# आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वैश्विक दौड़ में चिप के बाद अब बिजली और पावर ग्रिड बने सबसे बड़े रोड़े

> डेटा सेंटरों की अप्रत्याशित खपत से अमेरिका और यूरोप में बिजली की कीमतें आसमान छू रही हैं, जहां टरबाइन और ट्रांसमिशन लाइनों की भारी कमी ने बुनियादी ढांचे पर बड़ा दबाव डाल दिया है।

**Type:** article · **Category:** गाइड · **Published:** 2026-11-01 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/guides/ai-ki-vaishvika-daura-men-chipa-ke-bada-aba-bijali-aura-pavara-grida-bane-sabase-bare-rore-54622 · **Language:** Hindi
**Tags:** आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, पावर ग्रिड, डेटा सेंटर, बिजली संकट, जीई वर्नोवा, ऊर्जा खपत

आधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विस्तार में अब तक सबसे अधिक ध्यान माइक्रोप्रोसेसरों और अत्याधुनिक सिलिकॉन चिप्स के उत्पादन पर केंद्रित रहा है। डेटा प्रोसेसिंग की क्षमता हासिल करने के बाद अब समूचा तकनीकी उद्योग एक अप्रत्याशित संकट से रूबरू हो रहा है, जो इन सभी सुपरकंप्यूटरों को चलाने के लिए आवश्यक बिजली की कमी के रूप में सामने आया है। विश्वभर के ऊर्जा विशेषज्ञों और उद्योग विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि तकनीकी विकास की गति अब सेमीकंडक्टर उपलब्धता से अधिक इस बात पर निर्भर करेगी कि किस देश के पास चौबीसों घंटे स्थिर और सस्ती बिजली मुहैया कराने की क्षमता है। दुनिया के दो सबसे बड़े तकनीकी प्रतिद्वंद्वियों के बीच इस मामले में एक विचित्र असंतुलन बना हुआ है, जहां अमेरिका के पास उन्नत चिप्स मौजूद हैं लेकिन बिजली की तंगी है, वहीं चीन के पास विशाल विद्युत उत्पादन क्षमता है मगर अत्याधुनिक चिप्स का अभाव बना हुआ है।

## डेटा सेंटरों की भूख और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा खपत का गणित
वैश्विक स्तर पर डेटा केंद्रों का बिजली उपभोग जिस गति से बढ़ रहा है, उसने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा योजनाकारों के माथे पर बल ला दिए हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में डेटा केंद्रों की कुल बिजली खपत लगभग 485 टेरावाट घंटे दर्ज की गई थी। एजेंसी का ताजा अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह आंकड़ा दोगुना होकर 950 टेरावाट घंटे तक पहुंच जाएगा, जो वर्तमान समय में पूरी दुनिया द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली कुल विद्युत ऊर्जा का लगभग 3 प्रतिशत हिस्सा है। अगर भौगोलिक मांग की बात करें, तो वर्ष 2024 में इस कुल मांग का करीब 45 प्रतिशत हिस्सा अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका से आया, जबकि चीन की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत और समूचे यूरोप की हिस्सेदारी लगभग 15 प्रतिशत रही।

समस्या केवल इस विशाल आंकड़े की नहीं है, बल्कि उस रफ्तार की है जिससे यह मांग धरातल पर बढ़ रही है। एक आधुनिक डेटा केंद्र का निर्माण करने और उसे चालू करने में औसतन दो से पांच साल का समय लगता है। इसके विपरीत, एक नए पावर ग्रिड का निर्माण करने अथवा ट्रांसमिशन लाइनों का नेटवर्क फैलाने में अक्सर दस साल से भी अधिक समय लग जाता है। संयुक्त राष्ट्र के यूरोप आर्थिक आयोग ने सितंबर के महीने में इसी बुनियादी अंतर को लेकर दुनिया भर को आगाह किया था। तारों और ट्रांसमिशन ग्रिड के विस्तार की गति के मुकाबले बिजली की वास्तविक मांग कई गुना तेजी से बढ़ रही है, जिससे मौजूदा बुनियादी ढांचे पर असहनीय दबाव पैदा हो रहा है।

## गैस टरबाइन का भारी संकट और उपकरण निर्माताओं की लंबी प्रतीक्षा सूची
अक्षय ऊर्जा के उतार चढ़ाव भरे स्वभाव को देखते हुए तकनीकी कंपनियों को अपने विशाल सर्वरों के लिए निरंतर और पक्की बिजली की दरकार होती है, जिसके लिए प्राकृतिक गैस से चलने वाले टरबाइन सबसे तेज और भरोसेमंद जरिया माने जाते हैं। विडंबना यह है कि इन दिनों गैस टरबाइन हासिल करना लगभग नामुमकिन सा हो गया है। प्रमुख उपकरण निर्माता जीई वर्नोवा के पास ऑर्डरों और अग्रिम बुकिंग का बैकलाग जुलाई 2026 में 116 गीगावाट तक पहुंच गया था, और कंपनी का आकलन है कि साल के अंत तक यह आंकड़ा 125 गीगावाट को छू लेगा। स्थिति यह है कि कंपनी अब सीधे 2031 की डिलीवरी तिथियों के लिए ऑर्डर बुक कर रही है।

इसी तरह की स्थिति सीमेंस एनर्जी और मित्सुबिशी हैवी इंडस्ट्रीज जैसी वैश्विक कंपनियों के साथ भी है, जिनकी उत्पादन क्षमताएं आने वाले चार से पांच वर्षों के लिए पूरी तरह बुक हो चुकी हैं। आज अगर कोई निवेशक एक नए डेटा केंद्र की योजना को मंजूरी देता है, तो उसे माइक्रोचिप पाने में जितना वक्त लगेगा, उससे कहीं अधिक लंबा इंतजार बिजली उत्पादन करने वाले गैस टरबाइन के लिए करना पड़ेगा। जब तक जनसाधारण में बिजली के ऊंचे बिलों को लेकर उपजा जनाक्रोश इन परियोजनाओं की रफ्तार को और धीमा न कर दे, तब तक उपकरणों की यह लंबी प्रतीक्षा सूची बनी रहेगी।

## थोक बाजार में बिजली दरों का ऐतिहासिक उछाल और आम जनता पर बोझ
उपकरणों की तंगी और बढ़ती खपत का सीधा असर अब बिजली के थोक बाजारों और खुदरा उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका के सबसे बड़े रीजनल ट्रांसमिशन संगठन पीजेएम, जो उत्तरी वर्जीनिया के विशाल डेटा सेंटर गलियारे को बिजली आपूर्ति करता है, ने वर्ष 2028 से 2029 की अवधि के लिए क्षमता मूल्य 325 डॉलर प्रति मेगावाट दिन निर्धारित किया है। यह कीमत वर्ष 2024 से 2025 के स्तर से 11 गुना से भी अधिक महंगी है। यदि ट्रांसमिशन ऑपरेटर ने बातचीत के जरिए इस पर एक सीमा तय न की होती, तो यह दर और भी अधिक ऊंचाई पर जा सकती थी।

पीजेएम के आंतरिक बाजार निगरानी तंत्र ने साफ तौर पर रेखांकित किया है कि क्षमता की कीमतों में इस बेतहाशा उछाल के पीछे डेटा केंद्रों की अत्यधिक मांग मुख्य वजह है। इसके अलावा पीजेएम लगातार दूसरे साल अपनी आवश्यक विश्वसनीयता जरूरतों को पूरा करने से चूक गया है। इस वित्तीय संकट की मार अब सीधे आम परिवारों पर पड़ने लगी है। शिकागो के आसपास के इलाकों में आम घरेलू उपभोक्ताओं को दो साल पहले के मुकाबले बिजली के लिए लगभग 50 प्रतिशत तक अधिक भुगतान करना पड़ रहा है, और यह चिंताजनक स्थिति पूरे देश में फैलती जा रही है। पीजेएम के ग्रिड से जुड़ने की कतार में इस समय 100 गीगावाट से भी अधिक की नई उत्पादन क्षमताएं महीनों से मंजूरी का इंतजार कर रही हैं।

## यूरोप की पाबंदियां और वैश्विक ईंधन आपूर्ति में बाधाएं
यूरोपीय महाद्वीप में भी बुनियादी ढांचे की अपनी सीमाएं सामने आ चुकी हैं। आयरलैंड ने राजधानी डबलिन के आसपास नए डेटा सेंटरों को बिजली ग्रिड से जोड़ने पर सख्त पाबंदियां लागू कर दी हैं, ताकि घरेलू आपूर्ति बाधित न हो। इसी तर्ज पर नीदरलैंड्स ने भी नए डेटा केंद्रों की भौगोलिक अवस्थिति पर कानूनी सीमाएं तय कर दी हैं। इन पाबंदियों ने तकनीकी दिग्गजों को नए ठिकानों की तलाश करने पर मजबूर किया है।

दूसरी तरफ, होर्मुज जलडमरूमध्य का भूराजनीतिक संकट अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति को लगातार प्रभावित कर रहा है। यह व्यवधान उन प्रमुख तकनीकी केंद्रों को सबसे गहरी चोट पहुंचा रहा है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से आयातित ईंधन पर निर्भर हैं। जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और पश्चिमी यूरोप के अधिकांश हिस्से इस संकट से सीधे प्रभावित हुए हैं। इन देशों के लिए ऊर्जा की यह अस्थिरता पहले से मौजूद चिप प्रतिस्पर्धा में एक दोहरा जोखिम बनकर उभरी है। इस विषम परिस्थिति ने यह साबित कर दिया है कि घरेलू स्तर पर प्रचुर ऊर्जा संसाधन होना अब वैश्विक बाजार में सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ बन चुका है।

## चीन का विशाल ऊर्जा भंडार और अमेरिका की तकनीकी विवशताएं
चीन ने हाल के वर्षों में दुनिया का सबसे मजबूत ऊर्जा ढांचा तैयार कर लिया है। केवल वर्ष 2025 में ही चीन ने अपने नेटवर्क में 430 गीगावाट से अधिक पवन और सौर ऊर्जा की क्षमता जोड़ी है। शोध संस्थान ब्लूमबर्ग एनईएफ का अनुमान है कि अगले पांच वर्षों के दौरान चीन द्वारा जोड़ी जाने वाली नई बिजली उत्पादन क्षमता अमेरिका की तुलना में छह गुना से भी अधिक होगी। हालांकि, चीन के पास इस असीम ऊर्जा को इस्तेमाल करने के लिए अत्याधुनिक चिप्स का अभाव है। बीजिंग के अपने आधिकारिक आकलनों के मुताबिक, देश के अधिकांश डेटा केंद्र अपनी कुल क्षमता के केवल 20 से 30 प्रतिशत स्तर पर ही काम कर पा रहे हैं।

इसके विपरीत, अमेरिका की स्थिति बिल्कुल उल्टी है। उसके पास दुनिया के सबसे बेहतरीन सेमीकंडक्टर डिजाइन, विशाल निवेश पूंजी और प्राकृतिक गैस के प्रचुर भंडार हैं, लेकिन पुराना पड़ चुका ग्रिड, अत्यधिक कड़े नियम और टरबाइन हासिल करने की लंबी कतार उसके विकास की राह रोक रही हैं। इस बाधा को पार करने के लिए अमेज़न वेब सर्विसेज, माइक्रोसॉफ्ट एज़्योर और गूगल क्लाउड प्लेटफॉर्म जैसी दिग्गज हाइपरस्केल कंपनियां अब सरकारी ग्रिड को दरकिनार कर खुद के बिजली संयंत्र लगा रही हैं और पुराने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को दोबारा शुरू करने के लिए भारी पूंजी निवेश कर रही हैं।

## खाड़ी देशों की तैयारी, सुरक्षा खतरे और भविष्य के जोखिम
कनाडा, नॉर्डिक देशों और खाड़ी देशों जैसे संसाधन संपन्न मध्यवर्ती राष्ट्र इस वैश्विक संकट में अपनी मजबूत स्थिति का फायदा उठा रहे हैं। ये देश मौसम और समय की परवाह किए बिना चौबीसों घंटे सस्ती और अटूट बिजली देने का वादा कर रहे हैं। हालांकि, बिजली का होना और उसकी सुरक्षित डिलीवरी सुनिश्चित कर पाना दो अलग बातें हैं। डेटा केंद्रों पर मंडराते ईरानी हमलों के खतरों ने संयुक्त अरब अमीरात को यह कदम उठाने पर विवश कर दिया कि वह अपने सबसे बड़े एकीकृत एआई परिसर को विभाजित कर अलग अलग सुरक्षित और मजबूत ठिकानों पर स्थापित करे। दुनिया की सबसे सस्ती बिजली का भी कोई मूल्य नहीं रह जाता यदि बुनियादी ढांचे को सुरक्षा न दी जा सके।

जोखिम प्रबंधन का एक स्थापित आर्थिक नियम है कि जब भी किसी वस्तु की भारी कमी होती है, तो उसके बाद बेतहाशा अति निवेश का दौर आता है। वर्तमान समय में इस धारणा के आधार पर सैकड़ों गीगावाट की नई उत्पादन क्षमताएं बुक की जा रही हैं कि डेटा और कंप्यूटिंग की मांग हमेशा इसी दर से बढ़ती रहेगी। यदि भविष्य के एआई मॉडल उम्मीद से अधिक ऊर्जा दक्ष बन जाते हैं या फिर तकनीकी उद्योग की आय के नतीजे उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते, तो भारी भरकम लागत से तैयार की जा रही यह विशाल ऊर्जा क्षमता बेकार पड़ी रह जाएगी, जैसा कि वर्तमान में चीन के खाली पड़े डेटा केंद्रों में देखा जा रहा है।

इसके साथ ही राजनीतिक मोर्चे पर भी बदलाव तय हैं। जब आम परिवारों को यह महसूस होने लगता है कि कॉर्पोरेट डेटा सेंटरों के कारण उनके घरेलू बिजली के बिल बढ़ रहे हैं, तो नियामक संस्थाएं कड़े नियम बनाने पर मजबूर होती हैं। अमेरिका में अब ऐसे विधायी प्रस्ताव जोर पकड़ रहे हैं जिनमें डेटा सेंटरों को अपनी बिजली खुद पैदा करने या ग्रिड कनेक्शन के लिए कई गुना अधिक शुल्क चुकाने को कहा जा रहा है। आने वाले समय में पीजेएम के क्षमता शुल्क, टरबाइन के ऑर्डर बैकलॉग, होर्मुज के समुद्री मार्ग और चीन की उन्नत चिप्स तक पहुंच जैसे कारक तय करेंगे कि यह तकनीकी दौड़ किस दिशा में आगे बढ़ती है।

## इसका आप पर असर
डेटा सेंटरों की विशाल ऊर्जा खपत का असर अब अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों से निकलकर आम नागरिकों के बिजली बिलों और क्षेत्रीय ग्रिड की स्थिरता पर दिखने लगा है।

- **घरेलू बिजली बिलों में बढ़ोतरी:** थोक विद्युत क्षमता की नीलामी में भारी उछाल आने से आम उपभोक्ताओं की मासिक बिजली दरों पर सीधा दबाव बन रहा है। शिकागो जैसे क्षेत्रों में घरेलू बिजली दरें पिछले दो वर्षों में 50 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं, जिससे अन्य शहरों में भी नियामक संस्थाएं बिजली शुल्क बढ़ाने पर विचार कर रही हैं।
- **ग्रिड विश्वसनीयता पर दबाव:** भारी औद्योगिक मांग के कारण बड़े ट्रांसमिशन संगठन तय विश्वसनीयता मानकों को पूरा करने में असफल हो रहे हैं। आने वाले वर्षों में पीक लोड के समय बड़े शहरों में बिजली कटौती और वोल्टेज की अस्थिरता का जोखिम बढ़ सकता है।
- **तकनीकी बुनियादी ढांचे की लागत:** कंपनियों द्वारा निजी बिजली संयंत्र लगाने और परमाणु ऊर्जा समझौतों पर अरबों डॉलर खर्च करने से क्लाउड सेवाओं की लागत बढ़ सकती है। यह अतिरिक्त लागत अंततः आम उपभोक्ताओं को डिजिटल सेवाओं, सब्सक्रिप्शन और ऑनलाइन टूल्स के बढ़े हुए मासिक शुल्कों के रूप में चुकानी पड़ेगी।
- **पर्यावरणीय और जल संसाधन दबाव:** डेटा सेंटरों को ठंडा रखने और चलाने के लिए आवश्यक भारी जल व ऊर्जा खपत स्थानीय संसाधनों पर दबाव डाल रही है। इससे कई राज्यों में नए डेटा केंद्रों की स्थापना को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध और कानूनी पाबंदियां बढ़ सकती हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल के प्रशिक्षण और संचालन के लिए आवश्यक असीमित ऊर्जा की तुलना में वैश्विक विद्युत ग्रिड और उपकरण निर्माण की रफ्तार बेहद धीमी है। यह असंतुलन तकनीकी विस्तार और पारंपरिक ऊर्जा बुनियादी ढांचे के बीच गंभीर टकराव पैदा कर रहा है।

- **निर्माण चक्र में भारी अंतर:** एक आधुनिक डेटा केंद्र का निर्माण मात्र दो से पांच वर्षों के भीतर पूरा हो जाता है, जबकि उच्च क्षमता वाली ट्रांसमिशन लाइनों और ग्रिड नेटवर्क को स्थापित करने में एक दशक से अधिक का समय लगता है। बुनियादी ढांचे का यह अंतर मांग को आपूर्ति से बहुत आगे निकाल चुका है।
- **गैस टरबाइन उपकरणों की वैश्विक किल्लत:** चौबीसों घंटे विश्वसनीय बिजली देने वाले गैस टरबाइन निर्माताओं के पास 2031 तक के ऑर्डर पहले ही बुक हो चुके हैं। प्रमुख विनिर्माता जैसे जीई वर्नोवा के पास 116 गीगावाट से अधिक का बैकलाग है, जिससे कंपनियां समय पर नए बिजली संयंत्र लगाने में असमर्थ हैं।
- **चिप्स और ऊर्जा का वैश्विक भौगोलिक असंतुलन:** अमेरिका के पास उन्नत सेमीकंडक्टर मौजूद हैं लेकिन उसके पास तेजी से बिजली ग्रिड विस्तार की क्षमता नहीं है, जबकि चीन के पास प्रचुर ऊर्जा संसाधन हैं लेकिन उन्नत हार्डवेयर तक पहुंच सीमित है। इस भौगोलिक असमानता के कारण कोई भी पक्ष अपने संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं कर पा रहा है।
- **भूराजनीतिक और समुद्री ऊर्जा संकट:** होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव के कारण आयातित एलएनजी और कच्चे तेल पर निर्भर रहने वाले देशों के लिए ऊर्जा लागत अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। इसके साथ ही बुनियादी ढांचों पर हमलों के खतरे ने ऊर्जा केंद्रों के सुरक्षित संचालन को और अधिक जटिल बना दिया है।

## सवाल-जवाब

### 1. डेटा सेंटरों की बिजली खपत 2030 तक कितनी पहुंचने का अनुमान है?
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, डेटा सेंटरों की खपत वर्ष 2025 के 485 टेरावाट घंटे से दोगुनी होकर वर्ष 2030 तक लगभग 950 टेरावाट घंटे पहुंचने की उम्मीद है।

### 2. डेटा सेंटर और पावर ग्रिड निर्माण के समय में क्या बड़ा अंतर है?
एक डेटा सेंटर दो से पांच साल में बनकर तैयार हो जाता है, जबकि एक ट्रांसमिशन ग्रिड नेटवर्क के विस्तार में दस साल से भी अधिक का समय लग जाता है।

### 3. पीजेएम ग्रिड में बिजली क्षमता की कीमतें कितनी बढ़ी हैं?
पीजेएम ग्रिड में 2028 से 2029 के लिए क्षमता दरें बढ़कर 325 डॉलर प्रति मेगावाट दिन हो गई हैं, जो दो साल पहले के मुकाबले 11 गुना से भी ज्यादा हैं।

### 4. चीन में ऊर्जा की प्रचुरता के बावजूद डेटा सेंटर पूरी क्षमता पर क्यों नहीं चल पा रहे हैं?
अत्याधुनिक माइक्रोचिप्स की कमी के कारण चीन के डेटा सेंटर अपनी कुल क्षमता के केवल 20 से 30 प्रतिशत स्तर पर ही काम कर पा रहे हैं।

### 5. अमेज़न, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल बिजली संकट से निपटने के लिए क्या कर रहे हैं?
ये टेक कंपनियां सरकारी ग्रिड पर निर्भर रहने के बजाय खुद के बिजली संयंत्र लगा रही हैं और पुराने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को फिर से शुरू करने में पूंजी लगा रही हैं।

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