तीर्थ यात्रा से लेकर विदाई तक मिथिलांचल में क्यों खास है बरी-भात की थाली, जानें इसकी अनोखी रेसिपी बिहार के मिथिलांचल में बेसन की बरी और भात केवल एक साधारण भोजन नहीं बल्कि हर मांगलिक अवसर की अनिवार्य परंपरा है। आमिल की खटास और विशेष तड़के से तैयार होने वाला यह पारंपरिक व्यंजन लगभग एक घंटे में बनकर तैयार हो जाता है। बिहार का मिथिला क्षेत्र अपनी समृद्ध संस्कृति और विशिष्ट खानपान के लिए अलग पहचान रखता है। यहां के पाक इतिहास में बरी और भात की जोड़ी का स्थान सबसे ऊपर माना जाता है। किसी खास अतिथि का स्वागत करना हो या फिर कुलदेवी माता भगवती को नैवेद्य अर्पित करना हो, मिथिला के घरों में चूल्हे पर इस पारंपरिक व्यंजन की खुशबू जरूर महकती है। मांगलिक आयोजनों से लेकर दैनिक उत्सवों तक, इस प्रामाणिक थाली के बिना कोई भी बड़ा अवसर अधूरा माना जाता है। धार्मिक अनुष्ठानों और पारिवारिक परंपराओं से गहरा जुड़ाव मिथिलांचल की यह बरी आम तौर पर बनने वाली दही वाली कढ़ी से काफी अलग होती है। इसमें दही के बजाय बेसन और सूखे आम के आमिल का उपयोग किया जाता है, जो इसे इसका वास्तविक स्वाद प्रदान करता है। परिवार में जब कोई सदस्य पवित्र तीर्थ यात्रा पूरी करके सकुशल घर लौटता है, तो उसके स्वागत में विशेष रूप से बरी और भात पकाया जाता है। इसके अतिरिक्त, जब विवाहित बेटी ससुराल से मायके आती है या विदा होकर ससुराल जाती है, तब भी विदाई की थाली में यही पारंपरिक व्यंजन परोसा जाता है। माता भगवती की पूजा में भी इसका भोग लगाना अनिवार्य परंपरा का हिस्सा है। घोल की सटीक जांच और पानी वाली आजमाइश इस व्यंजन को बनाने की पारंपरिक कला बेहद अनूठी है, जिसमें घोल की तैयारी के दौरान ही यह तय हो जाता है कि बरी कितनी नर्म बनेगी। चना बेसन को हाथों से फेंटते समय ही इसके स्वाद और स्पंज का अंदाजा लगाया जाता है। घोल पूरी तरह सही बना है या नहीं, इसे परखने के लिए एक बेहद रोचक घरेलू तरीका अपनाया जाता है। सादा पानी में देकर चेक करते हैं और फिर पता चलता है. फूड एक्सपर्ट मुन्नी ने बताया कि बेसन के घोल की एक छोटी सी बूंद सादे पानी के बर्तन में डालकर जांची जाती है। यदि बेसन की बूंद तैरकर तुरंत पानी की सतह पर ऊपर आ जाए, तो इसका सीधा संकेत होता है कि बरी तलने पर बहुत बढ़िया फूलेगी और बेहद स्वादिष्ट बनेगी। वहीं यदि घोल पानी के तल में नीचे बैठ जाता है, तो इसका अर्थ है कि बेसन अभी ठीक से तैयार नहीं हुआ है और उसे हाथों से और अधिक फेंटने की आवश्यकता है। बरी तैयार करने की पूरी विधि और सामग्री इस व्यंजन को पकाने के लिए सबसे पहले चना बेसन में स्वादानुसार नमक, जीरा और हींग मिलाकर पानी की सहायता से हाथों से एकसार घोल तैयार किया जाता है। इसके बाद कड़ाही में तेल गरम करके बेसन की छोटी-छोटी बरी को सुनहरा होने तक अच्छी तरह फ्राई कर लिया जाता है। ग्रेवी तैयार करने के लिए एक अलग बर्तन में सादे पानी के अंदर बेसन, नमक, हल्दी, धनिया पाउडर और गरम मसाला का पतला मिश्रण बनाकर आंच पर पकाया जाता है। आमिल की खटास और खास छौंक से एक घंटे में तैयार जब मसालों और बेसन का यह पानी वाला मिश्रण अच्छी तरह उबलने और गरम होने लगे, तब इसमें पहले से तली हुई बरी मिला दी जाती है। इसके बाद इसे धीमी आंच पर करीब 20 से 25 मिनट तक लगातार पकने दिया जाता है, ताकि बरी अंदर तक रस सोख ले। प्रामाणिक खट्टा स्वाद देने के लिए इसमें आम का सूखा आमिल यानी अमचूर डाला जाता है। अंत में तेल में जीरा, सूखी लाल मिर्च और तेजपत्ता का जोरदार तड़का लगाकर इसे पूरा किया जाता है। यह पूरा पारंपरिक व्यंजन लगभग एक घंटे के भीतर बनकर तैयार हो जाता है, जिसे गरमा-गरम चावल और कुरकुरे पकौड़े के साथ परोसा जाता है। इसका आप पर असर पारंपरिक क्षेत्रीय व्यंजनों को समझने और घर पर सटीक विधि से पकाने के लिहाज से यह जानकारी घरेलू रसोइयों के लिए बेहद उपयोगी है। • पाक कौशल: बेसन के घोल को पानी में डालकर परखने का आसान तरीका अपनाकर कोई भी व्यक्ति बिना किसी उपकरण के नर्म और स्पंजी बरी बना सकता है। इससे रसोई में खाना खराब होने का जोखिम खत्म हो जाता है। • पारंपरिक स्वाद: दही के बजाय सूखे आम के आमिल का उपयोग करके उत्तर भारतीय कढ़ी से अलग प्रामाणिक मैथिल स्वाद का आनंद लिया जा सकता है। यह खट्टा स्वाद पाचन के लिए भी उत्तम माना जाता है। • समय की बचत: केवल एक घंटे के भीतर तैयार होने वाला यह पौष्टिक भोजन रोजमर्रा के दोपहर के भोजन या त्योहारों पर आसानी से बनाया जा सकता है। इसमें उपयोग होने वाली सभी सामग्रियां आम रसोई में सुलभ होती हैं। • सांस्कृतिक महत्व: तीर्थ यात्रा से लौटने वाले स्वजनों या मेहमानों के स्वागत में इस सात्विक भोजन को बनाकर पारंपरिक पारिवारिक आतिथ्य को जीवित रखा जा सकता है। यह पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाता है। ऐसा क्यों हुआ मिथिलांचल में बरी-भात का धार्मिक और सामाजिक महत्व सदियों पुरानी सांस्कृतिक मान्यताओं और स्थानीय पाक परंपराओं के कारण बना हुआ है। • सांस्कृतिक मान्यताएं: तीर्थ यात्रा से लौटने पर शरीर और आत्मा की शुद्धि के प्रतीक के रूप में सात्विक और पारंपरिक भोजन परोसने का रिवाज रहा है। इसी कारण मिथिला में कुलदेवी के भोग और मांगलिक अवसरों पर इसे सबसे शुद्ध व्यंजन माना जाता है। • भौगोलिक और मौसमी सामग्रियां: मिथिलांचल में सूखे आम के टुकड़ों यानी आमिल को संरक्षित रखने की प्राचीन परंपरा रही है, जो दही के अभाव या अनुपलब्धता में भी भोजन को खट्टा और स्वादिष्ट स्वाद प्रदान करता है। बेसन और मसालों का यह तालमेल क्षेत्र की कृषि उपज से गहराई से जुड़ा है। • परंपरागत पाक तकनीक: पीढ़ियों से चली आ रही हाथ से फेंटने और पानी में तैरने की जांच की विधि ने इस व्यंजन को हर घर में एक समान और प्रामाणिक गुणवत्ता के साथ जीवित रखा है। यह विज्ञान और लोक परंपरा का अनूठा संगम है। सवाल-जवाब 1. मिथिलांचल में बरी बनाने के लिए किस दाल के बेसन का उपयोग किया जाता है? इस पारंपरिक व्यंजन को बनाने के लिए चना बेसन का उपयोग किया जाता है। 2. बरी का घोल सही बना है या नहीं, इसकी पहचान कैसे की जाती है? बेसन के घोल की एक बूंद सादे पानी में डाली जाती है; यदि वह ऊपर तैरने लगे, तो घोल बरी बनाने के लिए तैयार माना जाता है। 3. मिथिला की बरी में खट्टे स्वाद के लिए क्या डाला जाता है? इसमें प्रामाणिक खटास लाने के लिए आम का सूखा आमिल यानी अमचूर मिलाया जाता है। 4. इस व्यंजन को किन-किन खास अवसरों पर बनाया जाता है? यह माता भगवती के भोग, तीर्थ यात्रा से वापसी, बेटी के मायके आने और विदाई के अवसरों पर बनाया जाता है। 5. तली हुई बरी को ग्रेवी में कितनी देर तक पकाया जाता है? तली हुई बरी को ग्रेवी में डालकर धीमी आंच पर 20 से 25 मिनट तक पकाया जाता है। 6. बरी में तड़का लगाने के लिए किन सामग्रियों का प्रयोग होता है? छौंक या तड़के के लिए तेल में जीरा, सूखी लाल मिर्च और तेजपत्ता का इस्तेमाल किया जाता है। 7. पूरा बरी-भात व्यंजन बनने में कितना समय लगता है? यह पारंपरिक भोजन लगभग एक घंटे के समय में बनकर तैयार हो जाता है। https://trendkia.com/food/tirtha-yatra-se-lekara-vidai-taka-mithilanchal-men-kyon-khasa-hai-bari-bhat-ki-thali-janen-isaki-anokhi-resipi-53524 TrendKia — Har trend, sabse pehle.