मिठाइयों पर सजने वाला चांदी का वर्क शाकाहारी है या मांसाहारी, जानिए बनाने का तरीका और नियम त्योहारी सीजन में मिठाइयों पर चमक बिखेरने वाले चांदी के वर्क को लेकर अक्सर शाकाहारी होने पर संशय रहता है। जानिए पारंपरिक चमड़े की तकनीक, सरकारी नियमों और आधुनिक मशीनी बदलावों की पूरी हकीकत। नवरात्रि के समापन के बाद दशहरा, दिवाली और भाई दूज जैसे त्योहारों की कतार लग जाती है। गुलाबी ठंड और उत्सव के इस मौसम में घरों में पकवानों और बाजारों में मिठाइयों की मांग अचानक बढ़ जाती है। हलवाइयों के यहां तरह-तरह के मिष्ठान सजने लगते हैं, जहां ग्राहकों की भारी भीड़ उमड़ती है। काजू कतली, शाही बर्फी, मोतीचूर के लड्डू और पेड़े जैसी कई मिठाइयों की खूबसूरती बढ़ाने के लिए उन पर चमकीला चांदी का वर्क लगाया जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और मिठाइयों को एक खास शाही आकर्षण देती है। हालांकि, सोशल मीडिया और इंटरनेट के इस दौर में चांदी के वर्क को लेकर लगातार यह बहस छिड़ती रही है कि क्या इसे मांसाहारी तरीके से तैयार किया जाता है। इसी संशय के चलते बहुत से लोग त्योहारों के दौरान वर्क वाली मिठाइयों से पूरी तरह परहेज करने लगते हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि चांदी के वर्क को तैयार करने की असल प्रक्रिया क्या रही है और आज बाजार में किस तरह का वर्क बिक रहा है। सिल्वर वर्क क्या है और मिठाइयों में इसका उपयोग क्यों होता है चांदी का वर्क असल में शुद्ध चांदी का एक बेहद बारीक और महीन पन्ना होता है। इसकी मोटाई अमूमन 0.2 से 0.8 माइक्रोमीटर तक ही होती है। यह पन्ना इतना नाजुक और पतला होता है कि उंगलियों के हल्के स्पर्श से भी टूट सकता है। मिठाई पर चिपकने के बाद इसे बिना किसी स्वाद के आसानी से खाया जा सकता है। इसका अपना कोई विशिष्ट स्वाद या गंध नहीं होती, लेकिन यह मिठाई को बेहद आकर्षक और शाही रूप प्रदान करता है। केवल सजावट ही नहीं, आयुर्वेद के नजरिए से भी चांदी को स्वास्थ्य के लिए गुणकारी माना गया है। प्राचीन समय से ही इसे सेहत के लिए फायदेमंद मानकर खानपान में उपयोग किया जाता रहा है। वर्क के मांसाहारी होने का विवाद क्यों उठा चांदी के वर्क को लेकर शाकाहारी और मांसाहारी होने का विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे इसका पुराना पारंपरिक निर्माण तरीका था। दशकों पहले वर्क तैयार करने के लिए चांदी के छोटे टुकड़ों को जानवरों की त्वचा या आंतों की परतों के बीच रखा जाता था। इसके लिए मुख्य रूप से बैल, भैंस, भेड़ और बकरी जैसे पशुओं की आंतों या चमड़े का इस्तेमाल किया जाता था। पशुओं की यह आंतरिक त्वचा बेहद चिकनी और कोमल होती थी, जिसके कारण लगातार हथौड़े से पीटे जाने पर भी चांदी उस पर चिपकती नहीं थी और बेहद पतली परत में आसानी से फैल जाती थी। समस्या तब पैदा होती थी जब घंटों तक हथौड़े की मार पड़ने से जानवरों की आंतों या चर्बी के कुछ सूक्ष्म कण चांदी की उस महीन शीट में समा जाते थे। इसी वजह से पारंपरिक रूप से बने वर्क को गैर-शाकाहारी या मांसाहारी श्रेणी में माना जाने लगा। भारत जैसे देश में जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह शाकाहारी है, यह बात चिंता का बड़ा सबब बन गई। सबसे बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब यह बात सामने आई कि वर्क लगी इन्हीं मिठाइयों का इस्तेमाल मंदिरों में देवताओं के भोग और भक्तों के प्रसाद के तौर पर भी किया जाता है। नियामक कदम और कानूनी फैसले पशुओं की आंतों के इस्तेमाल से केवल धार्मिक या शाकाहारी भावनाएं ही आहत नहीं हो रही थीं, बल्कि यह तरीका स्वास्थ्य के लिहाज से भी काफी असुरक्षित माना गया। आंतों और चमड़े के संपर्क में रहने के कारण चांदी के वर्क में हानिकारक बैक्टीरिया और रोगाणु पनपने का भारी जोखिम बना रहता था। इन तमाम चिंताओं को देखते हुए वर्ष 2016 में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने कड़ा कदम उठाया। नियामक ने वर्क के निर्माण में पशुओं की खाल, चमड़े और आंतों के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी कर दिया। दिल्ली सरकार ने भी इस पाबंदी को सख्ती से लागू किया। हालांकि, वर्ष 2018 में कुछ पारंपरिक निर्माताओं की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने इस प्रतिबंध को हटा दिया। अदालत ने राहत देते हुए यह स्पष्ट निर्देश दिया कि वर्क बनाने की पूरी प्रक्रिया स्वच्छ, स्वच्छंद और स्वास्थ्य मानकों के अनुकूल होनी चाहिए। किसी भी स्थिति में अस्वास्थ्यकर तरीके से इसका उत्पादन नहीं किया जा सकता। मशीनी तकनीक और खरीदारी करते समय सावधानियां इस अदालती फैसले और आधुनिक बदलावों के बाद देश में चांदी के वर्क का स्वरूप काफी बदल चुका है। मौजूदा समय में बाजार में मिलने वाला अधिकांश सिल्वर वर्क आधुनिक मशीनों की मदद से तैयार किया जाता है। इस आधुनिक विधि में किसी पशु उत्पाद का बिल्कुल उपयोग नहीं होता, बल्कि शुद्ध चांदी को विशेष पेपर या मशीन की प्लेटों के बीच रखकर स्वचालित तरीके से बारीक शीट में बदला जाता है। इस कारण यह पूरी तरह शाकाहारी और सुरक्षित रहता है। देश की कई बड़ी और प्रतिष्ठित मिठाई श्रृंखलाएं अब अपने डिब्बों और मिठाइयों पर 'वेजिटेरियन सर्टिफाइड' यानी शाकाहारी प्रमाणित का बाकायदा लेबल लगाने लगी हैं। त्योहारों के मौके पर मिठाई खरीदते समय ग्राहकों को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। यदि आप सीलबंद या डिब्बाबंद मिठाई ले रहे हैं, तो पैकेट पर यह जांचें कि उस पर शाकाहारी वर्क का प्रमाण या उल्लेख मौजूद है या नहीं। यदि आप स्थानीय हलवाई की दुकान से खुली मिठाइयां खरीद रहे हैं, तो दुकानदार से वर्क के निर्माण के तरीके के बारे में सीधे पूछ सकते हैं। इसके बाद भी अगर मन में किसी तरह का संशय या अविश्वास बना रहे, तो सबसे सुरक्षित विकल्प यही है कि बिना वर्क वाली सादी मिठाइयों का ही चयन करें। इसका आप पर असर त्योहारों में मिठाई खरीदने वाले उपभोक्ताओं और परिवारों के स्वास्थ्य व प्राथमिकताओं पर इसका सीधा असर पड़ता है। • सामग्री की शुद्धता: आज बाजार में उपलब्ध अधिकांश वर्क मशीनों और विशेष पेपर की सहायता से तैयार किया जाता है। इससे शुद्ध शाकाहारी खानपान रखने वाले लोग बिना किसी झिझक के मिठाई का चयन कर सकते हैं। • पैकेजिंग की जांच: सीलबंद मिठाई के डिब्बों पर अब निर्माता शाकाहारी वर्क का विशेष प्रमाणन अंकित करते हैं। खरीदारी करते समय डिब्बे पर दिए गए लेबल को देखकर ही अंतिम निर्णय लें। • हलवाइयों से पूछताछ: स्थानीय दुकानों से खुली मिठाई लेते समय विक्रेता से वर्क के स्रोत के बारे में स्पष्ट जानकारी ली जा सकती है। यदि दुकानदार स्पष्ट जानकारी न दे सके, तो बिना वर्क वाली सादी मिठाई खरीदना ही सुरक्षित रहेगा। • स्वास्थ्य और स्वच्छता: पुरानी विधि की तुलना में मशीनी तकनीक से तैयार वर्क बैक्टीरिया और संक्रमण के खतरे को न्यूनतम कर देता है। इससे त्योहारों के दौरान पेट से जुड़ी बीमारियों और अशुद्धियों से बचाव होता है। ऐसा क्यों हुआ चांदी के वर्क को लेकर उठा विवाद इसके निर्माण की पुरानी पारंपरिक पद्धति और उसमें पशु अंगों के उपयोग से जुड़ा हुआ है। स्वास्थ्य और धार्मिक प्राथमिकताओं के चलते सरकारी नियामक ने इस प्रक्रिया में कड़े बदलाव किए। • पारंपरिक निर्माण पद्धति: सदियों से चांदी की शीट को बेहद पतला करने के लिए उसे पशुओं की आंतों और चमड़े के बीच रखकर पीटा जाता था। इस प्रक्रिया में पशु ऊतकों के अंश धातु में घुलने की आशंका रहती थी, जिससे इसे मांसाहारी माना गया। • संक्रमण का खतरा: जानवरों के आंतरिक अंगों के संपर्क में रहने के कारण चांदी के वर्क में जीवाणुओं और रोगाणुओं के पनपने की भारी संभावना रहती थी। इसी स्वास्थ्य जोखिम को देखते हुए खाद्य सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल उठे। • नियामक और अदालती आदेश: 2016 में एफएसएसएआई ने पशु आंतों के प्रयोग पर रोक लगाई, जिसे 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने स्वच्छता की सख्त शर्तों के साथ संशोधित किया। इसके बाद निर्माताओं ने बड़े पैमाने पर मशीनी और पेपर तकनीक को अपनाया। सवाल-जवाब 1. चांदी का वर्क कितना मोटा होता है? चांदी का वर्क एक अत्यंत महीन परत होती है, जिसकी मोटाई 0.2 से 0.8 माइक्रोमीटर के बीच होती है। 2. पारंपरिक तरीके से चांदी का वर्क कैसे बनाया जाता था? पुराने समय में बैल, भैंस, भेड़ या बकरी की आंतों और चमड़े के बीच चांदी रखकर हथौड़े से पीटी जाती थी। 3. एफएसएसएआई ने वर्क बनाने में जानवरों के अंगों के उपयोग पर कब प्रतिबंध लगाया था? फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने वर्ष 2016 में जानवरों की आंत या चमड़े के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था। 4. दिल्ली हाई कोर्ट ने 2018 में वर्क पर क्या फैसला सुनाया था? अदालत ने निर्माताओं की अपील पर प्रतिबंध हटा दिया था, लेकिन यह शर्त रखी थी कि निर्माण प्रक्रिया पूरी तरह साफ-सुथरी और स्वच्छ होनी चाहिए। 5. आज के समय में बाजार में उपलब्ध वर्क कैसे तैयार किया जाता है? वर्तमान में अधिकांश चांदी का वर्क आधुनिक मशीनों और पेपर की मदद से बिना किसी पशु अंग के तैयार किया जाता है। 6. मिठाई खरीदते समय ग्राहक वर्क की शुद्धता कैसे जांच सकते हैं? डिब्बे पर 'वेजिटेरियन वर्क' का लेबल जांचें या हलवाई से पूछें, और संशय होने पर बिना वर्क वाली मिठाई खरीदें। https://trendkia.com/food/mithaiyon-para-sajane-vala-silver-vark-shakahari-hai-ya-mansahari-janie-banane-ka-tarika-aura-niyama-47491 TrendKia — Har trend, sabse pehle.