# अंबाला में 100 साल पुरानी मिट्टी की विरासत: 75 वर्षीय देवराज और उनका परिवार पीढ़ियों से संजोए हुए हैं पुश्तैनी हुनर

> अंबाला के कुम्हार मोहल्ले में रहने वाले 75 वर्षीय देवराज पिछले छह दशकों से चाक पर मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं, जहां उनके परिवार के 10 सदस्य मिलकर इस सदियों पुरानी परंपरा और कारोबार को आगे बढ़ा रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** हरियाणा · **Published:** 2026-10-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/haryana/ambala-men-100-sala-purani-mitti-ki-virasata-75-varshiya-devraj-aura-unaka-parivara-pirhiyon-se-snjoe-hue-hain-pushtaini-hunara-43431 · **Language:** Hindi
**Tags:** अंबाला, मिट्टी के बर्तन, देवराज, पुश्तैनी हुनर, हरियाणा, पारंपरिक कला

रसोई और घरों में धातु और आधुनिक बर्तनों के बढ़ते चलन के बीच हरियाणा के अंबाला शहर में एक परिवार ऐसा भी है जो अपनी एक सदी पुरानी पारंपरिक विरासत को पूरी निष्ठा के साथ संजोए हुए है। कुम्हार मोहल्ले की तंग गलियों में मिट्टी को सिर्फ एक कच्चा माल नहीं माना जाता, बल्कि यह इस कुनबे की सांस्कृतिक पहचान और आजीविका का मुख्य आधार है। 75 साल के बुजुर्ग देवराज आज भी अपने सधे हुए हाथों से चाक पर मिट्टी को तराशते हैं। उनके साथ उनके बेटे, बहुएं और पोते-पोतियां भी इस पुश्तैनी काम को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाने में जुटे हैं।

## पिता और दादा से सीखी कला को बनाया जीवन का आधार
देवराज के परिवार में मिट्टी के बर्तन और कलाकृतियां बनाने की परंपरा लगभग 100 साल पुरानी है। उनके दादा और पिता इसी काम से अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। बचपन में जब देवराज अपने पिता को गीली मिट्टी को विभिन्न रूपों में ढालते देखते थे, तब उनके मन में भी इस हुनर को सीखने की ललक पैदा हुई। धीरे-धीरे उन्होंने बारीकियों को समझा और इसी पुश्तैनी काम को अपना मुख्य पेशा बना लिया। पिछले 60 वर्षों से वह लगातार मिट्टी के उत्पाद तैयार कर रहे हैं। उम्र के 75वें पड़ाव पर पहुंचने के बावजूद जब उनके हाथ मिट्टी को छूते हैं, तो उनकी उंगलियों की कारीगरी और हुनर में वही पुरानी फुर्ती दिखाई देती है।

## घड़े से लेकर पानी के ठंडे कैंपर तक का निर्माण
देवराज मिट्टी से पारंपरिक घड़े, कढ़ाई, छोटे मंदिर, पूजा के दीये, गड़बड़े और गर्मियों में पानी रखने के लिए ठंडे कैंपर समेत कई उपयोगी सामान तैयार करते हैं। बीते दौर में जब बाजार में प्लास्टिक और स्टील के विकल्प मौजूद नहीं थे, तब इन पारंपरिक बर्तनों की भारी मांग हुआ करती थी। समय बदलने के साथ बाजारों में आधुनिक बर्तनों की भरमार हो गई, लेकिन देवराज ने अपनी कला और कारोबार से कभी मुंह नहीं मोड़ा। उनका साफ मानना है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि सच्ची लगन और मेहनत से किया गया हर काम इंसान को जीवन में आगे ले जाता है।

## पूरा कुनबा मिलकर संभालता है निर्माण और कारोबार
इस पारिवारिक व्यवसाय को जीवित रखने में देवराज के दोनों बेटे, बहुएं और अगली पीढ़ी के बच्चे कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं। परिवार के लगभग 10 सदस्य मिलकर मिट्टी तैयार करने, चाक पर बर्तन गढ़ने, उन्हें पकाने और फिर बाजार में आपूर्ति करने तक का पूरा जिम्मा संभालते हैं। देवराज के लिए सबसे बड़ा संतोष इस बात का है कि उनकी यह पैतृक कला उनके बाद खत्म नहीं होगी। वह मानते हैं कि आधुनिक जीवनशैली अपनाने के बावजूद अपनी जड़ों और पुरानी संस्कृति को बचाकर रखने की जिम्मेदारी युवा पीढ़ी पर है। इसी कारण वह आम लोगों से भी मिट्टी के बर्तनों के दैनिक इस्तेमाल की अपील करते हैं।

## पंजाब और हिमाचल तक फैली उत्पादों की पहुंच
देवराज के बेटे सुरेंद्र का कहना है कि उन्होंने अपने पारिवारिक पेशे को कभी कमतर नहीं आंका। पहले उनके दादा ने यह काम संभाला, फिर उनके पिता ने इसे पहचान दिलाई और अब वह खुद अपने बेटे के साथ मिलकर इसे आगे बढ़ा रहे हैं। जब पूरा परिवार एक साथ बैठकर काम करता है, तो इससे आपसी रिश्ता भी मजबूत रहता है और घर का खर्च भी सुचारू रूप से चलता है। सुरेंद्र बताते हैं कि उनके बनाए मिट्टी के सामान की मांग सिर्फ अंबाला तक सीमित नहीं है। पंजाब के रोपड़ और राजपुरा के अलावा हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के कई जिलों में भी उनके उत्पादों की आपूर्ति की जाती है। पुराने दिनों में उनके पिता द्वारा बनाए गए विशेष गमले कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी तक भेजे जाते थे, और कई मौकों पर परिवार के लोग खुद वहां जाकर भी मिट्टी का सामान तैयार करते थे।

## इसका आप पर असर
पारंपरिक कारीगरों के बने प्राकृतिक बर्तनों का इस्तेमाल पर्यावरण और घरेलू स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद विकल्प पेश करता है।

- **भारत में:** मिट्टी के बर्तनों का चलन प्लास्टिक और कृत्रिम बर्तनों पर निर्भरता कम करने में मदद करता है। दैनिक जीवन में इनका उपयोग बढ़ाने से देश भर के पारंपरिक शिल्पकारों और ग्रामीण कारीगरों को नियमित आजीविका मिलती है।
- **अंबाला में:** स्थानीय कुम्हारों से सीधे बर्तन खरीदने से क्षेत्रीय कुटीर उद्योग को आर्थिक मजबूती मिलती है। अंबाला, रोपड़ और नजदीकी क्षेत्रों के निवासियों को बिना किसी बिचौलिये के उचित दामों पर शुद्ध हस्तनिर्मित उत्पाद उपलब्ध हो जाते हैं।
- **घरेलू सेहत पर असर:** मिट्टी के घड़ों और कैंपर में प्राकृतिक रूप से ठंडा पानी पीना स्वास्थ्य के लिहाज से सुरक्षित माना जाता है। इससे रेफ्रिजरेटर पर बिजली की निर्भरता घटती है और प्राकृतिक खनिज युक्त जल प्राप्त होता है।
- **पारंपरिक विरासत का संरक्षण:** नई पीढ़ी के सहयोग से चलने वाले ऐसे घरेलू उद्यम हमारी सांस्कृतिक जड़ों को बचाए रखते हैं। जब युवा इन पेशों से जुड़ते हैं, तो पुश्तैनी कलाएं शहरों से विलुप्त होने से बच जाती हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
अंबाला के इस परिवार ने आधुनिक बर्तनों के दौर में भी अपनी सौ साल पुरानी कला को इसलिए बचाए रखा क्योंकि उन्होंने सामूहिक परिवार प्रणाली और उत्पाद नवाचार को अपना मुख्य आधार बनाया।

- **पारिवारिक एकता और सामूहिक श्रम:** परिवार के 10 सदस्यों ने काम को अलग-अलग स्तरों पर बांटकर उत्पादन लागत और समय को नियंत्रित रखा। मिलकर काम करने की इसी पद्धति ने इस काम को आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाए रखा।
- **समय के अनुरूप उत्पादों में विविधता:** केवल पारंपरिक घड़ों तक सीमित न रहकर कारीगरों ने पूजा मंदिर, सजावटी गड़बड़े और आधुनिक जरूरत के हिसाब से मिट्टी के कैंपर तैयार किए। इस विविधता ने आधुनिक दौर में भी ग्राहकों की जरूरत को पूरा किया।
- **अंतरराज्यीय आपूर्ति नेटवर्क:** परिवार ने अपने उत्पादों की बिक्री सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं रखी। हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के बाजारों तक माल पहुंचाने से उनके पास लगातार काम और आय बनी रही।
- **पुश्तैनी हुनर के प्रति स्वाभिमान:** परिवार के सदस्यों ने इस शिल्प को कभी छोटा नहीं माना बल्कि इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान समझा। बुजुर्गों से सीखे हुनर को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के संकल्प ने इस कारोबार को सौ साल तक जिंदा रखा।

## सवाल-जवाब

### 1. अंबाला के देवराज कौन हैं और वह क्या काम करते हैं?
देवराज अंबाला के कुम्हार मोहल्ले के 75 वर्षीय शिल्पकार हैं, जो पिछले 60 वर्षों से अपने पुश्तैनी हुनर के तहत मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं।

### 2. देवराज के परिवार में मिट्टी के बर्तन बनाने का काम कितने सालों से चल रहा है?
उनके परिवार में मिट्टी के बर्तन बनाने की यह परंपरा करीब 100 साल पुरानी है, जिसे उनके दादा और पिता ने शुरू किया था।

### 3. देवराज और उनका परिवार मिट्टी से कौन-कौन सी चीजें तैयार करते हैं?
वे मिट्टी से पारंपरिक घड़े, कढ़ाई, पूजा के मंदिर, दीये, गड़बड़े और पानी ठंडा रखने वाले कैंपर तैयार करते हैं।

### 4. इस काम में परिवार के कितने सदस्य शामिल हैं?
देवराज के दोनों बेटे, बहुएं और पोते-पोतियां मिलाकर परिवार के करीब 10 सदस्य इस काम को संभालते हैं।

### 5. उनके बनाए मिट्टी के बर्तनों की आपूर्ति किन-किन राज्यों में होती है?
उनके सामान की आपूर्ति हरियाणा के विभिन्न जिलों के अलावा पंजाब के रोपड़ और राजपुरा तथा हिमाचल प्रदेश के कई इलाकों में होती है।

### 6. कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से देवराज के परिवार का क्या संबंध रहा है?
पुराने समय में देवराज के पिता द्वारा बनाए गए गमले कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी तक भेजे जाते थे और परिवार के सदस्य वहां जाकर भी मिट्टी का सामान तैयार करते थे।

## प्रेरणा और सबक
अंबाला के देवराज और उनके परिवार की कहानी सिखाती है कि मेहनत, पारिवारिक सहयोग और अपनी जड़ों से जुड़ाव किसी भी काम को गरिमा और स्थायित्व दे सकता है।

- **काम की गरिमा का सम्मान:** कोई भी व्यवसाय छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि काम के प्रति समर्पण ही उसे समाज में सम्मान दिलाता है। अपने हुनर पर गर्व करने से व्यक्ति हर दौर में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है।
- **पारिवारिक एकजुटता की शक्ति:** जब परिवार के सदस्य एक साथ मिलकर किसी साझा काम में हाथ बंटाते हैं, तो बड़ी से बड़ी व्यावसायिक चुनौतियां आसान हो जाती हैं। सामूहिक प्रयास से परिवार का आपसी रिश्ता और आमदनी दोनों सुरक्षित रहते हैं।
- **विरासत और जड़ों का संरक्षण:** आधुनिक बदलावों के बीच अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और पुश्तैनी हुनर को छोड़ना जरूरी नहीं होता। पुरानी कला को अगली पीढ़ी को सौंपना समाज की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
- **बदलाव के दौर में निरंतरता:** बाजार में प्लास्टिक और धातुओं के आने के बाद भी लगातार 60 साल तक चाक पर डटे रहना यह साबित करता है कि धैर्य और निरंतरता ही किसी भी उद्यम की असली ताकत है।

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