उत्तर प्रदेश के बलिया में 40 सालों से जमा है विश्वकर्मा पेड़ा भंडार का सिक्का, शुद्ध देसी दूध के स्वाद के विदेश तक हैं दीवाने उत्तर प्रदेश के बलिया में एनएच 31 पर स्थित विश्वकर्मा पेड़ा भंडार पिछले 40 सालों से पारंपरिक विधि और शुद्ध देसी दूध से बने पेड़े का स्वाद परोस रहा है, जिसकी मांग छपरा, आरा से लेकर विदेशों तक है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में स्थित बलिया जिले के बैरिया मार्ग पर बहादुरपुर के पास रेपुरा गांव के रहने वाले विश्वकर्मा साहू की मिठाई दुकान स्वाद के शौकीनों के बीच एक अलग पहचान बना चुकी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 31 से बिल्कुल सटी इस दुकान का नाम विश्वकर्मा पेड़ा भंडार है, जहां पिछले 40 सालों से पारंपरिक तरीके से पेड़ा तैयार किया जा रहा है। चार दशकों की इस लंबी यात्रा में समय और माहौल भले बदल गए हों, लेकिन यहां मिलने वाले पेड़े की शुद्धता और लाजवाब जायके में कोई बदलाव नहीं आया है। यही वजह है कि पुरानी पीढ़ी से लेकर आज के नए दौर के युवा तक हर कोई इस खास स्वाद का मुरीद है। यहां आने वाले ग्राहक न केवल मौके पर बैठकर गरमा-गरम स्वाद का आनंद लेते हैं, बल्कि अपने परिवार और रिश्तेदारों के लिए बड़ी मात्रा में पेड़ा पैक करवाकर साथ भी ले जाते हैं। शहर की गलियों से राष्ट्रीय राजमार्ग तक का सफर दुकानदार विश्वकर्मा साहू ने लगभग 40 साल पहले पेड़ा बनाने का यह पारंपरिक कारोबार शुरू किया था। शुरुआती दौर में उनकी यह दुकान बलिया शहर के अंदरूनी हिस्से में संचालित होती थी, जहां लोगों ने इनके हाथ के बने पेड़े को काफी पसंद किया। इसके बाद साल 2003 में दुकान को शहर से स्थानांतरित करके बलिया-बैरिया मार्ग स्थित वर्तमान स्थान पर लाया गया। स्थान में बदलाव होने के बावजूद ग्राहकों के जुड़ाव में कोई कमी नहीं आई। आज भी जिस पारंपरिक तरकीब और लगन के साथ चार दशक पहले पेड़ा बनाया जाता था, ठीक उसी शुद्धता के साथ इसे आज भी तैयार किया जाता है। एनएच 31 के मुख्य किनारे पर स्थित होने के कारण यहां से गुजरने वाले राहगीर भी रुककर इस खास मिठाई का स्वाद चखना नहीं भूलते। शुद्ध देहाती दूध और खोवे की भुनाई का पारंपरिक तरीका पेड़े के इस बेमिसाल स्वाद का सबसे बड़ा रहस्य इसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल और पकाने की विधि है। इस प्रसिद्ध पेड़े को बनाने के लिए किसी तरह की मिलावट के बजाय विशुद्ध ग्रामीण इलाकों से आने वाले ताजा देहाती दूध का इस्तेमाल किया जाता है। सबसे पहले दूध को कड़ाही में रखकर काफी देर तक अच्छी तरह पकाया जाता है, जिससे गाढ़ा और शुद्ध खोवा तैयार होता है। इसके बाद तैयार खोवे में आवश्यकतानुसार हल्की चीनी मिलाई जाती है और इस मिश्रण को धीमी आंच पर दोबारा अच्छी तरह से भुना जाता है। खोवे और चीनी की इस दूसरी भुनाई से मिठाई का स्वाद कई गुना बढ़ जाता है और उसमें एक सोंधापन आ जाता है। अनुभव से निखरती है पेड़ा बनाने की कारीगरी सुनने में पेड़ा बनाने की यह प्रक्रिया बेहद साधारण लग सकती है, लेकिन इसके असली स्वाद का आधार कारीगर का बरसों का अनुभव और सही समय पर पकाने का कौशल है। खोवे और चीनी के मिश्रण को किस तापमान पर और कितनी देर तक भूनना है, इसका सटीक अंदाजा केवल अनुभवी हाथों को ही होता है। सही ढंग से भूनने के बाद इस गर्म मिश्रण को आग से उतारकर हल्का ठंडा होने के लिए रखा जाता है। जब मिश्रण हाथों से छूने लायक हो जाता है, तब इसे हाथों की मदद से गोल पेड़े का आकार दिया जाता है। किसी आधुनिक मशीन के बजाय हाथों से दी जाने वाली यह ढलाई ही पेड़े को उसकी पारंपरिक बनावट और खास रंगत प्रदान करती है। लंबी शेल्फ लाइफ और देश-विदेश तक मांग विश्वकर्मा साहू के अनुसार इस पेड़े की सबसे बड़ी खासियत इसका टिकाऊपन है। पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से भुनाई होने के कारण यह पेड़ा जल्दी खराब नहीं होता और लंबे समय तक खाने योग्य बना रहता है। इसी वजह से दूर-दराज के इलाकों से आने वाले लोग इसे अपने साथ आसानी से ले जा सकते हैं। पड़ोस के बिहार राज्य के छपरा और आरा से लेकर उत्तर प्रदेश के गौरीगंज जैसे इलाकों में इस पेड़े की जबरदस्त मांग रहती है। इसके अलावा विदेशों में रहने वाले भारतीय या वहां जाने वाले प्रवासी भी बलिया प्रवास के दौरान इसे पैक करवाकर अपने साथ ले जाना बेहद पसंद करते हैं। किफ़ायती कीमतें और हर जेब के अनुकूल विकल्प गुणवत्ता और शुद्धता में अव्वल होने के साथ-साथ इस पेड़े की कीमतें भी आम ग्राहक की जेब को ध्यान में रखकर तय की गई हैं। दुकान पर दो अलग-अलग श्रेणियों में पेड़े उपलब्ध कराए जाते हैं। पहले प्रकार के पेड़े की कीमत ₹300 प्रति किलोग्राम है, जबकि दूसरे प्रीमियम पेड़े की कीमत ₹400 प्रति किलोग्राम रखी गई है। जो लोग किलो के हिसाब से खरीदारी नहीं करना चाहते या केवल तुरंत स्वाद चखना चाहते हैं, उनके लिए ₹10 प्रति पीस के हिसाब से पेड़ा खरीदने की सुविधा भी दी गई है। इस सस्ती और वाजिब दर के कारण कोई भी व्यक्ति बिना किसी वित्तीय बोझ के इस पारंपरिक मिठाई का आनंद उठा सकता है। ग्राहकों का अटूट भरोसा और दुकान तक पहुंचने का आसान मार्ग स्थानीय निवासियों के बीच इस मिठाई दुकान को लेकर एक गहरा भावनात्मक लगाव देखा जाता है। लंबे समय से आ रहे ग्राहक आजाद भोला पाण्डेय का कहना है कि वह अपने बचपन के दिनों से ही विश्वकर्मा जी की दुकान का पेड़ा खाते आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस पेड़े का स्वाद ऐसा है कि एक बार खाने के बाद व्यक्ति का मन बार-बार इसे खाने को करता है। ग्राहकों का यही दशकों पुराना विश्वास दुकान की असली पूंजी है। यदि आप भी इस दुकान पर पहुंचना चाहते हैं, तो यह बलिया रेलवे स्टेशन से हल्दी की तरफ जाने वाले मार्ग पर स्थित है। दूबहर थाना पार करने के बाद मुख्य सड़क के दाहिने किनारे पर विश्वकर्मा पेड़ा भंडार आसानी से दिखाई दे जाता है, जहां हर दिन दर्जनों ग्राहक आकर इस अनोखे जायके का आनंद लेते हैं। इसका आप पर असर भारत में: यह कहानी पारंपरिक और शुद्ध दूध से बनी क्षेत्रीय मिठाइयों के प्रति लोगों की रुचि और स्थानीय कारीगरों के प्रति विश्वास का एक सशक्त उदाहरण पेश करती है। उत्तर प्रदेश में: बलिया-बैरिया मार्ग से गुजरने वाले यात्रियों को वाजिब दाम (₹300 से ₹400 प्रति किलो) में टिकाऊ और प्रामाणिक पेड़े का स्वाद आसानी से उपलब्ध होता है। सवाल-जवाब 1. विश्वकर्मा पेड़ा भंडार कहां स्थित है? यह दुकान उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में बलिया रेलवे स्टेशन से हल्दी जाने वाले मार्ग पर, दूबहर थाना पार करने के बाद मुख्य सड़क (NH 31) के दाहिने किनारे पर स्थित है। 2. विश्वकर्मा साहू की दुकान पर पेड़े की क्या कीमत है? दुकान पर दो तरह के पेड़े उपलब्ध हैं: एक ₹300 प्रति किलोग्राम और दूसरा ₹400 प्रति किलोग्राम। इसके अलावा ₹10 प्रति पीस के हिसाब से भी पेड़ा खरीदा जा सकता है। 3. पेड़ा बनाने की खास पारंपरिक विधि क्या है? गांव के शुद्ध देहाती दूध को पकाकर पहले खोवा बनाया जाता है, फिर उसमें हल्की चीनी मिलाकर मिश्रण को दोबारा भुना जाता है और ठंडा होने पर हाथों से आकार दिया जाता है। 4. विश्वकर्मा पेड़ा भंडार कितने सालों से संचालित हो रहा है? यह दुकान पिछले 40 सालों से संचालित हो रही है। शुरुआत में यह बलिया शहर में थी और साल 2003 में इसे बहादुरपुर एनएच 31 पर लाया गया। 5. किन-किन इलाकों में इस पेड़े की मांग है? इस पेड़े की शेल्फ लाइफ लंबी होने के कारण यह जल्दी खराब नहीं होता। इसकी मांग बिहार के छपरा, आरा और यूपी के गौरीगंज के अलावा विदेशों तक है। प्रेरणा और सबक विश्वकर्मा साहू के 40 वर्षों के सफर से मुख्य सीख: • गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं: स्थान बदलने के बावजूद 40 वर्षों से शुद्ध देसी दूध और पारंपरिक विधि को बनाए रखना ही ब्रांड की असली ताकत है। • ग्राहक का भरोसा ही सबसे बड़ी संपत्ति: वाजिब कीमत और प्रामाणिक स्वाद से बनाई गई ग्राहकों की निष्ठा पीढ़ी-दर-पीढ़ी कारोबार को आगे बढ़ाती है। • धैर्य और निरंतरता: छोटे स्तर से शुरुआत करके चार दशकों तक एक ही उत्पाद में महारत हासिल करना दीर्घकालिक सफलता की कुंजी है। https://trendkia.com/food/uttar-pradesh-ke-ballia-men-40-salon-se-jama-hai-vishwakarma-peda-bhandar-ka-sikka-shuddha-desi-dudha-ke-svada-ke-videsha-taka-hai-19442 TrendKia — Har trend, sabse pehle.