मुजफ्फरपुर की 56 साल पुरानी 'गुप्ता जी की लस्सी': तीन परतों वाली यह मिठास आज भी क्यों खींच लाती है भीड़ मुजफ्फरपुर के धर्मशाला इलाके में 1970 से चल रही गुप्ता जी की लस्सी अपनी तीन परतों वाली खास तैयारी के कारण आज भी शहरवासियों और बाहरी मेहमानों की पहली पसंद बनी हुई है। शाही लीची के शहर का एक और स्वाद, जो भुलाया नहीं जा सका मुजफ्फरपुर का नाम सुनते ही ज़्यादातर लोगों के ज़हन में शाही लीची तैर जाती है, लेकिन इस शहर की पहचान सिर्फ़ इसी फल तक सीमित नहीं है। यहाँ कुछ ऐसे पुराने स्वाद भी हैं जो पीढ़ियों से लोगों की जुबान और यादों में बसे हुए हैं। ऐसा ही एक नाम है — गुप्ता जी की लस्सी। पिछले 56 वर्षों से यह लस्सी लोगों को अपनी ओर खींच रही है और आज भी इसकी लोकप्रियता ज़रा भी कम नहीं हुई। शहर के धर्मशाला इलाके में संतोषी माता मंदिर के ठीक सामने यह छोटी-सी दुकान मौजूद है। यहाँ के लोगों के लिए तो यह जगह खास है ही, बाहर से आने वाले मेहमान भी इसका स्वाद चखे बिना लौटना नहीं चाहते। अगर आप कभी मुजफ्फरपुर जाएँ, तो इस लस्सी को एक बार आज़माने की सलाह यहाँ के स्थानीय लोग ज़रूर देते हैं। 1970 में एक आदमी की मेहनत से शुरू हुई कहानी इस दुकान की नींव साल 1970 में स्वर्गीय मोहन प्रसाद ने रखी थी। वे मूल रूप से पटना ज़िले के मनेर के रहने वाले थे और रोज़ी-रोटी की तलाश में मुजफ्फरपुर आकर यहीं के होकर रह गए। अपनी मेहनत और एक अलग ही स्वाद के दम पर उन्होंने इस लस्सी को ऐसी पहचान दिलाई कि देखते-ही-देखते यह दुकान शहर की सबसे चर्चित दुकानों में गिनी जाने लगी। वक़्त के साथ इस खानदानी कारोबार की बागडोर उनके बेटों जितेंद्र प्रसाद गुप्ता और संतोष कुमार गुप्ता के हाथ आ गई। अब तो परिवार की तीसरी पीढ़ी भी इस काम से जुड़ चुकी है और वही पुराना स्वाद, वही पुरानी गुणवत्ता बनाए हुए है। शायद यही वजह है कि इतने सालों बाद भी ग्राहकों का भरोसा इस दुकान पर टिका हुआ है। तीन परतें, जो इसे आम लस्सी से अलग बनाती हैं इस लस्सी की असली जान इसकी तैयारी का तरीका है। इसे दही, चीनी, खोआ और काजू जैसी बढ़िया सामग्री से बनाया जाता है। खास बात यह कि लस्सी को तीन अलग-अलग परतों में सजाकर परोसा जाता है। सबसे नीचे घर के दूध से जमाया गया ताज़ा दही रहता है, उसके ऊपर खोआ की परत और सबसे ऊपर काजू डाला जाता है। यही तरीका इसे साधारण लस्सी से अलग कर देता है और ग्राहक को हर घूँट में एक नया-सा स्वाद महसूस होता है। 75 पैसे से 85 रुपये तक का सफ़र दुकानदार संतोष कुमार गुप्ता बताते हैं कि जब यह लस्सी शुरू हुई थी, तब इसकी कीमत सिर्फ़ 75 पैसे थी। समय बीतने के साथ महँगाई बढ़ी, लागत भी बढ़ी, मगर स्वाद और गुणवत्ता के साथ कभी समझौता नहीं किया गया। आज एक गिलास लस्सी 85 रुपये में मिलती है, फिर भी इसकी माँग में कोई कमी नहीं आई। गर्मी का मौसम आते ही दुकान पर ग्राहकों का जमावड़ा लग जाता है। कुछ लोग वहीं बैठकर इत्मीनान से लस्सी का मज़ा लेते हैं, तो कई इसे पैक करवाकर अपने घरवालों और रिश्तेदारों के लिए साथ ले जाते हैं। https://trendkia.com/food/mujaphpharapura-ki-56-sala-purani-gupta-ji-ki-lassi-tina-paraton-vali-yaha-mitha-540 TrendKia — Har trend, sabse pehle.