मिथिला की पारंपरिक पीड़ीकिया बनाने का आसान तरीका, खोया और नारियल के भरावन से लाएं स्वाद बिहार के मधुबनी में पारंपरिक गुजिया यानी पीड़ीकिया हर खुशी और त्योहार पर बनाई जाती है। जानिए खोया और कद्दूकस नारियल के भरावन से इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने और तैयार करने की पूरी विधि। बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में मीठे व्यंजनों की जब भी बात चलती है, गुजिया का नाम सबसे पहले आता है। स्थानीय बोलचाल और मैथिली भाषा में इसे पीड़ीकिया कहा जाता है, जिसका स्वाद मधुबनी समेत पूरे इलाके में बेहद लोकप्रिय है। चाहे घर में किसी प्रियजन या मेहमान का स्वागत करना हो, परिवार के सदस्यों को कुछ मीठा परोसना हो, या फिर रिश्तेदारों के घर सौगात भेजनी हो, पीड़ीकिया हर खास मौके की पहली पसंद बनी रहती है। इसके अलावा जब बच्चे पढ़ाई या कामकाज के सिलसिले में घर से दूर जा रहे होते हैं, तब भी घर की बुजुर्ग महिलाएं उनके सफर के लिए इसे जरूर तैयार करती हैं। मिथिला की सांस्कृतिक परंपरा और छप्पन भोग में स्थान मिथिलांचल के खानपान में गुजिया केवल एक सामान्य पकवान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सवों का अहम हिस्सा है। देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना में इसे प्रमुखता से भोग के रूप में अर्पित किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, पारंपरिक छप्पन भोग की थाली में भी इस खास मिष्ठान को शामिल किया जाता है। क्षेत्रीय घरों में इसे तैयार करने का रिवाज पीढ़ियों से चला आ रहा है और स्वाद में हल्का मीठा होने के कारण इसे हर उम्र के लोग बड़े चाव से खाते हैं। विभिन्न प्रकार और सामग्री तैयार करने का तरीका पीड़ीकिया को कई तरह के भरावन के साथ तैयार किया जा सकता है। कुछ लोग इसमें सूजी का इस्तेमाल करते हैं, जबकि कई घरों में खोया, सूखा नारियल या अन्य मिश्रण भरकर इसे बनाया जाता है। मधुबनी की गृहिणी अंजू देवी इस पारंपरिक मिष्ठान को तैयार करने की आसान विधि साझा करती हैं। वे बताती हैं कि यदि इसे सही तरीके से बनाकर रखा जाए, तो यह पूरे 1 महीने तक बिल्कुल ताजा और खाने योग्य बनी रहती है। घर पर पारंपरिक खोया-नारियल गुजिया बनाने के लिए सबसे पहले शुद्ध दूध को धीमी आंच पर लगातार पकाकर गाढ़ा खोया तैयार कर लिया जाता है। इसके बाद सूखे नारियल को बारीक कद्दूकस किया जाता है। तैयार खोए में कद्दूकस किया हुआ नारियल, थोड़ी सी चीनी और मनपसंद ड्राई फ्रूट्स मिलाए जाते हैं। यह संपूर्ण मिश्रण गुजिया के अंदर भरने वाला मुख्य मसाला बनता है, जिसमें मिठास संतुलित रखी जाती है। गूथने, गुहने और तलने की अंतिम प्रक्रिया भरावन तैयार होने के बाद मैदे को अच्छी तरह से गूथकर चिकना कर लिया जाता है। गूथे हुए मैदे से छोटी-छोटी लोइयां बनाकर उन्हें गोल पूरी के आकार में बेला जाता है। इन पूरियों के बीच में चम्मच की मदद से तैयार खोया और नारियल का मिश्रण भरा जाता है। मिश्रण भरने के बाद पूरी के किनारों को आपस में जोड़ते हुए एक खास पारंपरिक डिजाइन में मोड़ा जाता है, जिसे स्थानीय स्तर पर गुहना कहा जाता है। गुजिया को आकार देने के बाद कढ़ाई में कड़क गर्म तेल तैयार किया जाता है। इन सभी गुजिया को गर्म तेल में डालकर धीमी से मध्यम आंच पर अच्छी तरह डीप फ्राई यानी तला जाता है, जिससे बाहरी परत कुरकुरी हो जाए। तलने के बाद जब गुजिया पूरी तरह ठंडी हो जाए, तब इसे किसी एयरटाइट शीशे के डिब्बे में सुरक्षित रख लिया जाता है। हवा से बचाकर रखने पर यह लंबे समय तक खराब नहीं होती और रोजाना खाने या किसी को उपहार में देने के लिए बिल्कुल उपयुक्त रहती है। इसका आप पर असर पारंपरिक खोया-नारियल गुजिया को सही तरीके से बनाकर और सुरक्षित रखकर आप त्योहारों और रोजमर्रा के खानपान में घर का शुद्ध स्वाद बनाए रख सकते हैं। • शेल्फ लाइफ पर: यदि इसे तलने के बाद पूरी तरह ठंडा करके एयरटाइट कांच के बर्तन में रखा जाए, तो यह पूरे 1 महीने तक खराब नहीं होती है। इससे सफर पर जाने वाले छात्रों और कामकाजी लोगों के लिए यह एक टिकाऊ घरेलू नाश्ता बन जाता है। • मिठास और गुणवत्ता: घर में खोया और कद्दूकस नारियल से तैयार की गई गुजिया बाजार की तुलना में कम मीठी और अधिक स्वास्थ्यप्रद रहती है। शुद्ध सामग्री का प्रयोग करने से आप बाजार के मिलावटी खोए से भी बच सकते हैं। • पारंपरिक उपयोग: घर में पूजा-पाठ, छप्पन भोग या मेहमानों के स्वागत के लिए यह एक प्रतिष्ठित मिष्ठान विकल्प प्रदान करता है। इसे पहले से बनाकर रख लेने पर ऐन वक्त पर मिठाई खरीदने का झंझट खत्म हो जाता है। • बजट और सुविधा: घर पर उपलब्ध दूध, मैदा और सूखे मेवों से बड़ी मात्रा में पीड़ीकिया तैयार करना बाजार की महंगी मिठाइयों के मुकाबले अधिक किफायती पड़ता है। सीमित संसाधनों में भी इसे आसानी से तैयार किया जा सकता है। ऐसा क्यों हुआ मिथिला क्षेत्र में पीड़ीकिया के व्यापक प्रचलन के पीछे वहां की सदियों पुरानी सांस्कृतिक मान्यताएं, सामाजिक रीति-रिवाज और स्थानीय खानपान की जरूरतें शामिल हैं। • सांस्कृतिक व धार्मिक कारण: पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों में छप्पन भोग और देवताओं के भोग में शुद्ध घर की बनी मिठाइयों को अनिवार्य माना जाता है। इसी पवित्रता और परंपरा के कारण हर पूजा और त्योहार पर इसे प्रमुखता से बनाया जाता है। • सफर और स्थायित्व की जरूरत: जब परिवार के बच्चे रोजगार या शिक्षा के लिए दूर जाते हैं, तो उन्हें ऐसा भोजन चाहिए होता है जो हफ्तों तक खराब न हो। कड़क तेल में तली और एयरटाइट जार में रखी जाने वाली गुजिया 1 महीने तक सुरक्षित रहने के कारण सबसे मुफीद साबित होती है। • अतिथिसत्कार की परंपरा: मिथिलांचल में मेहमानों को घर का बना विशिष्ट पकवान परोसने की गहरी सामाजिक परंपरा रही है। पीड़ीकिया का संतुलित स्वाद और खास बनावट इसे सत्कार का सबसे सम्मानित साधन बनाते हैं। सवाल-जवाब 1. मैथिली भाषा में गुजिया को किस नाम से जाना जाता है? मैथिली भाषा में गुजिया को पीड़ीकिया कहा जाता है। 2. खोया और नारियल वाली यह गुजिया कितने दिनों तक खराब नहीं होती? सही तरीके से एयरटाइट शीशे के डिब्बे में रखने पर यह 1 महीने तक सुरक्षित और खाने योग्य बनी रहती है। 3. गुजिया के किनारों को मोड़ने की प्रक्रिया को स्थानीय भाषा में क्या कहते हैं? पूरी में भरावन भरकर किनारों को विशेष डिजाइन में मोड़ने की प्रक्रिया को 'गुहना' कहा जाता है। 4. इस रेसिपी में भरावन तैयार करने के लिए किन सामग्रियों का प्रयोग किया गया है? भरावन तैयार करने के लिए दूध से बने खोए, कद्दूकस किए हुए नारियल, थोड़ी सी चीनी और सूखे मेवों का इस्तेमाल किया गया है। https://trendkia.com/food/mithila-ki-parnparika-pidikiya-banane-ka-asana-tarika-khoya-aura-nariyala-ke-bharavana-se-laen-svada-43678 TrendKia — Har trend, sabse pehle.