पटना जंक्शन के पास 50 साल पुरानी दुकान की चंद्रकला मिठाई देश और विदेश तक मशहूर पटना के न्यू मार्केट में पिलर नंबर 6 के सामने मिलने वाली चंद्रकला मिठाई की मांग पुणे, दिल्ली और विदेश तक फैली है, जहां 25 रुपये प्रति पीस वाली यह खास मिठाई एक हफ्ते तक बिल्कुल ताजा बनी रहती है। बिहार की राजधानी में सफर करने वाले मुसाफिरों और शहर के बाशिंदों के लिए पटना जंक्शन के पास मिलने वाली पारंपरिक मिठाइयां हमेशा खास आकर्षण रही हैं। रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर न्यू मार्केट की तरफ रुख करने पर मस्जिद के ठीक सामने और पिलर नंबर 6 के नजदीक स्थित ए1 चंद्रकला की दुकान पर दिनभर ग्राहकों का तांता लगा रहता है। इस दुकान की असली पहचान केवल पारंपरिक स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां आने वाले खरीदारों की पीढ़ियों पुरानी यादें और गहरा पारिवारिक जुड़ाव भी इससे जुड़ा हुआ है। जो लोग रोजी-रोटी, पढ़ाई या कारोबार के सिलसिले में शहर से दूर रहते हैं, वे जब भी यहां से गुजरते हैं तो अपने परिजनों और बच्चों के लिए इस मिठाई का डिब्बा ले जाना कतई नहीं भूलते। पुणे के छात्रों से लेकर दिल्ली तक नियमित पहुंच दुकान का संचालन संभाल रहे धीरज कुमार चौरसिया के अनुसार बिहार से महाराष्ट्र के पुणे शहर में पढ़ाई करने गए युवाओं के बीच इस चंद्रकला का जबरदस्त लगाव देखा जाता है। वहां रहने वाले छात्रों के माता-पिता जब भी पटना आते हैं, तो उनकी वापसी की तैयारी में यह मिठाई सबसे ऊपर रहती है। इसी तरह राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी इस खास स्वाद के मुरीदों की तादाद इतनी ज्यादा है कि वहां के लिए लगभग हर रोज पार्सल के जरिए मिठाई रवाना की जाती है। यह दुकान रोजाना सुबह 11 बजे अपने शटर उठाती है और उसके तुरंत बाद ही खरीदारों की कतारें लग जाती हैं। मिठाई की बिक्री और ग्राहकों के आने-जाने का यह सिलसिला बिना रुके रात 8 बजे तक लगातार जारी रहता है। खोवा, मेवे और तलने की बारीकियों का अनूठा मेल चंद्रकला बनाने की प्रक्रिया को अगर सतही तौर पर देखा जाए तो यह काफी सीधी और सरल लग सकती है, लेकिन इसके असल स्वाद और कुरकुरेपन को कायम रखने के लिए कच्ची सामग्रियों के चुनाव और पकाने के हुनर पर बेहद पैनी नजर रखनी पड़ती है। धीरज कुमार चौरसिया बताते हैं कि इसे तैयार करने के लिए सबसे पहले मैदे की दो अलग-अलग पूड़ियां बेली जाती हैं। इसके बाद इन दोनों परतों के बीच शुद्ध मावा यानी खोवा भरा जाता है और उसमें पसंद के मुताबिक सूखे मेवे मिलाए जाते हैं। यही अंदरूनी भरावन इस पारंपरिक व्यंजन को अपना गहरा स्वाद और महक देता है। भरावन के बाद इसे सही तापमान पर तलना सबसे नाजुक और अहम पड़ाव माना जाता है। कारीगरों का कहना है कि भट्टी की आंच और तलने की अवधि में अगर रत्ती भर भी चूक हो जाए, तो अंदर मौजूद खोवा जलकर काला पड़ सकता है, जिससे पूरी मिठाई का जायका कड़वा हो जाता है। इसलिए हर एक चंद्रकला को बहुत धैर्य और सटीक तकनीक के साथ तला जाता है ताकि बाहरी आवरण सुनहरा और अंदर का हिस्सा पूरी तरह रसीला बना रहे। हफ्ते भर की शेल्फ लाइफ और ट्रेन तक पहुंचाने की कोशिश दुकानदार का कहना है कि उनकी तैयार की गई चंद्रकला की बनावट और पकाने का तरीका ऐसा है कि इसे करीब एक सप्ताह तक बिना किसी खराबी के सामान्य रूप से रखकर खाया जा सकता है। लंबी शेल्फ लाइफ होने के कारण ही लोग इसे देश के दूर-दराज के शहरों के अलावा सात समंदर पार दूसरे देशों में रहने वाले अपने रिश्तेदारों तक सुरक्षित भेज पाते हैं। इस दुकान की शोहरत का आलम यह है कि पटना स्टेशन से गुजरने वाली ट्रेनों में बैठे यात्री भी फोन करके बोगी तक डिलीवरी का आग्रह करते हैं। दुकानदार ने एक वाकया साझा करते हुए बताया कि एक मर्तबा साप्ताहिक अवकाश के दिन, जब दुकान बंद थी, तब रेलगाड़ी से गुजर रहे एक नियमित ग्राहक का फोन आया जिन्हें अपनी सीट पर ही यह मिठाई चाहिए थी। हालांकि उस दिन दुकान पूरी तरह बंद होने के चलते उनकी यह मांग पूरी नहीं की जा सकी। संचालक का साफ कहना है कि वे कोई पेशेवर या औपचारिक ट्रेन डिलीवरी सेवा नहीं चलाते हैं, लेकिन जब कोई पुराना कद्रदान या इस स्वाद का दीवाना दिली गुजारिश करता है, तो वे मानवीय नाते और भरोसे के सम्मान के लिए बोगी तक मिठाई पहुंचाने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं। पचास साल से अधिक पुराना सफर और चंद्रमा की कलाओं से जुड़ा नाम वर्तमान समय में ए1 चंद्रकला की दुकान पर एक पीस मिठाई की कीमत 25 रुपये तय है। दुकान की स्थापना की कोई तय तारीख या औपचारिक दस्तावेज भले किसी के पास न हों, लेकिन वहां भट्टी पर मौजूद एक पुराने कारीगर बताते हैं कि वे खुद बीते 50 वर्षों से इसी स्थान पर चंद्रकला तलने का काम कर रहे हैं। इस लंबी अवधि से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह प्रतिष्ठान आधी सदी से भी अधिक समय से अपनी सेवाएं दे रहा है। वर्तमान में चौरसिया परिवार की दूसरी पीढ़ी इस कारोबार की बागडोर संभाले हुए है और उनका मानना है कि पारंपरिक ग्राहकों के भरोसे को टिकाए रखने के लिए गुणवत्ता से कभी कोई समझौता नहीं किया जा सकता। मिठाई के नामकरण को लेकर भी दुकानदार का एक बेहद रोचक दर्शन है। वे स्पष्ट करते हैं कि चंद्रकला का सीधा संबंध चंद्रमा की सोलह कलाओं से प्रेरित है। इस मिठाई को भट्टी पर तैयार करने से लेकर थाली में परोसकर खाने तक, हर कदम पर एक खास हुनर और सावधानी की दरकार होती है। तैयार करते समय जहां खोवा जलने से बचाना सबसे बड़ी चुनौती है, वहीं चाशनी में डूबी होने के कारण इसे खाते समय भी विशेष ध्यान रखना पड़ता है ताकि अंदर भरा मीठा रस छलक कर कपड़ों पर न गिर जाए। इस तरह यह केवल आटा, खोवा और मेवे का मिश्रण नहीं, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव और पाक कला का जीता-जागता नमूना है। इसका आप पर असर पटना की यह पारंपरिक मिठाई दूर रहने वाले प्रवासियों और यात्रियों के लिए किफायती और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाला प्रामाणिक उपहार विकल्प उपलब्ध कराती है। • पटना में: स्थानीय निवासियों और जंक्शन से गुजरने वाले रेल यात्रियों को पिलर नंबर 6 के पास मात्र 25 रुपये में प्रामाणिक पारंपरिक मिठाई मिलती है। सुबह 11 बजे से रात 8 बजे के बीच पहुंचकर ग्राहक सीधे ताजा तैयार पीस खरीद सकते हैं। • बिहार के बाहर: दिल्ली, पुणे और अन्य शहरों में रहने वाले परिजनों के लिए इसे आसानी से भेजा जा सकता है क्योंकि यह एक हफ्ते तक खराब नहीं होती। यात्रा के दौरान बिना फ्रिज के भी यह मिठाई पूरी तरह खाने योग्य बनी रहती है। • सफर करने वालों के लिए: ट्रेन से गुजरने वाले पुराने ग्राहक विशेष अनुरोध पर बोगी तक मिठाई मंगवाने का प्रयास कर सकते हैं। हालांकि यह कोई तय डिलीवरी सेवा नहीं है, फिर भी जरूरी होने पर दुकान से संपर्क किया जा सकता है। • पारंपरिक स्वाद के शौकीनों के लिए: शुद्ध खोवा और मेवे से तैयार होने के कारण यह मिलावटी मिठाइयों के मुकाबले ज्यादा भरोसेमंद स्वाद प्रदान करती है। ग्राहक इसे पारिवारिक आयोजनों और त्योहारों के दौरान उपहार देने के लिए चुन सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ इस दुकान की लोकप्रियता और दूर-दराज तक मांग का मुख्य कारण इसकी अनूठी निर्माण शैली और एक सप्ताह तक सुरक्षित रहने वाली गुणवत्ता है। • लंबी शेल्फ लाइफ का कारण: मैदे की दोहरी परत और खोवे तथा मेवे के सटीक मिश्रण को संतुलित आंच पर तलने से यह सात दिनों तक सुरक्षित रहती है। इस विशिष्ट बनावट के चलते प्रवासी परिजन इसे आसानी से दूसरे शहरों और विदेशों तक भेज पाते हैं। • कच्चे माल और कारीगरी पर जोर: भट्टी की आंच पर मामूली चूक भी खोवे को जला सकती है, इसलिए 50 साल से काम कर रहे अनुभवी कारीगरों द्वारा ही इसे तला जाता है। यही पाक कौशल दशकों बाद भी इसके स्वाद को स्थिर बनाए रखने में सक्षम रहा है। • ग्राहक निष्ठा और भावनात्मक जुड़ाव: दूसरी पीढ़ी के संचालक व्यक्तिगत स्तर पर पुराने ग्राहकों के अनुरोध का सम्मान करते हैं और कभी-कभार ट्रेन तक भी पैकेट पहुंचाते हैं। गुणवत्ता और मानवीय व्यवहार के इसी तालमेल ने नई प्रतिस्पर्धा के बावजूद इस पहचान को बरकरार रखा है। सवाल-जवाब 1. ए1 चंद्रकला की दुकान पटना में कहां स्थित है? यह दुकान पटना जंक्शन से न्यू मार्केट की ओर जाने पर मस्जिद के सामने, पिलर नंबर 6 के पास स्थित है। 2. ए1 चंद्रकला की एक पीस मिठाई की कीमत क्या है? दुकान पर फिलहाल चंद्रकला की एक पीस की कीमत 25 रुपये है। 3. दुकान के खुलने और बंद होने का समय क्या है? दुकान रोजाना सुबह 11 बजे खुलती है और रात 8 बजे तक ग्राहकों के लिए खुली रहती है। 4. यह मिठाई कितने दिनों तक खराब नहीं होती है? दुकानदार के अनुसार इस चंद्रकला को लगभग एक सप्ताह तक बिना खराब हुए रखकर खाया जा सकता है। 5. चंद्रकला को तैयार करने में किन प्रमुख सामग्रियों का उपयोग किया जाता है? इसे मैदे की दो पूड़ियों के बीच खोवा और इच्छानुसार मेवे भरकर सही तापमान पर तलकर तैयार किया जाता है। 6. यह दुकान कितनी पुरानी है और इसका संचालन कौन कर रहा है? दुकान में 50 साल से कारीगर काम कर रहे हैं और वर्तमान में चौरसिया परिवार की दूसरी पीढ़ी इसे चला रही है। https://trendkia.com/food/patna-jnkshana-ke-pasa-50-sala-purani-dukana-ki-chandrakala-mithai-desha-aura-videsha-taka-mashahura-55139 TrendKia — Har trend, sabse pehle.