारत भर के खान-पान के शौकीनों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। • भारत में: यह कहानी पारंपरिक भारतीय स्ट्रीट फूड संस्कृति और छोटे व्यवसाय मालिकों के दीर्घकालिक संघर्ष व सफलता का प्रतीक है। भोजन प्रेमियों के लिए यह दिखाता है कि कैसे बिना आधुनिक तकनीक के भी गुणवत्ता और स्वाद को दशकों तक बरकरार रखा जा सकता है। • महोबा में: श्रीनगर और आसपास के इलाकों के निवासियों के लिए यह किफायती नाश्ते का एक विश्वसनीय केंद्र बना हुआ है। यहाँ मात्र 10 रुपये में 100 ग्राम पौष्टिक मूंग दाल मंगोड़ी और सुबह 5 बजे से रात 8 बजे तक ताजा नाश्ता मिलना स्थानीय कामकाजी लोगों और यात्रियों के लिए बड़ी राहत है। सवाल-जवाब 1. घासीराम सैनी की मंगोड़ी दुकान कहां स्थित है? यह दुकान उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के श्रीनगर कस्बे में स्थित है। 2. घासीराम सैनी की मंगोड़ी बनाने की क्या खासियत है? वे पिछले 40 सालों से मिट्टी के चूल्हे पर मंगोड़ी बनाते हैं और खौलते तेल से बिना किसी झारे के अपने हाथों से मंगोड़ी निकालते हैं। 3. दुकान खुलने का समय और मंगोड़ी की कीमत क्या है? दुकान सुबह 5 बजे से रात 8 बजे तक खुलती है, जहां 10 रुपये में 100 ग्राम मंगोड़ी मिलती है। 4. मंगोड़ी के साथ कौन सी खास चटनी परोसी जाती है? मंगोड़ी के साथ अमचूर यानी सूखे आम से तैयार की गई खास खट्टी-मीठी चटनी परोसी जाती है। 5. इस दुकान पर रोज कितने ग्राहक आते हैं? इस दुकान पर रोजाना औसतन 300 या उससे अधिक ग्राहक मंगोड़ी और चाय का आनंद लेने पहुँचते हैं। प्रेरणा और सबक घासीराम सैनी और उनकी पत्नी की 40 वर्षों की यात्रा साधारण संसाधनों से सफलता पाने की एक प्रेरणादायक मिसाल है। • साझी मेहनत का महत्व: व्यापार और परिवार में सफलता के लिए आपसी सहयोग और जिम्मेदारियों का सही बंटवारा सबसे बड़ी ताकत होता है। • अभ्यास से आती है निपुणता: 40 साल के निरंतर प्रयास और एकाग्रता से इंसान ऐसे असाधारण हुनर हासिल कर सकता है जो दूसरों को हैरान कर दें। • अपनी जड़ों और परंपरा पर भरोसा: आधुनिक चमक-धमक के बीच भी मिट्टी के चूल्हे और पारंपरिक तरीके से काम करके अलग पहचान बनाई जा सकती है। • ग्राहक के प्रति निष्ठा: गुणवत्ता और उचित दाम बनाए रखकर पीढ़ियों का विश्वास जीता जा सकता है। https://trendkia.com/food/mahoba-ke-srinagar-men-40-varshon-se-jalava-bikhera-rahe-ghasiram-saini-ke-hatha-se-bani-munga-dala-mngori-ka-anokha-svada-23265 TrendKia — Har trend, sabse pehle.