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  "title": "पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा पर नॉन-वेज को लेकर क्‍यों छिड़ती है बहस, जानिए इसके पीछे की पूरी वजह",
  "summary": "उत्तर भारत में जहां नवरात्रि के दौरान पूरी तरह सात्विक भोजन किया जाता है, वहीं पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के अवसर पर मांसाहार का सेवन परंपरा का हिस्सा माना जाता है।",
  "content": "जयपुर की रहने वाली शामली ने हाल ही में अपने घर का खाना बनाने वाली सहायिका को निर्देश देते हुए कहा कि आगामी नवरात्रि से पहले रसोई से प्याज और लहसुन पूरी तरह खत्म कर लिए जाएं। देश के बड़े हिस्से में इस त्योहारी सीजन के दौरान सात्विक और शुद्ध शाकाहारी भोजन करने की परंपरा रही है। इसके विपरीत पश्चिम बंगाल एक ऐसा क्षेत्र है जहां दुर्गा पूजा का भव्य उत्सव मनाए जाने के दौरान घरों और रसोइयों से लजीज मांसाहारी व्यंजनों की महक आने लगती है। इस दौरान सरसों के तेल और मसालों के साथ भाप में पकाई जाने वाली हिल्सा मछली यानी इलिश, स्वादिष्ट चिकन करी, धीमी आंच पर तैयार किया जाने वाला कोशा मांगशो, मटन बिरयानी और क्रिस्पी मछली फ्राई जैसे पकवान बंगाल की हवा में रचे-बसे नजर आते हैं। भारतीय संस्कृति और खान-पान की परंपराओं से अनजान लोगों के लिए यह विरोधाभास काफी अनोखा लग सकता है और यही वजह है कि इस विषय पर अक्सर राजनीतिक गलियारों से लेकर सामाजिक मंचों तक गर्मागरम बहस छिड़ जाती है।\n\n \n\nमांसाहार के सेवन पर क्यों खड़ा होता है विवाद\n रविवार को हावड़ा जिले के लिलुआ में आयोजित दुर्गा पूजा के दौरान बागेश्वर बाबा के नाम से मशहूर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने वहां मौजूद हिंदू समुदाय के लोगों से पूरी तरह शाकाहारी भोजन अपनाने की अपील की। उनकी इस सार्वजनिक टिप्पणी के बाद पश्चिम बंगाल के राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने अपने संबोधन में कहा कि वह बंगाल की एक बात से असहज महसूस करते हैं क्योंकि नवरात्रि और दुर्गा पूजा के पावन दिनों के दौरान भी पूजा पंडालों के आसपास मांसाहारी भोजन का सेवन किया जाता है और कई प्रकार के खाद्य पदार्थ पकाए जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आगामी नवरात्रि के दौरान बंगाल के प्रत्येक हिंदू को जागरूक होना चाहिए और ऐसे लोगों को दरकिनार करना चाहिए क्योंकि उनकी नजर में यह परंपरा पवित्र नहीं है और धर्म का अपमान करती है।\n\n दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने इस तरह के बयानों को सिरे से खारिज कर दिया। उनका कहना था कि बंगाली समाज के लिए मछली और मांस का सेवन भोजन का स्वाभाविक हिस्सा है और इसे अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस बात का भी हवाला दिया कि स्वामी विवेकानंद ने खुद इस बात का जिक्र किया था कि मां काली को मटन का भोग लगाया जाता है। सामिक भट्टाचार्य के अनुसार अगर कोई व्यक्ति स्वामी विवेकानंद के विचारों से ऊपर उठने का प्रयास करता है तो यह स्थिति खतरनाक हो सकती है और यह उस संत या उपदेशक की पूरी तरह निजी राय है।\n\n \n\nआर्थिक जानकारों और परंपराओं के जानकारों की राय\n इस पूरी बहस के बीच वित्त मंत्रालय में वर्ष 2017 से 2022 तक प्रधान आर्थिक सलाहकार के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके संजीव सान्याल ने भी नवरात्रि के दौरान मांसाहार न खाने के आग्रह पर अपनी प्रतिक्रिया साझा की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि मांस का सेवन शाक्त हिंदू धर्म परंपरा का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। प्राचीन मान्यताओं और रीति-रिवाजों के अनुसार इसे मां दुर्गा और मां काली को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है। दुर्गा पूजा के दौरान विशेष तौर पर नवमी और दशमी तिथि के दिन भक्तगण जो प्रसाद ग्रहण करते हैं, उसमें मांसाहारी व्यंजन भी शामिल होते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस प्राचीन और पवित्र परंपरा में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।\n\n \n\nबंगाल की संस्कृति और देवी पूजा में मांसाहार का महत्व\n उत्तर भारत में जहां नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान मांस और तामसिक भोजन से पूरी तरह परहेज को पवित्रता, संयम और सात्विकता से जोड़ा जाता है, वहीं बंगाल में दुर्गा पूजा को देवी के अपने मायके आने यानी घर वापसी, वहां की विशिष्ट संस्कृति और पीढ़ियों पुरानी परंपरा के रूप में देखा जाता है। इस क्षेत्र में नवरात्रि केवल उपवास या व्रत रखने का समय नहीं है, बल्कि यह भव्य भोज के माध्यम से अपनी गहरी भावनाएं प्रकट करने का एक सुंदर जरिया है। बंगाल की खान-पान की आदतों पर वहां की भौगोलिक स्थिति और ऐतिहासिक मान्यताओं का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। बड़ी-बड़ी नदियों और अत्यधिक उपजाऊ भूमि से घिरे होने के कारण इस प्रदेश में मछली सदियों से स्थानीय भोजन का सबसे अनिवार्य हिस्सा रही है।\n\n प्रसिद्ध इतिहासकार नृसिंह भादुरी के अनुसार बंगाल में किसी भी धार्मिक पर्व या बड़े त्यौहार के दौरान मछली और मांस का सेवन करना ईश्वरीय आशीर्वाद और कृपा प्राप्त करने जैसा समझा जाता रहा है। यहां भोजन को पवित्रता और उत्सव का एक अनूठा संगम मानने की मानसिकता पूरी बंगाली संस्कृति में गहराई से रच-बस चुकी है। बंगाल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में मछली को मुख्य रूप से समृद्धि, उर्वरता और शुभता का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि केवल दुर्गा पूजा ही नहीं बल्कि विवाह समारोहों और अन्य सभी शुभ अवसरों पर भी मछली का विशेष और अहम स्थान होता है। देवी को मछली अर्पित करना केवल किसी तांत्रिक विधि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वहां की लोक-आस्था और जन-परंपरा का एक जीवंत हिस्सा है।\n\n \n\nवैष्णव और शाक्त परंपरा का बुनियादी अंतर\n पश्चिम बंगाल के कई ऐतिहासिक मंदिरों में पशु-बलि की प्रथा के साथ-साथ मांसाहारी प्रसाद भी देवी को चढ़ाया जाता है। देवी के अत्यंत प्रचंड और ऊर्जावान स्वरूप मां काली की आराधना में अक्सर बकरे की बलि दिए जाने का विधान है और उसी मांस को प्रसाद के रूप में पकाकर भक्तों के बीच वितरित किया जाता है। इसके विपरीत दुर्गा पूजा के दौरान मुख्य रूप से खिचड़ी और तली-भुनी सब्जियों का भोग लगाया जाता है, लेकिन बंगाल के कई पारंपरिक समुदायों में मछली और मांस भी देवी को समर्पित किए जाते हैं। इसके उलट उत्तर भारत में ज्यादातर जगहों पर वैष्णव परंपरा का कड़ाई से पालन किया जाता है, जहां शाकाहारी भोजन को भक्ति की सर्वोच्च शुद्धता का प्रतीक माना जाता है।\n\n दूसरी तरफ बंगाल की शाक्त परंपरा पूरी तरह से देवी-उपासना पर केंद्रित है, जो शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के नैवेद्य को समान रूप से आदर और सम्मान की दृष्टि से देखती है। शाक्त दर्शन के जानकारों के अनुसार देवी ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड और सृष्टि की मूल शक्ति हैं। इस जगत में जो कुछ भी मौजूद है, वह सब उसी सर्वोच्च शक्ति का ही विस्तार है। यही वजह है कि सात्विक, राजस और तामस, इन तीनों प्रकार के भोग देवी को समर्पित किए जा सकते हैं क्योंकि देवी इन सभी सीमाओं से परे स्थित हैं। दरअसल हमारे देश की मूल खूबसूरती इसी विविधता में निहित है, जहां एक तरफ यह पावन उत्सव उत्तर भारत में पूर्ण संयम और सात्विकता के साथ शाकाहारी रूप में मनाया जाता है, वहीं दूसरी तरफ बंगाल मां की आराधना में तल्लीन होकर उन्हें सात्विक, राजस और तामस तीनों रूपों में पूजता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. उत्तर भारत और पश्चिम बंगाल में नवरात्रि के खान-पान में क्या अंतर है?\nउत्तर भारत में नवरात्रि के दौरान पूरी तरह सात्विक और शाकाहारी भोजन किया जाता है, जबकि पश्चिम बंगाल में इस दौरान मछली और मांस जैसे मांसाहारी व्यंजन परंपरा का हिस्सा होते हैं।\n\n2. पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार पर हाल ही में किसने टिप्पणी की थी?\nबागेश्वर बाबा के नाम से जाने जाने वाले धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने हावड़ा जिले के लिलुआ में दुर्गा पूजा के दौरान हिंदुओं से शाकाहारी भोजन अपनाने की अपील की थी।\n\n3. संजीव सान्याल ने नवरात्रि में मांसाहार को लेकर क्या कहा है?\nसंजीव सान्याल के अनुसार मांस शाक्त हिंदू धर्म का हिस्सा है और इसे प्राचीन परंपरा के तहत मां दुर्गा और मां काली को चढ़ाया जाता है।\n\n4. बंगाल की संस्कृति में मछली को किसका प्रतीक माना जाता है?\nबंगाल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में मछली को समृद्धि, उर्वरता और शुभता का प्रतीक माना जाता है।",
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  "category": "खानपान",
  "publishedAt": "2026-09-08",
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