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  "type": "article",
  "title": "पटना के न्यू मार्केट में 70 साल पुरानी दुकान, जमीन पर बैठकर आज भी पान खिला रहे अशोक प्रसाद चौरसिया",
  "summary": "पटना के न्यू मार्केट में करीब सात दशक से चल रही इस पान की दुकान को अशोक प्रसाद चौरसिया अपनी परिवार की तीसरी पीढ़ी के रूप में संभाल रहे हैं, जहां आज भी पारंपरिक अंदाज में जमीन पर बैठकर ग्राहकों को पान परोसा जाता है।",
  "content": "पटना के न्यू मार्केट इलाके में वक्त के पहिए के साथ बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन पान परोसने का अंदाज और पुरानी तहजीब आज भी वैसी ही कायम है। यहां न तो कोई आधुनिक चमचमाता काउंटर है और न ही एयरकंडीशनर से सजा कोई शोरूम। जमीन पर पालथी मारकर बैठे और पान तैयार करते अशोक प्रसाद चौरसिया को देखकर ऐसा महसूस होता है, मानो शहर का बीता हुआ दौर और उसकी पुरानी रौनक आज भी यहीं ठहर गई है। करीब 70 साल पुरानी इस मशहूर दुकान को अशोक प्रसाद अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी के तौर पर आगे बढ़ा रहे हैं, जहां कभी महज 10 पैसे में मिलने वाला पान आज महंगाई के दौर में 10 से 20 रुपये तक की कीमत में बिक रहा है, लेकिन ग्राहकों को स्वाद परोसने का उनका पारंपरिक तरीका आज भी जरा भी नहीं बदला है।\n\n \n\nमहज 10 साल की उम्र से शुरू किया था पान बनाना\n अशोक प्रसाद चौरसिया बताते हैं कि उनके परिवार में पान का यह कारोबार उनके दादा के जमाने से शुरू हुआ था। दादा के बाद उनके पिता ने इस विरासत को संभाला और अब वह खुद इस पुश्तैनी काम की तीसरी कड़ी को संभाल रहे हैं। उन्होंने महज 10 साल की छोटी सी उम्र में ही पान के पत्ते को सिकोड़ना, उसमें कत्था-चूना लगाना और ग्राहकों की पसंद के मुताबिक मसाले भरना सीख लिया था। आज उनकी उम्र लगभग 70 वर्ष हो चुकी है, मगर उनका यह हुनर और दुकान चलाने का पुराना तरीका जस का तस बना हुआ है। उनके लिए यह काम सिर्फ आजीविका का साधन मात्र नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक अनमोल पारिवारिक परंपरा है जिसे वह पूरी शिद्दत के साथ निभा रहे हैं।\n\n \n\nसमय के साथ 10 पैसे से 20 रुपये तक पहुंची पान की कीमत\n छह दशक से भी अधिक लंबे वक्त से लगातार दुकान संभाल रहे अशोक प्रसाद ने अपनी आंखों के सामने पान की कीमतों में आए भारी बदलाव को देखा है। वह याद करते हुए बताते हैं कि जब उन्होंने बचपन में लगभग 10 साल की उम्र में दुकान पर बैठना शुरू किया था, तब एक सादा या मसालेदार पान महज 10 से 15 पैसे में मिल जाता था। समय बीतने के साथ और महंगाई बढ़ने के कारण इसके दामों में भी लगातार बढ़ोतरी होती चली गई। आज उनकी इस दुकान पर ग्राहकों को पान के लिए 10, 12, 15 और 20 रुपये तक चुकाने पड़ते हैं, जो बदलते वक्त की आर्थिक हकीकत को बयां करता है।\n\n \n\nतरह-तरह के स्वाद और किस्मों के लिए मशहूर है दुकान\n अशोक प्रसाद की इस दुकान पर अलग-अलग जायके और पसंद रखने वाले शौकीनों के लिए कई वैरायटी के पान उपलब्ध रहते हैं। यहां हरा पान, पीला पान, मगही पान और मीठा पत्ता ग्राहकों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। अशोक प्रसाद चौरसिया बताते हैं कि उनकी दुकान पर सबसे ज्यादा मांग पीले पान की रहती है, जिसे लोग बड़े चाव से खरीदते हैं। इसके अलावा मगही पान, हरा पान और मीठा पत्ता खाने वाले खरीदार भी यहां खिंचे चले आते हैं। दुकान पर आने वाले हर ग्राहक की पसंद अलग होती है; कोई अपने पान में जर्दा और दूसरे पारंपरिक मसाले डलवाना पसंद करता है, तो कोई केवल सौंफ डालकर सादा पान खाना ही बेहतर समझता है। वह हर ग्राहक के बताए अनुसार ही उनके स्वाद का खास ख्याल रखकर पान तैयार करते हैं।\n\n \n\nबनारसी पान बनाने का पारंपरिक और अनूठा अंदाज\n पान तैयार करने के दौरान अशोक प्रसाद एक-एक सामग्री को बेहद करीने से अपने हाथों से मिलाते हैं। वह चूना, कत्था, तुलसी, 64, 300, निर्मली, इलायची, सुपारी और अन्य जरूरी सामग्रियों का संतुलित इस्तेमाल करते हैं। उनके हाथों की यह बरसों पुरानी कला और पान बनाने का देसी तरीका ही इस छोटी सी दुकान को शहर की दूसरी आधुनिक दुकानों से बिल्कुल अलग पहचान दिलाता है। ग्राहक उनके हाथ के बने पान के स्वाद के दीवाने हैं और इस पुरानी शैली की वजह से ही उनका यह कारोबार आज भी अपनी अलग धाक जमाए हुए है।\n\n \n\nवक्त के साथ बिछड़े पुराने ग्राहक और कम हुई रौनक\n एक वक्त ऐसा था जब अशोक प्रसाद के पास ग्राहकों का तांता लगा रहता था और सचिवालय समेत दूर-दूर से लोग उनके हाथों का पान खाने पहुंचते थे। लेकिन समय के पहिए के साथ उनके कई पुराने और वफादार ग्राहक या तो सेवानिवृत्त हो चुके हैं, या फिर उन्होंने बढ़ती उम्र के चलते घर से बाहर निकलना कम कर दिया है। इसके अलावा कई पुराने खरीदार अब इस दुनिया में नहीं रहे और कुछ लोग अपने बच्चों के साथ शहर छोड़कर दूसरे स्थानों पर बस गए हैं। अशोक प्रसाद चौरसिया दुख के साथ कहते हैं कि अब पहले वाले ग्राहकों में से गिने-चुने लोग ही बचे हैं, जो आज भी पुरानी यादों के सहारे उनकी दुकान पर आ जाते हैं।\n\n \n\nकारोबार को प्रभावित करने वाली नई चुनौतियां\n अशोक प्रसाद चौरसिया बताते हैं कि पहले उनकी दुकान पर लगातार खरीदारों की भीड़ उमड़ती रहती थी और व्यस्तता के कारण उनके हाथ रुकने का नाम नहीं लेते थे, लेकिन अब बिक्री में पहले जैसी तेजी नहीं बची है। हाल के दिनों में स्थानीय स्तर पर निर्माण कार्य और सड़क से जुड़े कामों की वजह से रास्ते बंद होने के कारण आसपास के तमाम कारोबारियों के साथ-साथ उनके धंधे पर भी काफी बुरा असर पड़ा है। इसके अलावा बाजार में गुटखा, पान मसाला और अन्य डिब्बा बंद तैयार उत्पादों के अंधाधुंध चलन ने भी पारंपरिक पान की इन पुरानी दुकानों की बिक्री को तगड़ा झटका दिया है।\n\n \n\nन्यू मार्केट में आज भी जिंदा है पुरानी तहजीब की पहचान\n\n शहर के बदलते स्वरूप, लोगों की बदलती पसंद और आधुनिकता की तमाम चुनौतियों के बीच अशोक प्रसाद चौरसिया आज भी अपनी उसी पुरानी जगह पर डटे हुए हैं, जहां कभी उनके पिता और दादा बैठकर कारोबार किया करते थे। न्यू मार्केट में चौरसिया लिट्टी दुकान के ठीक नीचे स्थित उनकी यह पान की दुकान आज भी पुरानी संस्कृति की जीवंत मिसाल है। दुकान के पास बोर्ड पर किशोरी जी पान दुकान का नाम भी लिखा हुआ है, जहां पहुंचकर आज भी पुराने अंदाज में पान का लुत्फ उठाया जा सकता है।\n\nइसका आप पर असर\nयह खबर पाठकों को स्थानीय परंपराओं, छोटे पारिवारिक व्यवसायों के संघर्ष और बदलते दौर में पारंपरिक खानपान की दुकानों के अस्तित्व के बारे में जागरूक करती है।\n\n• भारत में: देश भर में ऐसे कई पुश्तैनी और छोटे पारंपरिक कारोबारी आधुनिक पैकेज्ड उत्पादों और बाजार की नई प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इससे यह समझ आता है कि कैसे पीढ़ियों पुराना खानपान का हुनर धीरे-धीरे कॉर्पोरेट बदलावों से प्रभावित हो रहा है।\n\n• पटना में: न्यू मार्केट क्षेत्र के स्थानीय निवासियों और पुराने ग्राहकों को यह दुकान शहर की पुरानी विरासत और संस्कृति की याद दिलाती है। इलाके में चल रहे निर्माण कार्यों और रास्तों के बंद होने से स्थानीय दुकानदारों के कारोबार पर सीधा असर पड़ रहा है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह स्थिति पारिवारिक विरासत को सहेजने की प्रतिबद्धता और आधुनिक बाजार में आए बदलावों के कारण उत्पन्न हुई है।\n\n• पारंपरिक विरासत: दादा और पिता के शुरू किए गए काम को तीसरी पीढ़ी द्वारा आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता इस दुकान के सात दशकों से टिके रहने का मुख्य कारण है।\n\n• बाजार में बदलाव: गुटखा और अन्य तैयार उत्पादों के बढ़ते चलन ने पारंपरिक पान की बिक्री को सीधे तौर पर प्रभावित किया है।\n\n• बुनियादी ढांचे की बाधाएं: स्थानीय स्तर पर चल रहे निर्माण कार्य और रास्ते बंद होने की वजह से ग्राहकों का आना-जाना कम हुआ है, जिससे कारोबार मंद पड़ा है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. यह पान की दुकान पटना में कहां स्थित है?\nयह पान की दुकान पटना के न्यू मार्केट में चौरसिया लिट्टी दुकान के नीचे स्थित है।\n\n2. इस दुकान को चलाते हुए कितने साल हो गए हैं?\nयह दुकान करीब 70 साल पुरानी है और इसे अशोक प्रसाद चौरसिया अपनी परिवार की तीसरी पीढ़ी के रूप में संभाल रहे हैं।\n\n3. अशोक प्रसाद ने किस उम्र में पान बनाना सीखा था?\nअशोक प्रसाद ने महज 10 साल की उम्र में ही पान बनाना और ग्राहकों को खिलाना सीख लिया था।\n\n4. वर्तमान में दुकान पर पान की कीमत क्या है?\nउनकी दुकान पर आज पान की कीमत 10, 12, 15 और 20 रुपये तक है।\n\n5. उनकी दुकान पर कौन सा पान सबसे ज्यादा बिकता है?\nअशोक प्रसाद चौरसिया की दुकान पर सबसे ज्यादा पीले पान की बिक्री होती है।\n\n6. दुकान के पास कौन सा नाम लिखा हुआ है?\nदुकान के पास किशोरी जी पान दुकान का नाम भी लिखा हुआ है।\n\nप्रेरणा और सबक\nअशोक प्रसाद चौरसिया के जीवन और उनके सात दशक पुराने संघर्ष से एक मजबूत प्रेरणा मिलती है।\n\n• पारिवारिक विरासत का सम्मान: पुरखों के द्वारा शुरू किए गए पुश्तैनी काम को कठिन परिस्थितियों में भी पूरी ईमानदारी और लगन के साथ आगे जारी रखना चाहिए।\n\n• साادگی और समर्पण: आधुनिक चमक-दमक के पीछे भागने के बजाय अपने काम के प्रति सच्ची निष्ठा और मेहनत पर भरोसा रखना सफलता की कुंजी है।\n\n• बदलाव के बावजूद अडिग रहना: बाजार में नई चुनौतियां आने के बाद भी अपने पारंपरिक हुनर और गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं करना चाहिए।",
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  "category": "खानपान",
  "publishedAt": "2026-10-23",
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