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  "type": "article",
  "title": "हनी-ट्रैप के नए पैंतरे से अलर्ट हुई भारतीय एजेंसियां, पाकिस्तान की आईएसआई सोशल मीडिया पर तैनात कर रही मनोवैज्ञानिक",
  "summary": "पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई अब भारतीय अधिकारियों से गोपनीय जानकारी निकालने के लिए पेशेवर मनोवैज्ञानिकों का इस्तेमाल कर रही है। सोशल मीडिया पर फर्जी प्रोफाइल बनाकर ये मनोवैज्ञानिक अधिकारियों की कमजोरियों का फायदा उठाते हैं।",
  "content": "भारतीय सुरक्षा ढांचे को निशाना बनाने के लिए पड़ोसी देश की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अपने तरीकों में एक बड़ा बदलाव किया है। पारंपरिक डराने-धमकाने या पैसों का लालच देने के तरीकों से इतर, अब संवेदनशील जानकारियों तक पहुंच रखने वाले अधिकारियों को फंसाने के लिए प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों का सहारा लिया जा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर सक्रिय अधिकारियों की निजी समस्याओं और कमजोर स्थितियों को भांपकर यह नया साइबर हनी-ट्रैप नेटवर्क बुना जा रहा है। देश में लगातार जारी की जाने वाली सुरक्षा चेतावनियों के बावजूद कई अधिकारी इस नए मनोवैज्ञानिक जाल में उलझ रहे हैं।\n\nसोशल मीडिया पर खुफिया जाल का बदला तरीका\nइंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी के अनुसार, आईएसआई ने ऐसे अधिकारियों की पहचान करने के लिए विशेष रूप से मनोवैज्ञानिकों को काम पर रखा है जिनके पास सरकारी और रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील दस्तावेज या जानकारियां उपलब्ध होती हैं। इन मनोवैज्ञानिकों को सबसे पहले महिलाओं के नाम से नकली सोशल मीडिया प्रोफाइल बनाने का निर्देश दिया जाता है। इसके बाद ये लोग ऐसे अधिकारियों पर नजर रखते हैं जो अपनी व्यक्तिगत या नौकरी से जुड़ी निराशा को निकालने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं। मनोवैज्ञानिकों की विशेष ट्रेनिंग इन्हें यह समझने में मदद करती है कि कौन सा अधिकारी मानसिक तनाव से गुजर रहा है और किस पर आसानी से निशाना साधा जा सकता है।\n\nदो से तीन महीने की गहरी साज़िश और मनोवैज्ञानिक खेल\nपहचान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, ये फर्जी प्रोफाइल संचालित करने वाले मनोवैज्ञानिक सीधे बातचीत शुरू करते हैं। बातचीत के दौरान वे अधिकारी की निजी समस्याओं के प्रति गहरी सहानुभूति और आत्मीयता दिखाते हैं। हनी-ट्रैप का यह नया तरीका रातों-रात अंजाम नहीं दिया जाता। आईएसआई के मनोवैज्ञानिक लगभग दो से तीन महीने का लंबा वक्त केवल अधिकारी की कमजोरियों का अध्ययन करने और उसका पूरा भरोसा जीतने में बिताते हैं। जब एक बार गाढ़ा विश्वास कायम हो जाता है, तो आकर्षण और नजदीकी का फायदा उठाकर अधिकारी को डिजिटल संचार माध्यमों के जरिए संवेदनशील जानकारी साझा करने के लिए उकसाया जाता है।\n\nचीन में निर्मित स्पाइवेयर और तकनीकी घुसपैठ\nएक बार भरोसा बन जाने के बाद, अगला कदम तकनीकी रूप से डिवाइस को हैक करना होता है। इन मनोवैज्ञानिकों द्वारा अधिकारियों को अपने कंप्यूटर या स्मार्टफोन पर विशेष एप्लीकेशन इंस्टॉल करने की सलाह दी जाती है। अधिकारियों को बताया जाता है कि ये सामान्य या उपयोगी ऐप हैं, जबकि असल में इन एप्लीकेशन में गुप्त रूप से काम करने वाले स्पाइवेयर और मैलवेयर छिपे होते हैं। जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे अधिकांश स्पाइवेयर और मैलवेयर चीन में निर्मित होते हैं। ये ऐप सिस्टम में इंस्टॉल होते ही संवेदनशील डेटा को चुराकर सीधे हैकर्स तक पहुंचाने लगते हैं।\n\nभारतीय सुरक्षा एजेंसियों की चिंता और सतर्कता\nहाल के मामलों में यह देखा गया है कि अधिकारियों की निजी समस्याओं का फायदा उठाने की यह तरकीब आईएसआई के लिए बेहद कारगर साबित हो रही है। यही कारण है कि पाकिस्तान में हनी-ट्रैप नेटवर्क के लिए पेशेवर मनोवैज्ञानिकों की मांग में अचानक तेजी आई है। भारतीय एजेंसियों की चिंता इस बात से और बढ़ गई है कि नियमित रूप से सुरक्षा एडवाइजरी जारी किए जाने के बावजूद कई अधिकारी इस जाल का शिकार बन रहे हैं। वे जाने-अनजाने अपने सिस्टम में डेटा लीक करने वाले खतरनाक सॉफ्टवेयर डाउनलोड कर लेते हैं और संवेदनशील जानकारी डिजिटल चैनलों से लीक हो जाती है।\n\nइसका आप पर असर\nसुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था पर इसका व्यापक असर पड़ेगा:\n\n• भारत में: सरकारी और सुरक्षा विभागों में सोशल मीडिया इस्तेमाल के नियमों को और सख्त किया जाएगा। इससे संवेदनशील पदों पर तैनात अधिकारियों की डिजिटल गतिविधियों की कड़ी निगरानी होगी ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारियां लीक न हों।\n• अधिकारियों के लिए: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर व्यक्तिगत समस्याओं को उजागर करने से बचना होगा। किसी भी अनजान प्रोफाइल से मिलने वाले ऐप या लिंक को डाउनलोड करने से पहले कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करना अनिवार्य होगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nपारंपरिक हनी-ट्रैप के तरीकों की नाकामी और सतर्कता बढ़ने के कारण खुफिया एजेंसियों ने अपना तरीका बदल दिया है।\n\n• मनोवैज्ञानिक पकड़: पैसे या धमकियों के बजाय भावनात्मक जुड़ाव और सहानुभूति दिखाकर अधिकारियों को फंसाना ज्यादा आसान साबित हो रहा है।\n• पहचान छुपाना: सोशल मीडिया पर महिलाओं के नाम से फर्जी प्रोफाइल बनाकर मनोवैज्ञानिक आसानी से अपनी असली पहचान छिपा लेते हैं।\n• तकनीकी घुसपैठ: चीन में बने स्पाइवेयर के जरिए केवल बातचीत ही नहीं, बल्कि पूरे डिवाइस का डेटा आसानी से चुराया जा सकता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. आईएसआई हनी-ट्रैप में मनोवैज्ञानिकों का इस्तेमाल क्यों कर रही है?\nमनोवैज्ञानिक संवेदनशील जानकारी रखने वाले अधिकारियों की मानसिक स्थिति और निजी समस्याओं को आसानी से समझकर उन्हें झांसे में ले लेते हैं।\n\n2. यह नया हनी-ट्रैप नेटवर्क किस प्रकार काम करता है?\nमनोवैज्ञानिक महिलाओं के नाम से सोशल मीडिया प्रोफाइल बनाते हैं, अधिकारियों की गतिविधियों का अध्ययन करते हैं और सहानुभूति दिखाकर उनसे नजदीकी बढ़ाते हैं।\n\n3. मनोवैज्ञानिक अधिकारियों का भरोसा जीतने में कितना समय लेते हैं?\nवे अधिकारियों का विश्वास हासिल करने और उनकी कमजोरियों का पता लगाने में लगभग दो से तीन महीने का समय बिताते हैं।\n\n4. हनी-ट्रैप में किस प्रकार के सॉफ्टवेयर का उपयोग किया जा रहा है?\nइसमें चीन में बने स्पाइवेयर और मैलवेयर वाले एप्लीकेशन का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिन्हें अधिकारी अपने फोन या सिस्टम पर इंस्टॉल कर लेते हैं।\n\n5. भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चिंता क्या है?\nबार-बार एडवाइजरी जारी करने के बावजूद अधिकारियों का इन मनोवैज्ञानिक जालों में फंसना और सिस्टम में मैलवेयर इंस्टॉल कर लेना सबसे बड़ी चिंता है।",
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  "category": "गुजरात",
  "publishedAt": "2026-09-08",
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