उत्तराखंड की पारंपरिक रसोई से सीखें जाखिया के तड़के वाला पहाड़ी भुटवा बनाने का तरीका कुमाऊं और गढ़वाल में लोकप्रिय पहाड़ी भुटवा को बकरे के आंतरिक अंगों, सरसों के तेल और स्थानीय मसालों के साथ धीमी आंच पर पारंपरिक अंदाज में तैयार किया जाता है। उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों की पाक परंपरा में कई ऐसे प्रामाणिक व्यंजन शामिल हैं, जिनकी पहचान आज भी वहां के घरों में मजबूती से बनी हुई है। इन्हीं में से एक बेहद लोकप्रिय पारंपरिक व्यंजन पहाड़ी भुटवा है। इसे बकरे की आंत, फेफड़े और कलेजी जैसे आंतरिक अंगों के मेल से तैयार किया जाता है। सरसों के तेल में जाखिया के तड़के और आंचलिक मसालों के साथ धीमी आंच पर पकने के कारण इसका स्वाद अन्य मांसाहारी व्यंजनों से काफी अलग और खास होता है। पारंपरिक अवसरों से जुड़ी पुरानी रसोई परंपरा बागेश्वर की स्थानीय जानकार दिया टम्टा के अनुसार, भुटवा को विशेष तौर पर बेहद पारंपरिक विधि से तैयार किया जाता रहा है। पुराने समय में इसे घर-परिवार के विशेष उत्सवों, मांगलिक अवसरों और पारिवारिक आयोजनों के दौरान खास तौर पर पकाया जाता था। खान-पान के शौकीन लोग अपनी पसंद के हिसाब से इसे बिल्कुल सूखा या फिर हल्की रसेदार ग्रेवी के साथ बनाना पसंद करते हैं। पहाड़ी भुटवा पकाने की चरणबद्ध विधि इस व्यंजन को बनाने के लिए सबसे पहले बकरे की आंत, फेफड़े और कलेजी की बेहद बारीकी और अच्छी तरह सफाई की जाती है। इसके बाद इन अंगों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर पहले से अच्छी तरह पका लिया जाता है। इसके बाद पारंपरिक विधि के अनुसार लोहे की कड़ाही में सरसों का तेल गर्म किया जाता है। जब तेल पूरी तरह गर्म हो जाए, तब उसमें जाखिया का तड़का लगाया जाता है। इसके तुरंत बाद बारीक कटा प्याज, अदरक, लहसुन और हरी मिर्च डालकर अच्छी तरह भूनें। जब प्याज और अदरक-लहसुन का मिश्रण अच्छी तरह भुन जाए, तब इसमें हल्दी, धनिया पाउडर, लाल मिर्च और स्वादानुसार नमक मिलाया जाता है। मसालों के अच्छी तरह पक जाने के बाद, इसमें पहले से पकाकर रखे गए आंतरिक अंगों के टुकड़े डाल दिए जाते हैं। पूरी सामग्री को अच्छी तरह मिलाने के बाद धीमी आंच पर लगातार भूना जाता है। कड़ाही में सामग्री को बीच-बीच में चलाते रहना जरूरी होता है, जिससे मसाले टुकड़ों में अच्छी तरह समा जाएं और वे नीचे तली में न चिपकें। यदि व्यंजन को सूखा रखना हो, तो बहुत कम पानी डालें या जरूरत पड़ने पर ही हल्का सा पानी छिड़कें। वहीं जो लोग हल्की ग्रेवी पसंद करते हैं, वे अपनी आवश्यकता के अनुसार इसमें पानी मिला सकते हैं। पूरी तरह पक जाने के बाद ऊपर से ताजा कटा हरा धनिया डालकर इसे गरमा-गरम परोसा जाता है। स्वाद और स्वच्छता के लिए जरूरी सावधानियां भुटवा बनाते समय कुछ बुनियादी बातों पर विशेष ध्यान देना अनिवार्य होता है। सबसे महत्वपूर्ण कदम बकरे के आंतरिक अंगों की पूरी स्वच्छता है, जिन्हें किसी भी हाल में कच्चा या अधपका नहीं छोड़ा जाना चाहिए। मसालों को धीमी आंच पर धैर्य के साथ भूनना चाहिए, ताकि उनका प्राकृतिक अर्क और स्वाद पूरी तरह निखरकर आए। कड़ाही की तली में भोजन को जलने या चिपकने से बचाने के लिए लगातार करछी चलाते रहें। इसके मूल आंचलिक स्वाद को बनाए रखने के लिए लोहे की कड़ाही और जाखिया के तड़के का उपयोग सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका आप पर असर पारंपरिक खान-पान के शौकीनों के लिए यह विधि घर पर प्रामाणिक पहाड़ी स्वाद तैयार करने का व्यावहारिक तरीका देती है। • उत्तराखंड के बाहर: महानगरों में रहने वाले लोग सामान्य मसालों के बजाय ऑनलाइन या स्थानीय दुकानों से जाखिया और शुद्ध सरसों का तेल लेकर इसे तैयार कर सकते हैं। इससे उन्हें घर पर ही प्रामाणिक आंचलिक स्वाद मिल सकेगा। • उत्तराखंड में: पहाड़ी क्षेत्रों के स्थानीय परिवारों के लिए यह पारंपरिक पकवान बनाने की अपनी सदियों पुरानी विधि को बिना बदलाव जारी रखने में मदद करता है। त्योहारों और पारिवारिक आयोजनों में इसे बनाकर स्थानीय खाद्य संस्कृति को बढ़ावा दिया जा सकता है। • खाद्य सुरक्षा: बकरे के आंतरिक अंगों का उपयोग होने के कारण सफाई और पूरी तरह पकाने का नियम अपनाना जरूरी है। सही ढंग से पकाने से पेट से जुड़ी समस्याओं और संक्रमण का खतरा पूरी तरह टल जाता है। • बर्तन का चुनाव: पारंपरिक स्वाद पाने के लिए नॉन-स्टिक बर्तनों के बजाय लोहे की कड़ाही का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे खाने को सही रंग, आंच और प्राकृतिक आयरन का पोषण मिल पाता है। ऐसा क्यों हुआ पहाड़ी भुटवा का विकास उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार हुआ है। ठंड के मौसम में शरीर को गर्माहट देने और मांस के हर हिस्से के सदुपयोग की परंपरा से यह व्यंजन जन्मा है। • संसाधनों का पूर्ण उपयोग: पहाड़ी इलाकों में पशुपालन और मांस उपभोग के दौरान किसी भी उपयोगी खाद्य भाग को व्यर्थ नहीं जाने दिया जाता था। बकरे की आंत, फेफड़े और कलेजी को पोषक तत्वों और स्वाद के साथ पकाने की यह प्रथा इसी सोच से विकसित हुई। • स्थानीय मसालों का महत्व: पहाड़ी क्षेत्रों में जाखिया और सरसों का तेल प्रचुरता से उपलब्ध रहता है। इनकी तीव्र सुगंध और प्राकृतिक गर्माहट कठिन जलवायु में शरीर के तापमान और पाचन को संतुलित रखने में मददगार मानी जाती है। • आयोजनों की संस्कृति: बागेश्वर और आसपास के इलाकों में पारिवारिक आयोजनों और बड़े समारोहों के दौरान ताजे मांस से यह व्यंजन बनाने की पुरानी परंपरा रही है। समय के साथ यह विशेष अवसरों का मुख्य व्यंजन बन गया। सवाल-जवाब 1. पहाड़ी भुटवा किन अंगों से बनाया जाता है? यह व्यंजन मुख्य रूप से बकरे की आंत, फेफड़े और कलेजी को मिलाकर तैयार किया जाता है। 2. भुटवा में कौन सा तड़का सबसे जरूरी माना जाता है? पारंपरिक पहाड़ी स्वाद के लिए इसमें सरसों के तेल में जाखिया का तड़का लगाना सबसे जरूरी होता है। 3. क्या भुटवा को ग्रेवी के साथ भी बनाया जा सकता है? हां, इसे अपनी पसंद के अनुसार सूखा भुना हुआ या फिर आवश्यकतानुसार पानी डालकर हल्की ग्रेवी के साथ बनाया जा सकता है। 4. भुटवा बनाते समय सबसे महत्वपूर्ण सावधानी क्या है? बकरे के अंगों की बेहद अच्छी तरह सफाई करना और उन्हें पूरी तरह पकाना सबसे जरूरी है ताकि वे कच्चे न रहें। 5. इसे पकाने के लिए किस प्रकार के बर्तन का सुझाव दिया जाता है? पारंपरिक स्वाद और सही भुनने के लिए लोहे की कड़ाही का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। https://trendkia.com/food/uttarakhand-ki-parnparika-rasoi-se-sikhen-jakhiya-ke-tarake-vala-pahadi-bhutwa-banane-ka-tarika-55777 TrendKia — Har trend, sabse pehle.