अंबाला शहर को नाम देने वाले 300 साल पुराने मां अंबिका देवी मंदिर में नवरात्रि पर उमड़ी भक्तों की भारी भीड़ अंबाला की ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा 300 साल से अधिक पुराना मां अंबिका देवी मंदिर शारदीय नवरात्रि पर आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है, जहां कोलकाता के फूलों और मेवों से देवी का विशेष श्रृंगार किया जा रहा है। शक्ति उपासना के पावन पर्व शारदीय नवरात्रि की शुरुआत के साथ ही धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया है। हरियाणा के अंबाला में स्थित ऐतिहासिक मां अंबिका देवी मंदिर में तड़के से ही भक्तों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं। यह पावन धाम केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि अंबाला के अस्तित्व और उसकी सदियों पुरानी पहचान से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। प्रचलित स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस पूरे शहर का नामकरण ही मां अंबा देवी के पावन नाम पर हुआ था। यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान इस पावन धाम के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को कई गुना बढ़ा देती है। शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, नवरात्रि की पूरी अवधि में नौ दिनों तक मां भगवती की आराधना करने से परिवार में सुख, शांति तथा आर्थिक संपन्नता का वास होता है। इसी अटूट विश्वास के सहारे श्रद्धालु बड़ी संख्या में मां अंबिका देवी के चरणों में शीश नवाने पहुंच रहे हैं। नवरात्रि के इस महापर्व के सुचारू संचालन के लिए मंदिर प्रबंधन की ओर से विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। 300 वर्ष से अधिक प्राचीन स्थापत्य और दीवारों पर उकेरी कलाकृतियां मां अंबिका देवी का यह पावन धाम 300 साल से भी अधिक पुराना बताया जाता है। समय के कई थपेड़े सहने के बाद भी यह स्थल अपने ऐतिहासिक वैभव को संजोए हुए है। मंदिर की छत और दीवारों पर उकेरी गई खूबसूरत पेंटिंग तथा प्राचीन वास्तुकला आज भी बीते जमाने की भव्य कलात्मकता की गवाही देती है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को पूजा-अर्चना के साथ-साथ क्षेत्र की समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को करीब से देखने का अवसर मिलता है। मंदिर में देवी की पूजा किसी साधारण प्रतिमा के बजाय अत्यंत पावन पिंडी स्वरूप में की जाती है। यह पावन पिंडी मंदिर के गर्भगृह में प्राचीन काल से ही विराजमान है और भक्तजन इसी स्वरूप के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं। कोलकाता से आए सुगंधित पुष्प और मेवों से भव्य श्रृंगार नवरात्रि के पावन अवसर पर माता रानी के दरबार को भव्य रूप से सजाया गया है। माता रानी के दैनिक अलौकिक श्रृंगार के लिए विशेष रूप से कोलकाता से ताजे सुगंधित फूल मंगवाए गए हैं। नवरात्रि के सभी नौ दिनों तक मां अंबिका देवी का प्रतिदिन एक नए और अनूठे स्वरूप में दिव्य श्रृंगार संपन्न किया जाएगा। फूलों के अलावा संध्या आरती के समय मेवों से माता रानी का विशेष श्रृंगार करने की एक अनूठी परंपरा निभाई जाती है। इस विशेष श्रृंगार के संपन्न होने के बाद इन सभी मेवों को एकत्र कर दर्शन करने आए भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में वितरित कर दिया जाता है। इस दिव्य श्रृंगार और पवित्र प्रसाद को प्राप्त करने के लिए श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है। दुर्गम राक्षस के वध की पौराणिक कथा और शहर की उत्पत्ति मां अंबिका देवी को साक्षात आदिशक्ति का पावन स्वरूप माना जाता है। पौराणिक आख्यानों के मुताबिक, प्राचीन काल में जब दुर्गम नामक क्रूर राक्षस का आतंक बढ़ गया था, तब देवी ने उसका वध कर तीनों लोकों को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। दुर्गम का वध करने के कारण ही उन्हें मां दुर्गा के रूप में भी पूज्य स्थान प्राप्त हुआ। धार्मिक मान्यताओं में यह तथ्य भी स्थापित है कि इस पावन मंदिर का अस्तित्व अंबाला शहर की विधिवत बसावट से भी पहले का है। शहर की समूची पहचान और इसका नाम मां अंबा देवी की इसी पावन धरा से उपजा है। इस कारण मंदिर की ऐतिहासिक बनावट और इसकी आध्यात्मिक जड़ें पूरे शहर के गौरव का प्रतीक मानी जाती हैं। पीढ़ियों पुराना जुड़ाव और दूर-दराज से पहुंचते श्रद्धालु इस दरबार से जुड़े भक्तों की निष्ठा पीढ़ियों पुरानी है। दर्शन करने पहुंचे श्रद्धालु अमरनाथ ने साझा किया कि उनका इस दरबार से लगभग 50 वर्ष पुराना अटूट रिश्ता है। वह अपने बचपन के दिनों से ही यहां निरंतर आ रहे हैं, और उनसे पहले उनके माता-पिता तथा पूर्वज भी इसी मंदिर में नियमित हाजिरी लगाते थे। उन्होंने संकल्प लिया है कि वह नवरात्रि के सभी नौ दिनों तक सुबह और शाम दोनों समय मां के पावन दर्शन करने उपस्थित रहेंगे। वहीं अंबाला शहर के मॉडल टाउन इलाके के रहने वाले अमित कुमार ने बताया कि मां अंबिका देवी के प्रति उनकी गहरी आस्था है। वह अपने मन की मुरादें लेकर मां के चरणों में आए हैं और मंदिर में शीश नवाने के बाद वह अपने घर पर विधि-विधान से मां शेरावाली के पवित्र कलश की स्थापना करेंगे। मां अंबिका देवी के प्रति आस्था केवल अंबाला तक ही सीमित नहीं है। नवरात्रि के इस शुभ अवसर पर पड़ोसी राज्यों पंजाब तथा हिमाचल प्रदेश के विभिन्न जिलों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शनों के लिए पहुंच रहे हैं। श्रद्धालुओं का यह भारी जमावड़ा दर्शाता है कि आधुनिकता के इस दौर में भी लोगों का अपनी आध्यात्मिक जड़ों और ऐतिहासिक संस्कृति के प्रति समर्पण पूरी तरह अडिग है। इसका आप पर असर शारदीय नवरात्रि के दौरान मां अंबिका देवी मंदिर में उमड़ रही श्रद्धालुओं की भीड़ शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को गति दे रही है। • हरियाणा में: अंबाला के ऐतिहासिक स्थल पर राज्य भर से आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए दर्शन और कतार प्रबंधन की विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। मंदिर परिसर के आसपास सुरक्षा और यातायात सुचारू रखने के लिए स्थानीय प्रशासन सतर्क नजर आ रहा है। • अंबाला में: शहर के मुख्य बाजार और मॉडल टाउन सहित आसपास के इलाकों में पूजा सामग्री, फूलों और फलाहार की मांग में भारी इजाफा देखा जा रहा है। सुबह और शाम की विशेष आरती के समय मंदिर मार्ग पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने से स्थानीय यातायात पर असर पड़ रहा है। • श्रद्धालुओं के लिए: शाम की विशेष आरती में शामिल होने वाले भक्तों को मेवों से सजे अनूठे श्रृंगार के दर्शन के साथ प्रसाद प्राप्त करने का अवसर मिल रहा है। नवरात्रि के नौ दिनों तक प्रतिदिन अलग-अलग फूलों से होने वाले श्रृंगार को देखने के लिए समय पर पहुंचना आवश्यक है। • पड़ोसी राज्यों के यात्रियों के लिए: पंजाब और हिमाचल प्रदेश से निजी वाहनों अथवा बसों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर तक पहुंचना आसान है। भारी भीड़ को देखते हुए बाहरी जिलों से आने वाले भक्तों को सुबह के समय दर्शन करने की योजना बनानी चाहिए। ऐसा क्यों हुआ अंबाला के मां अंबिका देवी मंदिर में नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटने के पीछे शहर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और धार्मिक मान्यताएं प्रमुख कारण हैं। • शहर का नामकरण: लोक मान्यताओं के अनुसार अंबाला शहर का नाम ही मां अंबा देवी के पावन नाम पर रखा गया था। इस ऐतिहासिक पहचान के कारण स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर उनके शहर की सांस्कृतिक जड़ माना जाता है। • प्राचीन पौराणिक कथा: धार्मिक मान्यता के अनुसार आदिशक्ति ने इसी धरा पर दुर्गम नामक राक्षस का संहार किया था, जिसके उपरांत उन्हें मां दुर्गा के रूप में प्रतिष्ठा मिली। इस विजय गाथा के चलते नवरात्रि में यहां पूजा का विशेष महत्व माना गया है। • प्राचीन स्थापत्य और पिंडी पूजन: 300 वर्ष से अधिक पुरानी इस इमारत में मां दुर्गा की पारंपरिक मूर्ति के स्थान पर प्राचीन पिंडी की पूजा होती है। सदियों पुरानी वास्तुकला और दीवारों पर बनी कलाकृतियां श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। • विशेष श्रृंगार की परंपरा: नवरात्रि के दिनों में कोलकाता के विशेष फूलों और शाम को मेवों से देवी के अलौकिक श्रृंगार की अनूठी व्यवस्था भक्तों में विशेष कौतूहल और श्रद्धा जगाती है। सवाल-जवाब 1. मां अंबिका देवी मंदिर का अंबाला शहर से क्या ऐतिहासिक संबंध है? स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अंबाला शहर का नामकरण मां अंबा देवी के नाम पर ही हुआ था और यह मंदिर शहर की स्थापना से भी पुराना माना जाता है। 2. यह मंदिर कितना पुराना बताया जाता है? मां अंबिका देवी का यह ऐतिहासिक मंदिर 300 साल से भी अधिक पुराना बताया जाता है। 3. मंदिर में माता रानी का श्रृंगार किन विशेष सामग्रियों से किया जा रहा है? माता के श्रृंगार के लिए कोलकाता से विशेष फूल मंगवाए गए हैं और शाम के समय मेवों से भी अलौकिक श्रृंगार किया जाता है। 4. शाम के श्रृंगार के बाद मेवों का क्या किया जाता है? शाम की आरती और श्रृंगार संपन्न होने के बाद उन मेवों को एकत्र कर श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में बांट दिया जाता है। 5. मां अंबिका देवी से जुड़ी मुख्य पौराणिक मान्यता क्या है? धार्मिक मान्यता है कि मां ने प्राचीन काल में दुर्गम नामक दैत्य का वध किया था, जिसके बाद उन्हें मां दुर्गा के स्वरूप में पूजा जाने लगा। 6. मंदिर के गर्भगृह में देवी की किस रूप में पूजा होती है? मंदिर में मां अंबा देवी की पूजा किसी मूर्ति के बजाय उनकी प्राचीन पिंडी के स्वरूप में की जाती है। 7. अंबाला के अलावा और कहां-कहां से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं? हरियाणा के अलावा पंजाब और हिमाचल प्रदेश के विभिन्न जिलों से भी श्रद्धालु नवरात्रि पर दर्शन के लिए यहां आते हैं। https://trendkia.com/haryana/ambala-shahara-ko-nama-dene-vale-300-sala-purane-man-ambika-devi-mndira-men-navratri-para-umari-bhakton-ki-bhari-bhira-46224 TrendKia — Har trend, sabse pehle.