पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पुराने बागों में जिंदा है तामूरिया आम की सदियों पुरानी कहानी तामूरिया आम उत्तर प्रदेश के रटौल क्षेत्र की एक दुर्लभ किस्म है जिसका नाम 15वीं सदी के विजेता तैमूर से जुड़ा है। यह आम अब केवल पुराने बागों में उगता है और इसका उत्पादन बढ़ नहीं रहा। बाजार में मौजूद एक अनजानी किस्म गर्मियों का मौसम आते ही मंडियों में आमों की भरमार हो जाती है। दशहरी, लंगड़ा जैसे जाने-पहचाने नामों के बीच एक ऐसी किस्म भी है जो अपने साथ सदियों पुरानी एक ऐतिहासिक दास्तान लेकर आती है। इसका नाम है तामूरिया आम। यह किस्म मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के रटौल क्षेत्र में पाई जाती है और आम बाजार में यह बहुत कम देखने को मिलती है। 15वीं सदी के विजेता से जुड़ा है नाम इस आम का नाम किसी किसान या गांव के नाम पर नहीं, बल्कि एक मध्य एशियाई सैन्य विजेता के नाम पर रखा गया है। 15वीं शताब्दी में दिल्ली पर हमला करने के लिए आए तैमूर साम्राज्य के संस्थापक तैमूर की सेना इसी रटौल क्षेत्र से होकर गुजरी थी। ऐतिहासिक मान्यता यह है कि उस दौरान तैमूर ने इस इलाके में रुककर इस खास किस्म के आम का स्वाद चखा था। उसी जुड़ाव की वजह से इसे 'तैमूर' या 'तामूरिया' कहा जाने लगा। कृषि वैज्ञानिक ने क्या बताया कृषि वैज्ञानिक डॉ. दीपक मेहंदीरत्ता के मुताबिक, तामूरिया आम भारत की उन पुरानी और पारंपरिक किस्मों में से एक है जो आज व्यावसायिक खेती में बहुत पीछे हैं। लेकिन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से यह किस्म बेहद दिलचस्प मानी जाती है। डॉ. मेहंदीरत्ता बताते हैं कि आकार में यह आम पतला होता है और कच्चे में इसका रंग गहरा हरा रहता है। पकने के बाद यह पीले रंग में बदल जाता है। खट्टा-मीठा स्वाद और हल्की खुशबू तामूरिया आम का स्वाद बाकी किस्मों से थोड़ा अलग है। यह ज्यादातर मीठा होता है, लेकिन इसमें हल्की-सी खटास भी रहती है। यही मिश्रण इसे एक अलग और सुखद स्वाद देता है। इसकी खुशबू तेज नहीं होती, बल्कि हल्की और आकर्षक रहती है जो इसे और भी खास बनाती है। कहां उगता है यह आम भौगोलिक रूप से यह किस्म सीमित इलाकों में ही पाई जाती है। बागपत के आसपास का रटौल क्षेत्र इसका मुख्य उत्पादन केंद्र है। इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ और सहारनपुर के कुछ हिस्सों में भी यह मिलता है। एक अहम बात यह है कि यह आम केवल पुराने बागों में ही उगता है। उत्पादन थमा है, पर बाजार में आता है फिलहाल तामूरिया आम के नए पेड़ नहीं लगाए जा रहे और न ही इसका उत्पादन बढ़ाने की कोई खास कोशिश हो रही है। जो पुराने बाग दशकों से चले आ रहे हैं, उन्हीं के दम पर यह आम हर सीजन में बाजार तक पहुंचता है। इसके बावजूद जो लोग एक बार इसका स्वाद चख लेते हैं, वे इसे खूब पसंद करते हैं। इसका आप पर असर • भारत में: तामूरिया जैसी दुर्लभ देसी आम किस्मों के बारे में जागरूकता बढ़ने से देशभर के उपभोक्ता अपनी कृषि विरासत को बेहतर समझ सकते हैं और इसे बचाने की मांग उठा सकते हैं। • पश्चिमी उत्तर प्रदेश में: मेरठ, सहारनपुर और बागपत के स्थानीय बाजारों में इस सीजन तामूरिया आम खरीदकर लोग सीधे पुराने बागानों के किसानों की मदद कर सकते हैं और इस किस्म को जिंदा रखने में योगदान दे सकते हैं। सवाल-जवाब 1. तामूरिया आम का नाम कैसे पड़ा? इसका नाम 15वीं सदी के मध्य एशियाई सैन्य विजेता और तैमूर साम्राज्य के संस्थापक तैमूर के नाम पर रखा गया है। माना जाता है कि दिल्ली पर आक्रमण के दौरान तैमूर रटौल क्षेत्र में रुका था और उसने इस किस्म का स्वाद चखा था। 2. तामूरिया आम कहां उगता है? यह मुख्य रूप से बागपत के पास रटौल क्षेत्र में उगता है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ व सहारनपुर के कुछ इलाकों में भी पाया जाता है। 3. इस आम का स्वाद और रंग कैसा होता है? यह आम ज्यादातर मीठा होता है लेकिन इसमें हल्की खटास भी रहती है। कच्चे में इसका रंग गहरा हरा होता है और पकने के बाद यह पीला हो जाता है। 4. क्या यह आम व्यावसायिक रूप से उगाया जाता है? नहीं, तामूरिया आम बहुत ज्यादा व्यावसायिक नहीं है। यह केवल पुराने बागों में उगता है और इसके नए पेड़ नहीं लगाए जा रहे। 5. यह आम बाजार में कैसे पहुंचता है? पुराने बागों के जरिए ही हर सीजन में यह आम बाजार तक पहुंचता है, क्योंकि फिलहाल कोई नई खेती नहीं हो रही। 6. डॉ. दीपक मेहंदीरत्ता ने इस आम के बारे में क्या कहा? उन्होंने बताया कि यह भारत की पारंपरिक और पुरानी किस्मों में से एक है जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बेहद दिलचस्प है, भले ही व्यावसायिक रूप से यह बहुत आगे नहीं है। https://trendkia.com/food/pashchimi-uttar-pradesh-ke-purane-bagon-men-jinda-hai-tamuria-ama-ki-sadiyon-purani-kahani-2129 TrendKia — Har trend, sabse pehle.