राजस्थान के करौली में देसी कांटेदार भिंडे की आवक शुरू, 50 से 60 रुपये किलो बिक रही यह सब्जी राजस्थान के करौली क्षेत्र में पारंपरिक कांटेदार देसी भिंडे का सीजन शुरू हो चुका है, जो बाजार में 50 से 60 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिक रहा है। केवल दो महीने मिलने वाली इस खास सब्जी को खरीदने के लिए स्थानीय बाजारों में लोगों का तांता लगा है। राजस्थान के करौली क्षेत्र की सब्जी मंडियों में इन दिनों एक अनोखी देसी सब्जी की आवक से चहल-पहल बढ़ गई है। बाजार में मिलने वाली आम चिकनी और लंबी भिंडी के विपरीत, ग्रामीण इलाकों से किसान छोटी आकार वाली और सतह पर बारीक कांटों से ढकी देसी भिंडी लेकर पहुंच रहे हैं, जिसे स्थानीय बोली में देसी भिंडा कहा जाता है। हर साल सिर्फ दो महीने के लिए बाजार में आने वाली इस सब्जी को खरीदने के लिए स्थानीय निवासियों के बीच जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। सीमित समय की उपलब्धता और पारंपरिक स्वाद के कारण लोग सीजन आते ही इसे खरीदने के लिए मंडी का रुख कर रहे हैं। सामान्य भिंडी से बिल्कुल अलग है बनावट और पहचान दिखने में यह देसी भिंडा सामान्य भिंडी की तरह हरा जरूर होता है, लेकिन इसकी बाहरी संरचना इसे पूरी तरह से अलग बनाती है। इसकी लंबाई सामान्य भिंडी से काफी छोटी होती है और इसके ऊपर छोटे-छोटे कांटे मौजूद होते हैं। देखने में कांटेदार होने के बावजूद जब इसे पकाया जाता है, तब इसका स्वाद बेहद उम्दा और अनोखा होता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस सब्जी का स्वाद आधुनिक हाइब्रिड किस्मों से काफी अलग और ज्यादा देसी अनुभव देता है। करौली की सब्जी मंडी में खरीदारी करने आए स्थानीय निवासी गोपाल लाल शर्मा ने बताया कि यह देसी भिंडा ग्रामीण क्षेत्रों में पुराने जमाने से खाया जाता आ रहा है। उन्होंने साझा किया कि सामान्य भिंडी की तुलना में इसका स्वाद कहीं अधिक समृद्ध होता है। इसी खास स्वाद और पुरानी यादों के कारण जिन लोगों को इसकी आदत है, वे हर साल इस मौसम का बेसब्री से इंतजार करते हैं। सीमित पैदावार और पारंपरिक खेती का तरीका इस खास सब्जी की उपलब्धता कम होने के पीछे इसकी खेती का तरीका भी एक मुख्य वजह है। करौली और इसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में किसान आज भी पुरानी परंपराओं का पालन करते हुए इसकी खेती करते हैं। इस किस्म को तैयार करने के लिए किसान किसी बाजारू हाइब्रिड बीज का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि अपने पास रखे देसी बीजों का ही उपयोग करते हैं। देसी बीजों से उगाई जाने के कारण इसकी पैदावार बेहद सीमित रहती है। बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक खेती न होने से यह सब्जी केवल करौली और नजदीकी गांवों तक ही सीमित रह जाती है। यही कारण है कि साल भर में केवल लगभग दो महीने तक ही यह बाजारों में नजर आती है और जैसे ही सीजन समाप्त होता है, यह सब्जी बाजार से पूरी तरह गायब हो जाती है। मंडी में दाम और बुजुर्गों की पसंदीदा पसंद आवक कम होने और मांग अधिक रहने के चलते मंडी में इसके भाव भी सामान्य भिंडी से ज्यादा रहते हैं। करौली के स्थानीय सब्जी विक्रेता पिंटू सैनी ने बताया कि इन दिनों मंडी में यह देसी भिंडा 50 से 60 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रहा है। कम आपूर्ति की वजह से इसके दाम ऊंचे बने रहते हैं, फिर भी खरीदार खुशी-खुशी इसे खरीद रहे हैं। पिंटू सैनी ने यह भी बताया कि इस सब्जी को विशेष रूप से बुजुर्ग लोग बहुत पसंद करते हैं। रसोई में इसे मुख्य रूप से रसेदार यानी पानी वाली सब्जी के रूप में पकाया जाता है। पानी वाली सब्जी के रूप में इसका स्वाद सबसे बेहतर निकलकर आता है, जो खाने के शौकीनों को बार-बार इसकी तरफ आकर्षित करता है। इसका आप पर असर • भारत में: यह खबर देश भर के लोगों को विलुप्त होती स्थानीय और देसी सब्जियों के संरक्षण तथा पारंपरिक कृषि पद्धतियों के महत्व से अवगत कराती है। • करौली (राजस्थान) में: स्थानीय उपभोक्ताओं को साल में केवल दो महीने के लिए 50 से 60 रुपये प्रति किलो पर ताजा कांटेदार देसी भिंडा खरीदने का अवसर मिलता है। सवाल-जवाब 1. देसी भिंडा क्या है और यह सामान्य भिंडी से कैसे अलग है? देसी भिंडा राजस्थान के करौली क्षेत्र की एक पारंपरिक सब्जी है। यह सामान्य भिंडी की तुलना में छोटी होती है और इसकी बाहरी सतह पर बारीक कांटे होते हैं। 2. करौली की सब्जी मंडी में देसी भिंडा किस कीमत पर बिक रहा है? सब्जी मंडी में देसी भिंडा लगभग 50 से 60 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिक रहा है। 3. यह सब्जी साल में कितने समय के लिए उपलब्ध रहती है? यह देसी सब्जी साल भर में केवल लगभग दो महीने के लिए ही सब्जी मंडियों और बाजारों में उपलब्ध होती है। 4. किसान इस देसी भिंडे को कैसे उगाते हैं? किसान इसे करौली और आसपास के ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक तरीकों और अपने स्थानीय देसी बीजों का उपयोग करके उगाते हैं। 5. देसी भिंडे को किस तरह से बनाना सबसे अच्छा माना जाता है? इसे मुख्य रूप से पानी वाली यानी रसेदार सब्जी के रूप में पकाया जाता है, और बुजुर्ग लोग इसे बहुत पसंद करते हैं। https://trendkia.com/food/rajasthan-ke-karauli-men-desi-kantedara-bhinde-ki-avaka-shuru-50-se-60-rupaye-kilo-bika-rahi-yaha-sabji-18405 TrendKia — Har trend, sabse pehle.