रेलवे परिसरों में कबाड़ से सजी खूबसूरत कलाकृतियां, उत्तर रेलवे के कर्मचारियों ने पेश की रचनात्मक मिसाल उत्तर रेलवे के कर्मचारियों ने 'स्वच्छता ही सेवा अभियान 2026' के तहत विभिन्न शेड्स में बेकार पड़े कबाड़ से दरियाई घोड़ा, घड़ी और फूलदान जैसी शानदार कलाकृतियां बनाई हैं। भारतीय रेल के विभिन्न परिसरों में अनुपयोगी पड़ी सामग्री को नई पहचान देने के लिए एक विशेष रचनात्मक मुहिम चलाई गई है। उत्तर रेलवे की कई प्रमुख इकाइयों में 'स्वच्छता ही सेवा अभियान 2026' के अंतर्गत 'कबाड़ से जुगाड़' अथवा 'कबाड़ से कला' विषय पर व्यापक स्तर पर कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस पूरे प्रयास का केंद्रीय ध्येय रेल परिसरों में स्वच्छता को सुदृढ़ करना, पर्यावरण की सुरक्षा करना और गैर-उपयोगी मानी जाने वाली चीजों के पुनर्चक्रण को व्यवहार में लाना है। इस अभियान में रेल कर्मचारियों ने अपनी सामूहिक प्रतिभा, नवीन सोच और टीम भावना का समन्वय करते हुए अनुपयोगी वस्तुओं से आकर्षक मूर्तियों और कलाकृतियों का निर्माण कर दिखाया है। आलमबाग और लुधियाना शेड्स में उभरी अनुपम आकृतियां उत्तर रेलवे के अंतर्गत आलमबाग स्थित डीजल शेड तथा लुधियाना स्थित इलेक्ट्रिक लोको शेड में तकनीकी कर्मियों ने बेकार सामग्री का ऐसा उपयोग किया जिसने सभी का ध्यान खींचा। इन दोनों स्थानों पर कर्मचारियों ने कबाड़ से दरियाई घोड़ा, कलात्मक घड़ी और कई तरह के मनमोहक सजावटी प्रारूप तैयार किए हैं। जिस सामग्री को जंग लगा और पूरी तरह निष्प्रयोज्य मानकर फेंक दिया जाता, उसी धातु और उपकरणों को कर्मचारियों ने अपनी रचनात्मकता से एक बिल्कुल नया सौंदर्य प्रदान किया। इससे यह साबित हुआ कि कल्पनाशक्ति और लगन के बल पर साधारण धातु के टुकड़े भी कला का माध्यम बन सकते हैं। तुगलकाबाद और गाजियाबाद में धातु कबाड़ से बने कलात्मक फूलदान रचनात्मकता का ऐसा ही प्रदर्शन तुगलकाबाद के डीजल शेड और गाजियाबाद के इलेक्ट्रिक लोको शेड में भी देखने को मिला। इन दोनों कार्यशालाओं में विभिन्न अनुभागों के कर्मचारियों ने मिलकर बेकार पुर्जों से भव्य फूलदान और मनोहारी कलात्मक वस्तुएं गढ़ी हैं। इस परियोजना में अलग-अलग विंग के रेलकर्मियों ने आपसी सहयोग और तालमेल के साथ हाथ बंटाया। उन्होंने बेकार सामग्री को इस प्रकार व्यवस्थित किया कि वह कार्यालयों और शेड परिसरों की शोभा बढ़ाने वाली उत्कृष्ट कृतियों में तब्दील हो गई। कर्मचारियों ने अपने हुनर के जरिए साबित किया कि तकनीकी काम करने वाले हाथ कलात्मक सृजन में भी माहिर हैं। 'वेस्ट टू आर्ट' और पुनर्चक्रण के जरिए पर्यावरण संरक्षण इस पूरे आयोजन के मूल में 'वेस्ट टू आर्ट' यानी कबाड़ से कला सृजन की अवधारणा को मजबूती देना है। उत्तर रेलवे के इस अभियान का मुख्य उद्देश्य कर्मियों के बीच स्वच्छता, पर्यावरण के प्रति सजगता और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की भावना का विस्तार करना है। यह रचनात्मक पहल समाज को यह स्पष्ट संदेश देती है कि यदि नवाचार और सही दृष्टिकोण अपनाया जाए, तो अनुपयोगी समझे जाने वाले कचरे से भी मूल्यवान और अर्थपूर्ण वस्तुएं बनाई जा सकती हैं। उत्तर रेलवे की विभिन्न इकाइयों द्वारा दिखाए गए इस समर्पण ने पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ अपशिष्ट प्रबंधन का एक अनुकरणीय उदाहरण स्थापित किया है। इसका आप पर असर रेल परिसरों में शुरू हुआ यह नवाचार अपशिष्ट प्रबंधन और पर्यावरण जागरूकता को लेकर आम लोगों के लिए भी एक सीधा संदेश देता है। • भारत में: यह पहल दर्शाती है कि सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों में रीसाइक्लिंग को प्राथमिकता देकर कचरे का बेहतर निपटान संभव है। इससे नागरिकों को भी अपने घरों और कार्यालयों में कबाड़ के पुनर्चक्रण और कचरा घटाने की व्यवहारिक प्रेरणा मिलती है। • उत्तर भारत के रेल शेड्स में: आलमबाग, लुधियाना, तुगलकाबाद और गाजियाबाद के वर्कशॉप्स में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए कार्यस्थल अधिक स्वच्छ और प्रेरणादायक बन रहे हैं। इन कलाकृतियों के जरिए परिसरों की सुंदरता बढ़ रही है और कामगारों में पर्यावरण-अनुकूल आदतों का विकास हो रहा है। • संसाधनों के पुनर्चक्रण पर: बेकार धातु को नया रूप देकर मूल्यवान कलाकृतियां बनाने से कबाड़ फेंकने की लागत और प्रदूषण में कमी आती है। यह अन्य औद्योगिक और सार्वजनिक इकाइयों के लिए भी शून्य-अपशिष्ट मॉडल अपनाने का रास्ता खोलता है। • पर्यावरण चेतना के प्रसार में: 'कबाड़ से कला' का सिद्धांत आम जनता को यह सिखाता है कि अनुपयोगी वस्तुओं को कूड़ेदान में डालने से पहले उनके पुनः उपयोग पर विचार किया जाए। इससे नगर निकायों पर अपशिष्ट प्रबंधन का दबाव कम करने में सहायता मिल सकती है। ऐसा क्यों हुआ यह पहल उत्तर रेलवे द्वारा 'स्वच्छता ही सेवा अभियान 2026' के तहत परिसरों में सफाई, अपशिष्ट प्रबंधन और जागरूकता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित की गई है। • स्वच्छता पखवाड़े का आयोजन: 'स्वच्छता ही सेवा अभियान 2026' के तहत रेलवे ने सभी इकाइयों में सफाई और पर्यावरण के अनुकूल पद्धतियों को लागू करने का लक्ष्य रखा। इसी कार्यक्रम के तहत 'कबाड़ से कला' विषय को व्यवहार में उतारा गया। • वर्कशॉप्स में कबाड़ का संचय: लोकोमोटिव और डीजल शेड्स में भारी मात्रा में अनुपयोगी धातु, नट-बोल्ट और तकनीकी कचरा जमा हो जाता है। कर्मचारियों ने इसी सामग्री के बेहतर उपयोग के लिए रचनात्मक पहल शुरू की। • पुनर्चक्रण और नवाचार को प्रोत्साहन: रेल प्रशासन का मकसद कर्मियों को सिर्फ नियमित कार्यों तक सीमित न रखकर टीम वर्क और कलात्मक सोच के माध्यम से वेस्ट मैनेजमेंट से जोड़ना था। सवाल-जवाब 1. उत्तर रेलवे के कर्मचारियों ने कबाड़ से क्या-क्या कलाकृतियां बनाई हैं? कर्मचारियों ने बेकार सामान से दरियाई घोड़ा, घड़ी, फूलदान और कई अन्य सजावटी कलाकृतियां तैयार की हैं। 2. यह कार्यक्रम किस अभियान के तहत आयोजित किया गया था? यह आयोजन 'स्वच्छता ही सेवा अभियान 2026' के तहत 'कबाड़ से जुगाड़ / कबाड़ से कला' थीम पर किया गया। 3. किन-किन रेलवे शेड्स के कर्मियों ने इसमें भाग लिया? आलमबाग डीजल शेड, लुधियाना इलेक्ट्रिक लोको शेड, तुगलकाबाद डीजल शेड और गाजियाबाद इलेक्ट्रिक लोको शेड के कर्मचारियों ने ये कलाकृतियां बनाई हैं। 4. इस पहल का मुख्य उद्देश्य क्या है? इसका मुख्य उद्देश्य रेलवे परिसरों में स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और बेकार समझी जाने वाली सामग्री के पुनः उपयोग को बढ़ावा देना है। प्रेरणा और सबक रेलवे कर्मचारियों की इस पहल से आम लोग और कामगार अपने दैनिक जीवन में कई उपयोगी सीख ले सकते हैं। • संसाधनों का सम्मान: जिस सामान को बेकार समझकर उपेक्षित छोड़ दिया जाता है, वह सही सोच से उपयोगी बन सकता है। किसी भी सामग्री को फेंकने से पहले उसके दूसरे उपयोग पर विचार करना चाहिए। • टीम भावना और रचनात्मकता: जब अलग-अलग क्षेत्रों के लोग मिलकर काम करते हैं, तो जटिल परिस्थितियों में भी सुंदर परिणाम निकलते हैं। साझा सोच से नवाचार को गति मिलती है। • पर्यावरण के प्रति व्यक्तिगत जिम्मेदारी: पर्यावरण की सुरक्षा केवल बड़े सम्मेलनों का विषय नहीं है, बल्कि यह दैनिक जीवन में कचरा प्रबंधन से शुरू होती है। https://trendkia.com/gujarat/railway-parisaron-mein-kabaad-se-saji-khoobsurat-kalakritiyan-northern-railway-ke-karmchariyon-ne-pesh-ki-rachnatmak-misaal-40474 TrendKia — Har trend, sabse pehle.