# विंध्य की रसोई से इंद्रहार: चार दालों के मेल और भाप की गर्माहट से सजती है यह देसी थाली

> मध्य प्रदेश के बघेलखंड में मूंग, उड़द, मसूर और चना दाल के गाढ़े मिश्रण को भाप में पकाकर पारंपरिक इंद्रहार तैयार किया जाता है, जो सेहत और स्वाद दोनों में बेमिसाल है।

**Type:** article · **Category:** खानपान · **Published:** 2026-10-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/food/vindhya-ki-rasoi-se-indrahar-chara-dalon-ke-mela-aura-bhapa-ki-garmahata-se-sajati-hai-yaha-desi-thali-42285 · **Language:** Hindi
**Tags:** बघेली इंद्रहार, विंध्य खानपान, मध्य प्रदेश व्यंजन, पारंपरिक रेसिपी, रीवा, दाल की टिक्की

मध्य प्रदेश के विंध्य अंचल के ग्रामीण घरों में सदियों पुरानी खानपान की परंपराएं आज भी पूरी सादगी और स्वाद के साथ जीवित हैं। बघेली इंद्रहार इसी समृद्ध विरासत का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसे ग्रामीण इलाकों में बड़े चाव से बनाया और खाया जाता है। यह खास पकवान कई प्रकार की दालों के पोषण और भाप की धीमी आंच पर तैयार होता है, जिसके चलते इसे पेट के लिए बेहद हल्का और प्रोटीन का बेहतरीन स्रोत माना जाता है।

## चार दालों का पोषण और बघेलखंड की पहचान
बघेलखंड अपनी प्राचीन परंपराओं, प्राकृतिक संपदा और ऐतिहासिक धरोहरों के अलावा अपने ठेठ देसी खानपान के लिए भी जाना जाता है। बघेली इंद्रहार इस इलाके की पाक कला का एक प्रमुख हिस्सा है। इसे तैयार करने के लिए मूंग दाल, उड़द दाल, मसूर दाल और चना दाल को एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है। चारों दालों का यह अनूठा संगम न सिर्फ इसके स्वाद को अलग बनाता है, बल्कि शरीर को प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व भी उपलब्ध कराता है।

## मसालों का अनूठा मेल और तैयारी का तरीका
रीवा जिले के रायपुर कर्चुलियान की रहने वाली अलका सिंह करचूली बताती हैं कि इंद्रहार बनाने की प्रक्रिया एक दिन पहले से शुरू होती है। सबसे पहले चारों दालों को रात भर या पूरे एक दिन के लिए साफ पानी में भिगोकर रखा जाता है। अच्छी तरह फूल जाने के बाद इन दालों को पीसकर एक गाढ़ा और चिकना पेस्ट बना लिया जाता है। इसके बाद इस मिश्रण में डोडा, कुटी हुई काली मिर्च, स्वादानुसार नमक, हींग और चैली पत्ता जैसे पारंपरिक मसाले मिलाए जाते हैं। यह देसी मसाला मिश्रण टिक्कियों को एक खास सौंधी खुशबू और गहरा स्वाद देता है।

## चूल्हे की आंच और भाप पर पकाने की देसी विधि
अलका सिंह के मुताबिक, गांवों में आज भी इस व्यंजन को मिट्टी के पारंपरिक चूल्हे पर ही बनाया जाता है। इसे पकाने की तकनीक भी काफी अनोखी है। एक बड़े भगोने में पानी भरकर उसे चूल्हे पर उबलने के लिए रखा जाता है। जब पानी से तेज भाप निकलने लगती है, तो बर्तन के मुंह पर सूखी घास बिछा दी जाती है। तैयार दाल के पेस्ट से छोटी-छोटी गोल टिक्कियां बनाई जाती हैं और उन्हें इस घास के ऊपर सलीके से रख दिया जाता है। बर्तन को ढककर करीब 10 से 12 मिनट तक भाप में पकाया जाता है, जिससे दाल अंदर तक अच्छी तरह पक जाती है।

## परोसने का अंदाज और कढ़ी-सब्जी में प्रयोग
मूल रूप से इंद्रहार को पूरी तरह भाप में पकाकर बिना तेल में तले ही सीधे खाया जाता है। हालांकि, स्वाद में विविधता लाने के लिए कुछ लोग इन उबली हुई टिक्कियों को तवे या कड़ाही में हल्का तलकर कुरकुरा बना लेते हैं। खाने की थाली में इसे ताजी पिसी टमाटर की चटनी या दही की चटनी के साथ परोसा जाता है। समय के साथ इसके इस्तेमाल में भी नए प्रयोग जुड़े हैं; अब कई घरों में इंद्रहार की टिक्कियों को कढ़ी या ग्रेवी वाली सब्जी में डालकर भी पकाया जाने लगा है। बघेलखंड के कई देहाती परिवारों में यह पारंपरिक व्यंजन आज भी आम दिनचर्या का हिस्सा है, जहां इसे हर एक से दो महीने के अंतराल पर बड़े उत्साह के साथ बनाया जाता है।

## इसका आप पर असर
यह पारंपरिक व्यंजन आधुनिक खानपान में बिना तेल के प्रोटीन से भरपूर पौष्टिक भोजन का सीधा और सस्ता देसी विकल्प पेश करता है।

- **स्वास्थ्य के लिए:** भाप में पकी चार दालों की यह रेसिपी बिना तेल के उच्च प्रोटीन और सुपाच्य भोजन देती है। जो लोग वजन नियंत्रित रखना चाहते हैं या तला-भुना खाने से बचते हैं, वे इसे अपने नियमित नाश्ते में शामिल कर सकते हैं।
- **रसोई के बजट में:** घर में मौजूद रोजमर्रा की आम दालों और बेसिक मसालों से यह तैयार हो जाती है। इसके लिए किसी महंगे प्रोसेस्ड उत्पाद या विशेष बर्तन की आवश्यकता नहीं पड़ती।
- **रीवा और विंध्य क्षेत्र में:** यह व्यंजन इलाके की लुप्त होती पारंपरिक पाक कला को ग्रामीण पहचान के रूप में संजोए रखता है। स्थानीय लोग पारिवारिक समारोहों और सामान्य दिनों में इसे एक धरोहर की तरह आज भी पकाते हैं।
- **व्यंजनों में प्रयोग:** भाप में पकी इन टिक्कियों को कढ़ी और सब्जी की ग्रेवी में डालकर नए व्यंजन बनाए जा सकते हैं। इससे शाकाहारी थाली में बिना अतिरिक्त तेल-मसाले के विविधता लाई जा सकती है।

## ऐसा क्यों हुआ
बघेलखंड में इंद्रहार की परंपरा सदियों से स्थानीय रूप से उपलब्ध दालों को बिना तेल के स्वास्थ्यवर्धक तरीके से पकाने की देसी सूझबूझ से विकसित हुई है।

- **स्थानीय संसाधनों का उपयोग:** ग्रामीण अंचलों में मूंग, उड़द, मसूर और चना जैसी दालें प्रचुर मात्रा में उगाई और खाई जाती रही हैं। इन सभी दालों को एक साथ मिलाकर पौष्टिक भोजन तैयार करने की आवश्यकता से इस नुस्खे की शुरुआत हुई।
- **भाप से पकाने की देसी तकनीक:** तेल की सीमित उपलब्धता और सुपाच्य भोजन की तलाश के चलते चूल्हे पर भगोने और सूखी घास के सहारे भाप में पकाने का तरीका ईजाद किया गया। घास टिक्कियों को पानी में डूबने से बचाती है और समान रूप से भाप पहुंचाती है।
- **स्वाद और पाचन का संतुलन:** दालों के भारीपन को संतुलित करने के लिए हींग, काली मिर्च और डोडा जैसे पाचक मसाले मिलाए गए। इस वैज्ञानिक संतुलन के कारण यह व्यंजन पीढ़ियों से विंध्य की पारिवारिक थाली का अटूट हिस्सा बना हुआ है।

## सवाल-जवाब

### 1. बघेली इंद्रहार किन दालों से मिलकर बनाया जाता है?
इंद्रहार बनाने के लिए मूंग दाल, उड़द दाल, मसूर दाल और चना दाल को मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है।

### 2. दाल के पेस्ट में कौन-कौन से मसाले मिलाए जाते हैं?
इस मिश्रण में डोडा, काली मिर्च, नमक, हींग और चैली पत्ता जैसे पारंपरिक मसाले मिलाए जाते हैं।

### 3. इंद्रहार को भाप में कितनी देर पकाया जाता है?
घास के ऊपर रखी दाल की टिक्कियों को लगभग 10 से 12 मिनट तक भाप में पकाया जाता है।

### 4. इसे परोसने का सबसे आम तरीका क्या है?
इसे आमतौर पर टमाटर की चटनी या दही की चटनी के साथ बिना तले ही परोसा जाता है, हालांकि कुछ लोग इसे हल्का तलकर भी खाते हैं।

### 5. क्या इंद्रहार से अन्य पकवान भी बनाए जाते हैं?
हां, कई ग्रामीण इलाकों में इसकी भाप में पकी टिक्कियों का इस्तेमाल कढ़ी और ग्रेवी वाली सब्जी बनाने में भी किया जाता है।

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