तराई में पंगास मछली की बढ़ी मांग, कम कांटों के कारण बनी लोगों की पसंद उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी और तराई क्षेत्र में पंगास मछली तेजी से लोकप्रिय हो रही है। इसमें बारीक कांटे कम होने की वजह से लोग इसे आसानी से खा पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी समेत समूचे तराई क्षेत्र में मछली के शौकीनों के बीच खान-पान की आदतें बदल रही हैं। वर्षों से लोग रोहू, कतला और नैनी जैसी पारंपरिक मछलियों को प्रमुखता देते रहे हैं, लेकिन बारीक कांटों के डर से अब एक नया रुझान देखने को मिल रहा है। पंगास मछली इस क्षेत्र में उन परिवारों के लिए एक सुलभ विकल्प बनकर उभरी है, जो बिना किसी झंझट के मछली का स्वाद और पोषण लेना चाहते हैं। बारीक कांटों का झंझट और पारंपरिक मछलियों की चुनौती पारंपरिक रूप से भोजन की मेज या मांगलिक आयोजनों में रोहू, कतला और नैनी की मौजूदगी सबसे ज्यादा रही है। स्वाद और सुलभता के चलते इन मछलियों की खपत हमेशा से काफी अधिक रही है। इसके बावजूद इन मछलियों की बनावट ऐसी होती है कि उनमें बेहद पतले और महीन कांटे भरे होते हैं। पकाने और सफाई के दौरान इन सूक्ष्म कांटों को पूरी तरह से निकालना लगभग असंभव सा हो जाता है। यही कारण है कि भोजन करते समय गले में कांटा चुभने का डर हमेशा बना रहता है। घर-परिवारों में खासतौर पर छोटे बच्चों और बुजुर्गों की थाली में मछली परोसते समय परिजनों को विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है। लोग पहले एक-एक कांटा हाथ से चुनकर अलग करते हैं, तब जाकर मांस खाने के लिए दिया जाता है। इस परेशानी से बचने के लिए कई लोग मछली खाने की इच्छा होने पर भी उससे दूरी बना लेते हैं। ऐसे लोग लंबे समय से एक ऐसी प्रजाति की तलाश में थे, जिसमें कांटों का यह झंझट न के बराबर हो। बाजारों और दावतों में पंगास की बढ़ती लोकप्रियता लखीमपुर खीरी के स्थानीय बाजारों में इन दिनों पंगास मछली की पूछ-परख काफी बढ़ गई है। इस मछली की सबसे बड़ी खासियत इसकी शारीरिक बनावट है। इसमें आम मछलियों की तरह मांस के भीतर फैले हुए बारीक कांटे नहीं होते, बल्कि बीच में केवल एक मुख्य केंद्रीय हड्डी होती है। खाते समय इस केंद्रीय कांटे को मांस से अलग करना बेहद आसान होता है, जिससे गले में फंसने का जोखिम खत्म हो जाता है। इसका गूदा भी अपेक्षाकृत कोमल और मुलायम होता है, जो खाने में काफी सहज लगता है। मत्स्य पालन विभाग के अधिकारी निखिल त्रिपाठी ने बताया, "पंगास में बारीक कांटों की समस्या दूसरी कई आम मछलियों की तुलना में कम महसूस होती है, जिसके कारण इसे खाना आसान माना जाता है।" पंगास की यह बढ़ती मांग सिर्फ आम रसोई तक सीमित नहीं है, बल्कि होटल, ढाबों और बड़े आयोजनों में भी इसका इस्तेमाल बढ़ा है। शादी-ब्याह और अन्य उत्सवों में खानसामे ऐसी मछली चाहते हैं, जिसे बड़ी भीड़ के लिए कम समय में तेजी से तैयार किया जा सके। पंगास की बनावट ऐसी है कि इसे मछली करी, फ्राई या तंदूरी जैसे विभिन्न व्यंजनों के लिए आसानी से ढाला जा सकता है। इसका मांस पकने के बाद भी अपनी बनावट बनाए रखता है, जिससे कैटरिंग कारोबारियों के लिए यह काफी मुफीद साबित हो रही है। पोषण संबंधी गुण और अलग-अलग प्रजातियों का महत्व स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार मछली उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन का एक बेहतरीन जरिया मानी जाती है। इसमें मौजूद प्रोटीन शरीर की मांसपेशियों को मजबूती देने और शारीरिक मरम्मत में मदद करता है। इसके साथ ही कई प्रजातियों में ओमेगा-3 फैटी एसिड भी पाया जाता है, जो संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। हालांकि यह समझना जरूरी है कि हर मछली में पोषक तत्वों और ओमेगा-3 की मात्रा एक जैसी नहीं होती। मछली के शरीर में मौजूद पोषक तत्व उसकी अपनी प्रजाति और उसके द्वारा खाए जाने वाले आहार पर निर्भर करते हैं। इसलिए केवल किसी एक प्रकार की मछली पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न प्रजातियों के पोषण प्रोफाइल को समझना अधिक फायदेमंद रहता है। इसका आप पर असर कम कांटों वाली पंगास मछली की उपलब्धता से परिवारों और खानपान के शौकीनों के लिए मछली खाना आसान हो गया है। • भारत में: कांटों के डर से मछली न खाने वाले लोगों के लिए पंगास एक सुगम भोजन विकल्प बनकर सामने आई है। इससे घर के बुजुर्ग और बच्चे बिना किसी झिझक या परेशानी के मछली में मौजूद प्रोटीन का लाभ ले सकते हैं। • लखीमपुर खीरी और तराई क्षेत्र में: स्थानीय बाजारों में पंगास की मांग बढ़ने से मछुआरों और व्यापारियों के सामने नया व्यावसायिक अवसर खुला है। शादी-ब्याह जैसे आयोजनों में हलवाई और कैटरर्स अब कम समय में बड़े पैमाने पर मछली के व्यंजन तैयार कर पा रहे हैं। • घरेलू रसोई के लिए: भोजन से पहले बारीक कांटे बीनने का लंबा समय बच जाता है। इससे भोजन बनाने और परोसने का काम पहले की तुलना में काफी सरल हो जाता है। • स्वास्थ्य के लिहाज से: उच्च प्रोटीन आहार चाहने वाले लोगों को थाली में विविधता लाने का विकल्प मिलता है। हालांकि ओमेगा-3 जैसे तत्वों के लिए अन्य प्रजातियों के साथ इसका संतुलन बनाना बेहतर रहता है। ऐसा क्यों हुआ पारंपरिक मछलियों में कांटों की समस्या और खानपान में सुविधा की चाहत ने पंगास की मांग को बढ़ावा दिया है। • कांटों की जटिल संरचना: रोहू और कतला जैसी क्षेत्रीय मछलियों के मांस में बेहद बारीक कांटे होते हैं, जो गले में फंसने का जोखिम पैदा करते हैं। इस शारीरिक बनावट के कारण परिवार विशेषकर बच्चों को इसे खिलाने से कतराते थे। • पंगास की आसान शारीरिक बनावट: पंगास में बारीक कांटों के बजाय केवल एक मुख्य रीढ़ की हड्डी होती है, जिसे आसानी से अलग किया जा सकता है। इसका कोमल मांस और सरल सफाई इसे खरीदारों के बीच पहली पसंद बना रही है। • कमर्शियल कैटरिंग की जरूरत: होटल, ढाबों और शादी के कार्यक्रमों में बड़े पैमाने पर तेजी से पकने वाली मछली की मांग रहती है। पंगास की बहुमुखी बनावट इसे तलने और करी बनाने दोनों के लिए मुफीद बनाती है। सवाल-जवाब 1. लखीमपुर खीरी में पंगास मछली की लोकप्रियता क्यों बढ़ रही है? पंगास में बारीक कांटे नहीं होते और सिर्फ एक मुख्य केंद्रीय हड्डी होती है, जिससे इसे खाना और साफ करना बेहद आसान हो जाता है। 2. रोहू और कतला खाने में लोगों को क्या परेशानी होती है? रोहू और कतला के मांस में बहुत सारे छोटे और बारीक कांटे होते हैं, जिन्हें अलग करना मुश्किल होता है और वे गले में फंस सकते हैं। 3. मत्स्य पालन विभाग के अधिकारी निखिल त्रिपाठी ने पंगास के बारे में क्या कहा? उन्होंने बताया कि अन्य सामान्य मछलियों की तुलना में पंगास में बारीक कांटों की परेशानी कम होती है, जिससे इसे खाना अधिक आसान है। 4. शादी और दावतों में पंगास का इस्तेमाल क्यों अधिक किया जा रहा है? इस मछली को बड़ी संख्या में लोगों के लिए कम समय में जल्दी तैयार किया जा सकता है और इसे करी या फ्राई दोनों तरीकों से पकाया जा सकता है। 5. क्या सभी प्रकार की मछलियों में ओमेगा-3 की मात्रा समान होती है? नहीं, सभी मछलियों में ओमेगा-3 समान नहीं होता, यह मछली की प्रजाति और उसके द्वारा लिए जाने वाले आहार पर निर्भर करता है। https://trendkia.com/food/tarai-men-pangas-machhali-ki-barhi-manga-kama-kanton-ke-karana-bani-logon-ki-pasnda-38466 TrendKia — Har trend, sabse pehle.