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  "type": "article",
  "title": "अहमदाबाद पुलिस ने किया 'बॉस स्कैम' का भंडाफोड़, चीन और पाकिस्तान से जुड़े मिले साइबर ठगी के तार",
  "summary": "अहमदाबाद पुलिस ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर धोखाधड़ी गिरोह का पर्दाफाश किया है जो पाकिस्तान और चीन के ऑपरेटरों को डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराता था। इस मामले में पश्चिम बंगाल से दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है।",
  "content": "अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर अनुपम सिंह गहलोत ने एक हाई-प्रोटिफ़ाइल और बड़े पैमाने पर चल रहे 'बॉस स्कैम' साइबर क्राइम नेटवर्क का सनसनीखेज खुलासा किया है। यह सिंडिकेट सीधे तौर पर पाकिस्तान और चीन में बैठे साइबर अपराधियों को अवैध गतिविधियों के लिए जरूरी तकनीकी ढांचा और सेवाएं प्रदान कर रहा था। जांच में सामने आया है कि इस बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के तार सरहद पार तक फैले हुए हैं और आरोपी पिछले चार से पांच वर्षों से इस अवैध कारोबार को अंजाम दे रहे थे। इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए पश्चिम बंगाल से दो संदिग्धों को धर दबोचा है, जबकि देश के अन्य हिस्सों में भी सुराग तलाशने के लिए व्यापक स्तर पर जांच आगे बढ़ाई जा रही है।\n\n \n\nपश्चिम बंगाल से हुई दो आरोपियों की गिरफ्तारी\n\nइस हाई-प्रोफाइल मामले में पुलिस के हाथ लगे दोनों मुख्य आरोपियों की पहचान इमरान अली पियाड़ा और इंजामुल के रूप में की गई है। गिरफ्तारी के दौरान पुलिस ने इनके कब्जे से कुल सात मोबाइल फोन बरामद किए, जिनमें तीन स्मार्टफोन और चार साधारण कीपैड वाले मोबाइल फोन शामिल थे। इन सभी मोबाइलों में सिम कार्ड सक्रिय पाए गए। इसके अलावा तलाशी के दौरान पुलिस ने एक इंटरनेट राउटर भी अपने कब्जे में लिया है, जिसका इस्तेमाल इस अवैध नेटवर्क को संचालित करने के लिए किया जा रहा था। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इन उपकरणों की फॉरेंसिक जांच से कई और बड़े खुलासे होने की उम्मीद है।\n\n \n \n\nइस्लामाबाद से संचालित हो रहा था कॉल सेंटर\n\nपुलिस जांच में यह बात सामने आई है कि यह आपराधिक गिरोह चीन और पाकिस्तान में सक्रिय साइबर हमलावरों को तकनीकी बुनियादी ढांचा और सहायता दे रहा था। कमिश्नर अनुपम सिंह गहलोत ने बताया कि ये लोग स्थानीय स्तर पर सिम कार्ड खरीदते थे और उन्हें विदेशी ऑपरेटरों तक पहुंचाते थे। इसके बाद चीनी मैलवेयर का इस्तेमाल करके इस्लामाबाद से चलाए जा रहे अवैध कॉल सेंटर्स को इन नंबरों से जोड़ा जाता था। यदि कोई पीड़ित अपराधी द्वारा भेजे गए किसी संदिग्ध लिंक पर क्लिक कर देता था, तो ये शातिर अपराधी गैर-कानूनी तरीके से रकम ट्रांसफर करने में सफल हो जाते थे। इस स्कैम का दायरा कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस एक ही ग्रुप के खिलाफ देश के 26 अलग-अलग राज्यों में कुल 251 शिकायतें पहले से ही दर्ज हैं। अपनी इन अवैध गतिविधियों के लिए इस सिंडिकेट ने कुल 4,500 सिम कार्ड खरीदे थे।\n\n \n\nओटीपी बेचने का चल रहा था बड़ा कारोबार\n\nखुलासा हुआ है कि यह गिरोह साइबर अपराधियों को वन-टाइम पासवर्ड यानी ओटीपी उपलब्ध कराने के काले कारोबार में भी गहराई से लिप्त था। कमिश्नर ने जानकारी दी कि इन लोगों ने अब तक लगभग 21,000 ओटीपी विभिन्न अपराधियों को मुहैया कराए हैं। सुरक्षा एजेंसियों की नजर से बचने और खुद को बचाने के लिए इन लोगों ने टेलीग्राम ऐप का इस्तेमाल बंद कर दिया था और अपना पूरा नेटवर्क व्हाट्सएप ग्रुपों पर शिफ्ट कर लिया था। आरोपी प्रत्येक ओटीपी के एवज में सौ रुपए वसूलते थे। पुलिस की शुरुआती छानबीन से एक गहरे अंतरराष्ट्रीय संबंध और साजिश का पर्दाफाश हुआ है। जांच में यह भी पता चला कि इस गिरोह ने अपने डिजिटल नेटवर्क से लैपटॉप और मोबाइल फोन समेत कुल लगभग 10,000 उपकरणों को आपस में जोड़ रखा था।\n\n \n\nकिस तरह कॉरपोरेट कर्मचारियों को बनाया जाता था निशाना\n\nइस तरह की धोखाधड़ी को अंजाम देने के लिए साइबर अपराधी बेहद शातिर तरीके अपनाते थे। वे खुद को भारतीय रिजर्व बैंक अथवा किसी अन्य बड़े सरकारी संस्थान का वरिष्ठ अधिकारी बताकर संपर्क करते थे। इसके बाद किसी कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, निदेशक या अन्य कर्मचारियों को व्हाट्सएप या ईमेल के जरिए एक जिप फाइल भेजी जाती थी। इस फाइल के अंदर एक्जीक्यूटेबल फाइल और सिस्टम लाइब्रेरी फाइल जैसी हानिकारक मैलवेयर फाइलें छिपी होती थीं। जैसे ही पीड़ित कर्मचारी व्हाट्सएप वेब के माध्यम से अपने कंप्यूटर या लैपटॉप पर इस फाइल को खोलता था, अपराधी उस व्हाट्सएप वेब सेशन का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लेते थे।\n\n \n\nव्हाट्सएप प्रोफाइल क्लोन कर दिया जाता था झांसा\n\nकंट्रोल मिलते ही अपराधी कंपनी के असली सीईओ या निदेशक के नाम से अपना मोबाइल नंबर सेव कर लेते थे और उनकी असली प्रोफाइल फोटो लगाकर हूबहू वैसी ही फर्जी प्रोफाइल बना लेते थे। इसके बाद कंपनी के खातों और वित्त विभाग के कर्मचारियों को तत्काल वित्तीय लेनदेन की आवश्यकता बताकर व्हाट्सएप संदेशों के जरिए भारी-भरकम रकम ट्रांसफर करने के निर्देश दिए जाते थे। असली बॉस के नंबर को हटाकर ठग का नंबर उसी नाम से सेव कर लिया जाता था, जिससे कर्मचारियों के लिए यह पहचान करना असंभव हो जाता था कि संदेश असली है या फर्जी। इस तरह बिना किसी शक के कर्मचारी पैसे ट्रांसफर कर देते थे। इन कारनामों के लिए फर्जी और डमी सिम कार्ड का इस्तेमाल किया जाता था।\n\n \n\nमुख्य आरोपी इमरान अली पियाड़ा की भूमिका\n\nगिरफ्तार किए गए आरोपियों में से एक इमरान अली पियाड़ा ने बीए तक की शिक्षा हासिल की है और वह वर्तमान में एयरटेल, जियो, वोडाफोन-आइडिया और बीएसएनएल जैसी प्रमुख टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों के लिए पॉइंट ऑफ सेल के रूप में काम कर रहा था। आरोपी ग्राहकों के बायोमेट्रिक फिंगरप्रिंट और संबंधित टेलीकॉम कंपनियों के एप्लीकेशन का दुरुपयोग करके ग्राहकों की जानकारी के बिना उनके नाम पर नए सिम कार्ड हासिल कर लेता था। इसके बाद आर्थिक मुनाफे के लिए वह इन नंबरों को डमी सिम कार्ड के रूप में सक्रिय करवा लेता था। इन डमी सिम कार्डों को अलग-अलग मोबाइलों में डालकर वह साइबर ठगों को डिजिटल संचार व्यवस्था और व्हाट्सएप अकाउंट एक्टिवेट करने के लिए ओटीपी उपलब्ध कराता था।\n\n \n\nओटीपी बेचकर की गई लाखों की कमाई\n\nजांच में पता चला कि आरोपी इमरान केवल साइबर धोखाधड़ी ही नहीं, बल्कि अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसे प्रमुख ई-कॉमर्स एप्लीकेशन और ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म के लिए भी डमी सिम कार्ड का इस्तेमाल कर रहा था और उनके जरिए मिलने वाले ओटीपी को बेच रहा था। शुरुआती जांच के अनुसार पिछले पांच वर्षों के दौरान उसने ई-कॉमर्स और ऑनलाइन गेमिंग के लिए लगभग 21,000 ओटीपी औसतन सौ रुपए प्रति ओटीपी की दर से बेचे, जिससे उसे इक्कीस लाख रुपए से अधिक की अवैध कमाई हुई। इसके अलावा, व्हाट्सएप अकाउंट सक्रिय करने के लिए उसने लगभग 900 ओटीपी औसतन ढाई सौ रुपए प्रति ओटीपी की दर से बेचे, जिससे उसे सवा दो लाख रुपए से ज्यादा की अतिरिक्त आय प्राप्त हुई।\n\n \n\nदूसरे आरोपी इंजामुल की संलिप्तता\n\nइस मामले में पकड़े गए दूसरे आरोपी इंजामुल ने भी बीए तक की पढ़ाई की है। पुलिस जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि वह सीधे तौर पर साइबर धोखाधड़ी में शामिल अन्य अपराधियों के संपर्क में था और उनके साथ लगातार तालमेल बिठाकर काम कर रहा था। आरोपी ने साइबर ठगी में इस्तेमाल होने वाले मोबाइल नंबरों, डमी सिम कार्डों और व्हाट्सएप आधारित संचार प्रणालियों का नेटवर्क चलाने में सक्रिय सहायता प्रदान की थी। पुलिस का कहना है कि उसने इन अवैध नंबरों के जरिए होने वाली गतिविधियों में अपराधियों का पूरा साथ दिया और इस संगठित अपराध को फैलाने में अहम भूमिका निभाई।\n\n \n\nपुलिस की चेतावनी और जनता से अपील\n\nमामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस कमिश्नर अनुपम सिंह गहलोत ने बताया कि पुलिस ने इन सभी संदिग्ध उपकरणों को तकनीकी रूप से निष्क्रिय कर दिया है, जो इस अवैध नेटवर्क के बुनियादी ढांचे के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। आम जनता को आगाह करते हुए उन्होंने नागरिकों से पूरी तरह सतर्क रहने की अपील की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि बिना उचित जांच-पड़ताल किए किसी भी अनजान फाइल को बिल्कुल न खोलें और न ही किसी संदिग्ध लिंक पर क्लिक करें। इस तरह के लिंक ही गैर-कानूनी तरीके से पैसे हड़पने और खातों से रकम ट्रांसफर करने का मुख्य जरिया बनते हैं। इस अंतरराष्ट्रीय मॉड्यूल और इसमें संलिप्त अन्य स्थानीय चेहरों का पता लगाने के लिए आगे की गहन जांच अभी भी जारी है।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: देश के नागरिकों और कंपनियों को अज्ञात लिंक और संदिग्ध दस्तावेजों से सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय साइबर गिरोह कॉर्पोरेट कर्मचारियों को निशाना बना रहे हैं।\n• अहमदाबाद में: स्थानीय प्रशासन और साइबर सेल ने फर्जी सिम कार्ड नेटवर्क पर नकेल कसनी शुरू कर दी है, जिससे नागरिकों को अपनी डिजिटल सुरक्षा और बायोमेट्रिक डेटा को लेकर सतर्क रहना होगा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. बॉस स्कैम क्या है और यह कैसे काम करता है?\nबॉस स्कैम एक अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध है जिसमें ठग कंपनी के सीईओ या निदेशक की फर्जी प्रोफाइल बनाकर कर्मचारियों से व्हाट्सएप के जरिए तुरंत पैसे ट्रांसफर करवाते हैं।\n\n2. इस मामले में पुलिस ने कितने लोगों को गिरफ्तार किया है?\nअहमदाबाद पुलिस ने पश्चिम बंगाल से इस मामले में इमरान अली पियाड़ा और इंजामुल नाम के दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है।\n\n3. साइबर ठग किस देश से अपना कॉल सेंटर चला रहे थे?\nजांच में पता चला है कि इस स्कैम का मुख्य कॉल सेंटर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से संचालित किया जा रहा था।\n\n4. आरोपी साइबर ठगों को क्या सुविधाएं मुहैया कराते थे?\nआरोपी फर्जी और डमी सिम कार्ड के जरिए मोबाइल नंबर, व्हाट्सएप अकाउंट एक्टिवेशन के लिए ओटीपी और चीनी मैलवेयर आधारित संचार इन्फ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराते थे।\n\n5. आरोपी हर ओटीपी के लिए कितने रुपये वसूलते थे?\nआरोपी व्हाट्सएप अकाउंट एक्टिवेट करने के लिए हर ओटीपी के औसतन सौ रुपये से लेकर ढाई सौ रुपये तक वसूलते थे।",
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  "category": "गुजरात",
  "publishedAt": "2026-08-18",
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