वाराणसी के हुनर से गाजीपुर में गुलजार है हींग कचौड़ी का जायका, जानिए इसकी खासियत गाजीपुर के बाजार में बिकने वाली हींग की कचौड़ी अपने खास मसालों और बिना लहसुन-प्याज के सात्विक स्वाद के लिए लोगों को खूब भा रही है। कारीगरों ने इसकी रेसिपी वाराणसी से सीखी है। गाजीपुर के बाजारों में हींग की कचौड़ी का स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। इस कचौड़ी की खासियत इसका बाहरी हिस्सा खस्ता और अंदर का मसाला तीखा व खुशबूदार होना है। इसे बनाने में हींग के अलावा अदरक, मिर्च और पारंपरिक मसालों का भरपूर उपयोग किया जाता है। स्थानीय स्तर पर इस व्यंजन को लेकर लोगों में काफी क्रेज देखा जा रहा है। काशी के उस्ताद से सीखी कला कारीगर संदीप के अनुसार, उन्होंने यह खास कचौड़ी बनाना वाराणसी में बेनिया मस्जिद के पास रहने वाले राजेश गुप्ता से सीखा था। कारीगरी में माहिर होने के बाद उन्होंने गाजीपुर के महाजन टोली इलाके में आकर अपनी दुकान शुरू की और आज यहीं के लोगों को यह जायका परोस रहे हैं। इस कला को सीखने में उन्होंने पारंपरिक तौर-तरीकों और बारीकियों को बारीकी से समझा है। तैयारी का समय और खपत दुकान पर रोजाना लगभग पांच से दस किलो आटे की कचौड़ियां तैयार की जाती हैं। इन्हें बनाने का काम दिन में दो बार होता है। पहली खेप सुबह लगभग सात से साढ़े सात बजे के बीच बनती है, जबकि दूसरी खेप दोपहर एक बजे से शाम पांच बजे तक तैयार की जाती है। कारीगर दीपक बताते हैं कि कचौड़ी के आटे और मसाले के संतुलन को बनाए रखने के लिए समय का खास ध्यान रखा जाता है। सामग्री और सात्विक विधि हींग की कचौड़ी की रेसिपी जगहों के हिसाब से बदल सकती है, लेकिन इस विशेष दुकान की अपनी पहचान है। इसकी बाहरी परत मैदा या गेहूं के आटे से बनती है, जबकि अंदर उड़द या अन्य दाल के साथ हींग, अदरक, मिर्च, सौंफ, जीरा, धनिया और गरम मसाला भरा जाता है। कुछ जगहों पर बेसन का इस्तेमाल भी किया जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें लहसुन और प्याज का बिल्कुल उपयोग नहीं किया जाता है, जिससे यह पूरी तरह सात्विक रहती है। ग्राहकों की प्रतिक्रिया और कीमत स्थानीय निवासी अवनीश का कहना है कि इस कचौड़ी का स्वाद बेहतरीन है और इसमें हींग की सोंधी खुशबू अलग से महसूस होती है। बिना लहसुन और प्याज के भी मसालों का यह मेल बहुत पसंद आ रहा है। कारीगर दीपक का मानना है कि सात्विक भोजन पसंद करने वालों के लिए यह एक बेहतरीन विकल्प है। कीमत की बात करें तो यहां 60 रुपये में चार कचौड़ियां मिलती हैं, जो ग्राहकों के बजट में भी फिट बैठती हैं। इसका आप पर असर यह स्थानीय खानपान से जुड़ी खबर है, इसलिए इसका सीधा असर खाने-पीने के शौकीनों और गाजीपुर के स्थानीय बाजार पर पड़ता है। • गाजीपुर में: स्थानीय लोगों और पर्यटकों को महाजन टोली इलाके में 60 रुपये में चार कचौड़ियों का किफायती सात्विक नाश्ता मिलता है। यह बजट के अनुकूल होने के कारण आम आदमी की पहुँच में है। • खानपान के जानकारों के लिए: सात्विक और बिना लहसुन-प्याज वाला भोजन ढूंढने वाले लोगों को पारंपरिक बनारसी स्वाद का एक नया और बेहतर विकल्प मिलता है। ऐसा क्यों हुआ यह रेसिपी वाराणसी की पारंपरिक रसोई से निकलकर गाजीपुर के बाजारों तक पहुँची है। इस व्यंजन के लोकप्रिय होने के पीछे इसका खास मसाला संयोजन और बिना लहसुन-प्याज का सात्विक होना मुख्य कारण है। • कारीगरी का स्थानांतरण: कारीगरों ने इस विधा को वाराणसी के अनुभवी उस्तादों से सीखा और गाजीपुर के स्थानीय बाजार में इसे सफलतापूर्वक उतारा। • स्वास्थ्य और पसंद: खानपान में सात्विक विकल्पों की बढ़ती मांग और हींग-मसालों की अनोखी खूशबू ने इसे ग्राहकों के बीच लोकप्रिय बना दिया है। सवाल-जवाब 1. गाजीपुर में हींग की कचौड़ी कहाँ मिलती है? गाजीपुर के महाजन टोली इलाके में यह कचौड़ी मिलती है। 2. इस कचौड़ी को बनाने की कला कहाँ से सीखी गई थी? कारीगर संदीप ने इसे वाराणसी में बेनिया मस्जिद के पास रहने वाले राजेश गुप्ता से सीखा था। 3. कचौड़ी बनाने का समय क्या रहता है? दिन में दो बार, सुबह सात से साढ़े सात बजे के बीच और दोपहर एक से शाम पाँच बजे तक कचौड़ियाँ बनाई जाती हैं। 4. क्या इस कचौड़ी में लहसुन और प्याज का इस्तेमाल होता है? नहीं, इस कचौड़ी को बनाने में लहसुन और प्याज का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया जाता है। 5. हींग की कचौड़ी की कीमत क्या है? यहाँ 60 रुपये में चार कचौड़ियाँ मिलती हैं। https://trendkia.com/food/varanasi-ke-hunar-se-ghazipur-me-gulzar-hai-hing-kachori-ka-jayka-50115 TrendKia — Har trend, sabse pehle.