महोबा में चार दशकों से छाया है रैकवार परिवार के समोसे और चाट का जादू महोबा के मुख्य बाजार में विनोद रैकवार द्वारा 40 साल पहले शुरू की गई दुकान का जायका आज भी ग्राहकों को खींच रहा है, जहां 10वीं के छात्र प्रिंस अब पारिवारिक कारोबार संभाल रहे हैं। उत्तर प्रदेश के महोबा में चार दशकों का एक लजीज सफर आज भी पुरानी रफ्तार से दौड़ रहा है। मुख्य बाजार और तहसील के पास स्थित इस लोकप्रिय प्रतिष्ठान की नींव विनोद रैकवार ने लगभग 40 वर्ष पहले रखी थी। जिस दौर में महोबा में गुलाब टॉकीज की शुरुआत हुई थी, ठीक उसी समय इस नाश्ते की दुकान ने भी अपने दरवाजे खोले थे। वक्त के साथ पास की सिनेमा टॉकीज तो बंद हो गई, लेकिन इस दुकान पर बनने वाले समोसे और चाट की खुशबू आज भी बरकरार है। तहसील का काम निपटाने आने वाले लोग हों या बाजार में खरीदारी करने पहुंचे स्थानीय नागरिक, यहां का नाश्ता किए बिना कोई आगे नहीं बढ़ता। पिता की विरासत और बेटे की नई उड़ान इस कारोबार की बागडोर अब नई पीढ़ी के हाथों में आ रही है। विनोद रैकवार के बेटे प्रिंस रैकवार ने अपने पिता के साथ हाथ बंटाते हुए इस हुनर को पूरी तरह सीख लिया है। प्रिंस बताते हैं कि वह अब समोसा, कचौड़ी, पानी-पूरी, करेला, आलू-टिक्की और चाट जैसे सभी लजीज व्यंजन खुद बना लेते हैं। प्रिंस वर्तमान में कक्षा 10वीं के छात्र हैं और अपनी पढ़ाई भी जारी रखे हुए हैं। हालांकि, उनका मानना है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी का इंतजार करने के बजाय अपने पुश्तैनी काम को ही आगे बढ़ाना एक बेहतर फैसला है। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने पारिवारिक काम को ही अपना करियर चुन लिया है और पूरे मन से इसी में रम गए हैं। सस्ता दाम और बेजोड़ गुणवत्ता का मेल बाजार में कई नई दुकानें और कड़ा मुकाबला होने के बावजूद इस दुकान की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। सालों पुराने भरोसे के कारण ग्राहक खींचे चले आते हैं। ग्राहकों को मालूम है कि यहां मिलने वाली हर डिश का स्वाद और गुणवत्ता अलग स्तर की होती है। दुकान की सबसे खास बात यह है कि बेहतरीन स्वाद के साथ यहां दाम भी आम आदमी की जेब के पूरी तरह अनुकूल हैं। यही वजह है कि नई-नई दुकानों के आने के बाद भी लोग सबसे पहले इसी दुकान का रुख करते हैं। सुबह से शाम तक गर्म नाश्ते की तैयारी यह दुकान सुबह 7 बजे खुल जाती है और रात 8 बजे तक लगातार ग्राहकों की सेवा में जुटी रहती है। दिनभर समोसे, चाट, कचौड़ी और आलू टिक्की ताजी तैयार की जाती हैं। दुकान पर आने वाले लोगों की सटीक गिनती करना तो मुमकिन नहीं है, मगर एक अनुमान के अनुसार रोजाना 500 से भी ज्यादा ग्राहक यहां पहुंचते हैं, और कई बार यह तादाद 1000 तक पहुंच जाती है। मेन्यू की बात करें तो यहां लगभग हर नाश्ता 20 रुपए में उपलब्ध है। एक समोसे की कीमत 10 रुपए है, लेकिन दुकान पर कम से कम दो समोसों की प्लेट बनाकर दी जाती है, जिससे हर ग्राहक कम से कम 20 रुपए का नाश्ता जरूर करता है। दुकान की देखरेख में प्रिंस के साथ उनके पिता भी मौजूद रहते हैं, और काम के भारी दबाव को संभालने के लिए एक मददगार लड़का भी साथ रहता है। इसका आप पर असर किफायती दाम पर पारंपरिक जायके की तलाश करने वाले लोगों के लिए यह खबर एक भरोसेमंद विकल्प की जानकारी देती है। • भारत में: यह उदाहरण दिखाता है कि छोटे शहरों में पारंपरिक खानपान का व्यवसाय स्वरोजगार का एक बेहतरीन और सुरक्षित जरिया बन सकता है। युवा वर्ग पढ़ाई के साथ पुश्तैनी कौशल अपनाकर अपनी आजीविका संवार सकते हैं। • महोबा में: मुख्य बाजार या तहसील जाने वाले लोगों को मात्र 20 रुपए में भरपेट और उच्च गुणवत्ता वाला नाश्ता आसानी से मिल जाता है। सुबह 7 बजे से रात 8 बजे तक यह दुकान कामकाजी लोगों के लिए सुविधाजनक भोजन केंद्र बनी हुई है। • ग्राहकों के लिए: दो समोसे की प्लेट 20 रुपए में मिलने से बजट पर बिना असर डाले ताजे नाश्ते का विकल्प मिलता है। दिनभर ताजा बैच बनने से हमेशा गर्म भोजन उपलब्ध रहता है। • छोटे व्यापारियों के लिए: यह साबित करता है कि नए कॉम्पिटिशन के दौर में भी अगर स्वाद और दाम सही रखे जाएं तो ग्राहक हमेशा वफादार बने रहते हैं। किसी भी कारोबार में भरोसे की नींव सबसे बड़ी पूंजी होती है। ऐसा क्यों हुआ यह दुकान अपनी शुरुआत के चार दशकों बाद भी मुख्य बाजार में ग्राहकों का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। इसकी निरंतर सफलता के पीछे अनुकूल स्थान, विश्वसनीय स्वाद और परिवार की सक्रिय भागीदारी शामिल है। • प्राइम लोकेशन का लाभ: दुकान की स्थापना महोबा के मुख्य बाजार और तहसील परिसर के समीप हुई थी, जहां रोजाना लोगों की भारी आवाजाही रहती है। गुलाब टॉकीज के पास होने से इसे शुरुआती दौर में ही भरपूर ग्राहक आधार मिल गया था। • स्वाद और दाम में संतुलन: बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बावजूद यहां नाश्ते के दाम 20 रुपए के किफायती स्तर पर रखे गए हैं। उच्च गुणवत्ता और पारंपरिक रेसिपी ने दशकों पुराना ग्राहक विश्वास बनाए रखा। • नई पीढ़ी का समर्पण: संस्थापक विनोद रैकवार के बाद उनके बेटे प्रिंस ने काम की बारीकियों को पूरी तरह सीखकर दुकान को नई ऊर्जा दी है। परिवार के सदस्यों का सीधा जुड़ाव कार्यप्रणाली को व्यवस्थित रखता है। • काम का व्यवस्थित ढांचा: सुबह 7 बजे से रात 8 बजे तक लगातार काम जारी रखने के लिए अतिरिक्त कर्मचारी की मदद ली जाती है। इससे भारी भीड़ को बिना देरी के ताजा नाश्ता परोसना संभव हो पाता है। सवाल-जवाब 1. महोबा की यह प्रसिद्ध समोसा दुकान किसने और कब शुरू की थी? इस दुकान की शुरुआत विनोद रैकवार ने करीब 40 साल पहले महोबा के मुख्य बाजार में की थी। 2. वर्तमान में इस दुकान का संचालन कौन संभाल रहा है? दुकान को विनोद रैकवार के बेटे प्रिंस रैकवार संभाल रहे हैं, जो खुद सारे पकवान बनाना सीख चुके हैं। 3. प्रिंस रैकवार अभी कौन सी कक्षा में पढ़ाई कर रहे हैं? प्रिंस वर्तमान में कक्षा 10वीं की पढ़ाई कर रहे हैं और साथ ही पारिवारिक व्यवसाय भी आगे बढ़ा रहे हैं। 4. इस दुकान पर नाश्ते के क्या दाम हैं? यहां एक समोसा 10 रुपए का है, लेकिन दो समोसों की प्लेट 20 रुपए में दी जाती है। अधिकांश अन्य नाश्ते भी 20 रुपए में मिलते हैं। 5. दुकान खुलने और बंद होने का क्या समय है? यह दुकान रोजाना सुबह 7 बजे खुलती है और रात 8 बजे तक ग्राहकों के लिए चालू रहती है। 6. दुकान पर प्रतिदिन कितने ग्राहक नाश्ता करने आते हैं? दुकान पर हर दिन अनुमानित रूप से 500 से लेकर 1000 ग्राहक नाश्ता करने पहुंचते हैं। प्रेरणा और सबक यह कहानी दर्शाती है कि पारिवारिक हुनर को गर्व से अपनाकर एक स्थिर और सफल आजीविका का निर्माण किया जा सकता है। • हुनर को पहचानना: सिर्फ डिग्रियों के भरोसे नौकरी ढूंढने के बजाय हाथ के हुनर और पारिवारिक कारोबार को आगे बढ़ाना आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम है। • धैर्य और निरंतरता: 40 साल तक एक ही स्थान पर अपनी साख बचाए रखना यह सिखाता है कि मेहनत और स्वाद की ईमानदारी कभी बेकार नहीं जाती। • समय प्रबंधन: कक्षा 10वीं की पढ़ाई के साथ-साथ दुकान का काम संभालना यह साबित करता है कि लगन हो तो शिक्षा और काम में संतुलन बनाया जा सकता है। • ग्राहक का विश्वास: बाजार में भले ही कितने नए विकल्प आ जाएं, लेकिन गुणवत्ता और किफायती दाम पर ध्यान केंद्रित रखने से ग्राहक हमेशा जुड़े रहते हैं। https://trendkia.com/food/mahoba-men-chara-dashakon-se-chhaya-hai-raikwar-parivara-ke-samose-aura-chata-ka-jadu-42052 TrendKia — Har trend, sabse pehle.