# प्रयोगशालाओं में जानवरों के परीक्षण पर केंद्र के नए मसौदे का विरोध, वैज्ञानिक विश्वसनीयता पर उठे गंभीर सवाल

> केंद्र सरकार द्वारा प्रयोगशाला पशुओं से संबंधित जारी नए मसौदे पर वैज्ञानिकों और पशु कल्याण कार्यकर्ताओं ने आपत्ति जताई है। विशेषज्ञों का मानना है कि खुले बाजार से जीव खरीदने की छूट और गैर-पशु विकल्पों की अनिवार्यता हटाने से शोध की गुणवत्ता और जानवरों की सुरक्षा दोनों प्रभावित होंगे।

**Type:** article · **Category:** गुजरात · **Published:** 2026-11-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/gujarat/prayogashalaon-men-janavaron-ke-parikshana-para-kendra-ke-nae-masaude-ka-virodha-vaijnanika-vishvasaniyata-para-uthe-gnbhira-saval-55808 · **Language:** Hindi
**Tags:** पशु परीक्षण नियम, प्रयोगशाला पशु, वैज्ञानिक अनुसंधान, पशु क्रूरता निवारण, सूरत पर्वतम, क्लिनिकल ट्रायल, ऑर्गन ऑन चिप

वैज्ञानिक अनुसंधान और चिकित्सा परीक्षणों में जीवों के इस्तेमाल को लेकर तैयार किए गए नए नियमों के मसौदे पर विवाद गहरा गया है। प्रयोगशालाओं में शोध कार्यों की गति तेज करने के उद्देश्य से पेश किए गए इस नए कानूनी ढांचे को लेकर पशु कल्याण विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने गहरी चिंता जताई है। उनका मानना है कि प्रस्तावित व्यवस्था से न केवल अनुसंधान परिसरों में मौजूद सुरक्षा मानक कमजोर पड़ेंगे, बल्कि परीक्षण के दौरान बेजुबानों को अत्यधिक यातनाओं का सामना भी करना पड़ सकता है।

## पुराने कानूनों की जगह लेने की तैयारी और प्रतिक्रिया की मियाद
अक्टूबर के महीने में केंद्र सरकार की ओर से पशु क्रूरता निवारण के तहत प्रयोगशाला जानवरों के नियंत्रण, पर्यवेक्षण, प्रजनन और व्यापार से संबंधित 2026 के मसौदा नियमों को सार्वजनिक किया गया था। इस नए दस्तावेज का मुख्य मकसद 1968 और 1998 से प्रभावी मौजूदा कानूनी दिशा-निर्देशों को पूरी तरह प्रतिस्थापित करना है। सरकारी पक्ष का मानना है कि पुराने कायदे-कानूनों में बदलाव करके वैज्ञानिक परीक्षणों की रफ्तार को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। इस मसौदे पर सार्वजनिक राय, आपत्तियां और सुझाव दर्ज कराने के लिए 5 नवंबर तक का समय तय किया गया है।

## खुले बाजार से खरीद की अनुमति पर विशेषज्ञों का कड़ा ऐतराज
ह्यूमन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स से जुड़ी सीनियर प्रोग्राम डायरेक्टर डॉ. सूरत पर्वतम ने इन प्रस्तावित बदलावों के वैज्ञानिक और नैतिक दोनों पहलुओं पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आगाह किया कि नए दिशा-निर्देशों के तहत यदि पंजीकृत केंद्रों से जीव उपलब्ध नहीं होते हैं, तो वैज्ञानिकों को अपंजीकृत प्रजनकों या खुले बाजारों से भी पशु हासिल करने की छूट मिल सकती है। ऐसी ढील के कारण सड़कों पर घूमने वाले आवारा और वन्यजीव संरक्षण कानून के दायरे में आने वाले जीवों को भी पकड़कर अनुसंधान के लिए इस्तेमाल किए जाने का गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस बदलाव को बेहद जोखिम भरा बताते हुए डॉ. सूरत पर्वतम ने स्पष्ट किया कि प्रयोगशाला परीक्षणों में इस्तेमाल किए जाने वाले खास नस्ल के जीवों का संपूर्ण मेडिकल इतिहास और आनुवंशिक रिकॉर्ड पहले से मौजूद रहता है। इससे अनुसंधान के दौरान आवश्यक एकरूपता बनी रहती है और प्राप्त नतीजों की प्रमाणिकता पर कोई संदेह नहीं रहता। यदि किसी अनजाने स्रोत, खुले बाजार या सड़क से उठाए गए पशु पर कोई परीक्षण किया जाएगा, तो उसकी जेनेटिक पृष्ठभूमि और पिछली बीमारियों की कोई जानकारी नहीं होगी। डॉ. सूरत ने कहा, "अनुसंधान की वैज्ञानिक विश्वसनीयता बहुत महत्वपूर्ण होती है।"

## वैकल्पिक परीक्षण विधियों की प्राथमिकता हटाने से बढ़ा असंतोष
मौजूदा कानूनी व्यवस्था और नए मसौदे के बीच की तुलना करते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि पुराने नियमों में शोधकर्ताओं के लिए यह अनिवार्य शर्त रखी गई थी कि वे जीवित पशुओं को कष्ट देने से पहले आधुनिक गैर-पशु परीक्षण तरीकों को प्राथमिकता दें। अगर कोई वैज्ञानिक उन आधुनिक तरीकों का उपयोग नहीं करता था, तो उसे नियामक संस्थाओं के सामने इसका ठोस और संतोषजनक कारण स्पष्ट करना होता था। प्रस्तावित 2026 के मसौदे में से इस अनिवार्य शर्त को हटा दिया गया है, जिसे शोध की नैतिकता के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

इस कदम को देश के आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विपरीत बताते हुए विशेषज्ञों ने याद दिलाया कि वर्ष 2023 में केंद्र सरकार ने नई दवाओं और क्लिनिकल ट्रायल नियमों में कुछ अहम सुधारों का प्रस्ताव रखा था। उन सुधारों का मुख्य ध्येय दवा परीक्षणों के दौरान जीवों पर इंसानों की निर्भरता को घटाना और अत्याधुनिक वैज्ञानिक विकल्पों को अपनाना था।

## आधुनिक अनुसंधान से पीछे हटने की आशंका और पुनर्विचार की मांग
उस समय आधुनिक तकनीकों जैसे मानव कोशिकाओं से विकसित ऑर्गेनॉइड्स, ऑर्गन-ऑन-चिप सिस्टम और अन्य उन्नत मानव-आधारित परीक्षण मॉडल को प्रोत्साहित करने की योजना बनाई गई थी। ये उन्नत प्रणालियां मानव शरीर की जटिल जैविक क्रियाओं को अधिक सटीक ढंग से समझने और नई औषधियों के प्रभावों का सटीक विश्लेषण करने में सक्षम हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, 2026 का यह नया मसौदा देश को इन आधुनिक प्रगतिशील कदमों से पीछे की तरफ ले जाने जैसा प्रतीत होता है।

डॉ. सूरत पर्वतम ने इस मसौदे की समीक्षा करने की अपील करते हुए जोर दिया कि अनुसंधान की गति बढ़ाना आवश्यक है, लेकिन इसके लिए पशुओं के प्रति मानवीय संवेदनशीलता, उनकी बुनियादी सुरक्षा और वैज्ञानिक आंकड़ों की निष्पक्षता को ताक पर नहीं रखा जा सकता। आम नागरिक और संबंधित हितधारक इस प्रस्तावित मसौदे पर अपनी टिप्पणियां और सुझाव 5 नवंबर तक ईमेल के जरिए cpcsea-mef@gov.in पर भेज सकते हैं।

## इसका आप पर असर
यह प्रस्तावित नीतिगत बदलाव वैज्ञानिक अनुसंधानों की विश्वसनीयता और औषधियों के सुरक्षा मानकों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।

- **दवाओं की सुरक्षा पर असर:** अज्ञात मेडिकल हिस्ट्री वाले पशुओं पर परीक्षण से दवाओं के दुष्प्रभाव की सटीक पहचान प्रभावित हो सकती है। आम नागरिकों के लिए बाजार में आने वाली नई दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है।
- **आधुनिक तकनीक अपनाने में देरी:** गैर-पशु परीक्षण की अनिवार्यता हटने से शोध संस्थानों में उन्नत भारतीय तकनीकों का विकास धीमा पड़ सकता है। नतीजतन, आधुनिक और सटीक स्वास्थ्य प्रणालियों के विस्तार में अधिक समय लगेगा।
- **आवारा पशुओं की सुरक्षा का मुद्दा:** अनियंत्रित खरीद की गुंजाइश से सड़कों पर घूमने वाले बेसहारा जीवों के पकड़े जाने का खतरा बढ़ जाता है। स्थानीय स्तर पर पशु प्रेमियों और जागरूक नागरिकों को अपने क्षेत्रों में निगरानी बढ़ानी पड़ सकती है।
- **जनता के लिए सुझाव देने का अवसर:** सरकार ने इस मसौदे पर आम जनता और विशेषज्ञों से औपचारिक टिप्पणियां मांगी हैं। कोई भी नागरिक 5 नवंबर तक ईमेल के जरिए अपने विचार दर्ज करवाकर इस नीति को प्रभावित कर सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह विवाद तब शुरू हुआ जब सरकार ने अनुसंधान प्रक्रियाओं को सुगम बनाने के लिए दशकों पुराने कानूनों को संशोधित करने का मसौदा पेश किया, जिस पर वैज्ञानिकों ने प्रक्रियागत खामियों की ओर इशारा किया।

- **अनुसंधान की गति तेज करने का उद्देश्य:** केंद्र सरकार पुराने नियमों को हटाकर ऐसी व्यवस्था बनाना चाहती है जिससे प्रयोगशालाओं में परीक्षण की प्रक्रिया तेज हो सके। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि नियमों में अत्यधिक छूट देने से वैज्ञानिक प्रमाणिकता के साथ समझौता हो सकता है।
- **खरीद मानकों में प्रस्तावित ढील:** मसौदे में पंजीकृत स्रोतों के अलावा अन्य विक्रेताओं से जीव प्राप्त करने की गुंजाइश रखी गई है। इसी बिंदु ने यह आशंका पैदा की कि अनियंत्रित प्रजनकों और आवारा पशुओं का अनैतिक इस्तेमाल शुरू हो सकता है।
- **2023 की प्रगतिशील नीति से भटकाव:** इससे पहले सरकार ने गैर-पशु परीक्षण विधियों जैसे मानव-कोशिका प्रणालियों को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठाए थे। नए मसौदे में उन वैकल्पिक परीक्षणों की अनिवार्यता हटाने से विशेषज्ञों में असंतोष उत्पन्न हुआ।

## सवाल-जवाब

### 1. केंद्र सरकार ने किन नए नियमों का मसौदा जारी किया है?
सरकार ने पशु क्रूरता निवारण (प्रयोगशाला जानवरों के प्रयोग, प्रजनन और व्यापार का नियंत्रण और पर्यवेक्षण) नियम, 2026 का ड्राफ्ट जारी किया है।

### 2. यह नया मसौदा किन पुराने नियमों की जगह लेगा?
यह नया मसौदा लागू होने के बाद वर्ष 1968 और 1998 के मौजूदा नियमों की जगह लेगा।

### 3. प्रस्तावित नियमों पर राय और आपत्तियां दर्ज कराने की अंतिम तारीख क्या है?
हितधारक और आम नागरिक 5 नवंबर तक ईमेल के जरिए अपने सुझाव और आपत्तियां भेज सकते हैं।

### 4. खुले बाजार से पशुओं की खरीद पर क्या चिंता जताई गई है?
विशेषज्ञों का कहना है कि खुले बाजार या अपंजीकृत स्रोतों से लाए गए पशुओं की मेडिकल हिस्ट्री और जेनेटिक बैकग्राउंड अज्ञात रहेगा, जिससे वैज्ञानिक नतीजों की विश्वसनीयता प्रभावित होगी।

### 5. गैर-पशु वैकल्पिक परीक्षणों को लेकर पुराने और नए नियमों में क्या अंतर है?
पुराने नियमों में पशुओं पर प्रयोग से पहले वैकल्पिक परीक्षण पद्धतियों का उपयोग अनिवार्य था, जबकि नए मसौदे से यह अनिवार्यता हटा दी गई है।

### 6. वर्ष 2023 में सरकार ने किन आधुनिक परीक्षण तकनीकों को बढ़ावा देने का प्रस्ताव रखा था?
वर्ष 2023 में सरकार ने जानवरों पर निर्भरता घटाने के लिए ऑर्गेनॉइड्स और ऑर्गन-ऑन-चिप जैसी मानव-आधारित प्रणालियों को बढ़ावा देने का प्रस्ताव रखा था।

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