अटाली गांव के कर्मवीर ने खुद नशा छोड़ हजारों को नई जिंदगी दी हरियाणा रोडवेज के पूर्व ड्राइवर कर्मवीर ने 2001 में नशा त्यागने के बाद पिछले 25 वर्षों में बिना किसी दवा या फीस के हजारों लोगों को व्यसनमुक्त करने का संकल्प पूरा किया है। नशे की लत किसी भी हंसते-खेलते परिवार को तिनके की तरह बिखेर देती है। जो व्यक्ति एक बार इस दलदल में कदम रख देता है, उसके लिए वापस लौटना बेहद कठिन हो जाता है। हरियाणा के फरीदाबाद जिले में स्थित अटाली गांव के निवासी कर्मवीर की दास्तान भी कुछ ऐसी ही अंधेरी राहों से शुरू होकर उजालों तक पहुंची है। कर्मवीर पांच भाई थे और विडंबना यह थी कि पांचों ही गंभीर व्यसन की चपेट में फंस चुके थे। अत्यधिक नशे की वजह से उनके एक भाई की असमय जान चली गई थी। उस वक्त कर्मवीर हरियाणा रोडवेज में ड्राइवर के पद पर कार्यरत थे। साल 2001 में उनके जीवन में एक ऐसी घटना घटी, जिसने उनके जीने का नजरिया पूरी तरह बदल दिया। एक मंदिर में जाकर उन्होंने अचानक शराब और नशे को सदा के लिए अलविदा कहने की प्रतिज्ञा ली और फिर वही कर्मवीर समाज के लिए प्रेरणा बन गए। संकट से भरा पारिवारिक अतीत और आत्ममंथन कर्मवीर के जीवन का शुरुआती दौर भारी उथल-पुथल से भरा हुआ था। उनके आसपास दोस्त, रिश्तेदार और खुद के भाई नशे की दलदल में गहरे धंसे थे। परिवार के सदस्यों को आर्थिक और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ती थी, साथ ही समाज में आए दिन अपमानित होना पड़ता था। कर्मवीर खुद नशे में चूर रहते थे, जिसके कारण उनका अपना परिवार भी गंभीर संकट से गुजर रहा था। कई मर्तबा वे सड़क हादसों में बाल-बाल बचे थे। बार-बार जान जोखिम में पड़ने के बाद उनके मन में यह विचार कौंधा कि जिस बुराई ने उनके पूरे घर-परिवार को तहस-नहस किया है, अब उसी बुराई को जड़ से खत्म करने का वक्त आ गया है। इसी अंतर्द्वंद्व के बीच उन्होंने फैसला किया कि वे लोगों को व्यसन से मुक्त कराएंगे। उनका संकल्प था कि वे एक ऐसा नशा मुक्ति केंद्र शुरू करेंगे, जहां किसी से एक पैसा फीस नहीं ली जाएगी और न ही किसी तरह की दवा का इस्तेमाल होगा। उन्होंने इस सामाजिक सुधार अभियान की नींव अपने गांव के मंदिरों से रखी। चूंकि वे हरियाणा रोडवेज में सरकारी चालक थे, इसलिए उन्होंने अपने कार्यस्थल और सरकारी बसों को भी जागरूकता का जरिया बना लिया। वे बस चलाने के दौरान और यात्रियों से मिलते वक्त भी लोगों को नशे के जानलेवा दुष्प्रभावों के बारे में सचेत करते रहते थे। 15 अगस्त 2001 की वह रात जिसने बदली राह कर्मवीर के जीवन में बदलाव की ऐतिहासिक तारीख 15 अगस्त 2001 थी। उस समय उनकी उम्र 38 साल थी। वे रातभर सरकारी बस चलाने की ड्यूटी करके लौटे थे और दिन में उन्होंने बहुत ज्यादा शराब पी ली थी। अत्यधिक शराब पीने के बाद अचानक उन्हें भीतर से यह अहसास हुआ कि अगर उन्होंने अब भी खुद को नहीं रोका, तो आगे सिर्फ मौत खड़ी है। उसी नाजुक घड़ी में वे लाल दास बाबा के मंदिर पहुंचे। मंदिर में जाकर उन्होंने पूरी श्रद्धा से शीश नवाया और मन ही मन प्रार्थना की कि बाबा पहले उनका अपना नशा छुड़वा दें, उसके बाद वे बाकी लोगों को भी इस बुराई से उबारने के लिए जीवन समर्पित कर देंगे। उस दौर में उनके घर के हालात बेहद दर्दनाक थे। पांचों भाइयों के नशे में रहने की वजह से तीन भाइयों का मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका था। उनका एक भाई बहुत अच्छा गायक था और पूरे क्षेत्र में अपने गायन के लिए मशहूर था, मगर दुर्भाग्यवश वह भी नशे की गिरफ्त में फंस चुका था। कर्मवीर ने जब खुद नशा छोड़ दिया, तो वे लोगों को समझाने लगे कि बीड़ी, सिगरेट और तंबाकू के सेवन से कैंसर जैसी असाध्य बीमारियां जन्म लेती हैं। उनकी भावनात्मक बातचीत का ऐसा असर होता था कि लोग रास्ते में ही अपनी जेब से बीड़ी के बंडल निकालकर उनके हाथ में थमा देते थे और भविष्य में कभी नशा न करने का वचन देते थे। कर्मवीर साल 2021 में हरियाणा रोडवेज की सेवा से सेवानिवृत्त हुए। मां की स्मृति, ईश्वर से पुकार और भाइयों की वापसी नशे के भारी प्रकोप के चलते उनके एक भाई की मृत्यु हो गई थी। इस दुखद हादसे ने कर्मवीर को झकझोर कर रख दिया। उनकी मां रामवती का देहांत पहले ही हो चुका था। कर्मवीर के मन में लगातार यह कचोट रहती थी कि समाज उनकी दिवंगत मां के बारे में क्या कहेगा कि उनके पांच बेटे हुए और पांचों ही नशे की भेंट चढ़ गए। इस गहरे दर्द के बीच उन्होंने ऊपरवाले से गुहार लगाई कि हे भगवान, कम से कम पांच में से किसी एक बेटे को तो बचा लो ताकि मां का नाम कलंकित होने से बच जाए। ईश्वर ने उनकी पुकार सुनी और उनके तीन भाइयों ने कर्मवीर की सीख को आत्मसात कर लिया। आज जीवित चारों भाई पूरी तरह से नशा मुक्त होकर सम्मानित जीवन जी रहे हैं। जिस गांव के मंदिर परिसर में पहले लोग नशा करके डेरा डाले रहते थे, कर्मवीर की लगातार कोशिशों से आज वही परिसर पूरी तरह व्यसनमुक्त हो चुका है। पिछले 25 वर्षों में उन्होंने हजारों व्यक्तियों को नशे की दलदल से बाहर निकालने में सफलता पाई है। उन्होंने नशा मुक्ति पर पुस्तकें भी लिखी हैं और आज भी वे स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक चौराहों पर जाकर युवाओं को जागरूक करते हैं। 65 वर्ष की आयु में भी निरंतर जारी है मुहिम वर्तमान में कर्मवीर 65 वर्ष के हो चुके हैं, लेकिन उनका सेवा भाव पहले जैसा ही अटूट है। वे मानते हैं कि नशे के प्रसार में बुरी संगत की सबसे बड़ी भूमिका होती है। व्यक्ति जिस तरह के माहौल और संगति में समय बिताता है, उसका प्रत्यक्ष असर उसके चरित्र और दिनचर्या पर पड़ता है। उन्होंने अपने जीवन में नशे की विभीषिका को बहुत करीब से महसूस किया है। उन्होंने अपने पूरे कुनबे को बिखरते देखा और पड़ोसियों को उजड़ते देखा। इसी दर्द ने उन्हें यह मिशन सौंपा है कि जिस विपत्ति ने उनके अपने घर को उजाड़ा, वह किसी अन्य निर्दोष परिवार की खुशियां न छीन सके। इसका आप पर असर यह पहल दर्शाती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और सही समझाइश से बिना किसी महंगे इलाज के भी गंभीर नशे की लत से छुटकारा पाया जा सकता है। • भारत में: देशभर में परिवारों को यह भरोसा मिलता है कि पारिवारिक सहयोग और सामाजिक संवाद से व्यसन पीड़ितों को सामान्य जीवन में वापस लाया जा सकता है। यह मॉडल महंगे नशा मुक्ति केंद्रों के विकल्प के रूप में सामुदायिक स्तर पर जागरूकता फैलाने की राह दिखाता है। • फरीदाबाद में: स्थानीय युवाओं और ग्रामीणों को सीधे अटाली गांव के इस जमीनी प्रयास से जुड़कर व्यसन त्यागने का व्यावहारिक मंच मिलता है। स्कूल, कॉलेज और सार्वजनिक स्थानों पर चलने वाले इस अभियान से स्थानीय स्तर पर तंबाकू और शराब की लत पर प्रभावी रोक लग रही है। • परिवारों के लिए: नशे से पीड़ित सदस्यों वाले परिवारों को यह संदेश मिलता है कि संवाद और निरंतर निगरानी से बिगड़े हालात सुधारे जा सकते हैं। इससे घरेलू हिंसा, असमय मौतों और आर्थिक बर्बादी को रोकने में सीधी मदद मिलती है। • युवाओं के लिए: सार्वजनिक परिसरों और शैक्षणिक संस्थानों में दी जाने वाली जानकारी से युवा बुरी संगति और बीड़ी-तंबाकू जैसी आदतों से समय रहते बच सकते हैं। इससे उन्हें कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से सुरक्षित रहने की स्पष्ट प्रेरणा मिलती है। ऐसा क्यों हुआ पारिवारिक बर्बादी, अपनों के खोने के दर्द और खुद की जान पर बार-बार आए संकट ने इस बदलाव को जन्म दिया। • व्यक्तिगत आत्मबोध: 15 अगस्त 2001 को अत्यधिक शराब पीने के बाद कर्मवीर को अहसास हुआ कि यह रास्ता सीधा मौत की ओर ले जा रहा है। बार-बार सड़क हादसों में बचने के बाद उन्होंने उसी क्षण व्यसन छोड़ने का कड़ा फैसला किया। • पारिवारिक त्रासदी: पांचों भाइयों के नशे में रहने की वजह से तीन भाइयों का मानसिक संतुलन बिगड़ चुका था और एक भाई की जान चली गई थी। अपनी दिवंगत मां रामवती के सम्मान को बचाने और परिवार को पूरी तरह नष्ट होने से रोकने की तड़प ने उन्हें प्रेरित किया। • सामाजिक जिम्मेदारी का भाव: कर्मवीर ने देखा कि उनके गांव का मंदिर परिसर और आसपास के युवा बुरी संगत के चलते नशे में बर्बाद हो रहे थे। इसी दर्द से उबरने के बाद उन्होंने बिना किसी फीस या दवा के दूसरों को बचाने का बीड़ा उठाया। सवाल-जवाब 1. कर्मवीर कौन हैं और वे कहां के निवासी हैं? कर्मवीर हरियाणा के फरीदाबाद जिले के अटाली गांव के रहने वाले हैं और हरियाणा रोडवेज से सेवानिवृत्त ड्राइवर हैं। 2. कर्मवीर ने नशा छोड़ने का फैसला कब और क्यों लिया? उन्होंने 15 अगस्त 2001 को 38 वर्ष की उम्र में लाल दास बाबा के मंदिर जाकर फैसला लिया, जब उन्हें अहसास हुआ कि अत्यधिक शराब उनकी जान ले सकती है। 3. कर्मवीर के परिवार पर नशे का क्या असर पड़ा था? उनके पांचों भाई नशे की गिरफ्त में थे, जिसमें तीन का मानसिक संतुलन बिगड़ गया था और एक भाई की नशे के कारण मृत्यु हो गई थी। 4. कर्मवीर लोगों का नशा छुड़ाने के लिए क्या तरीका अपनाते हैं? वे बिना किसी दवा और बिना किसी फीस के समझाइश, काउंसलिंग और जागरूकता के जरिए लोगों का नशा छुड़ाते हैं। 5. कर्मवीर अब तक कितने लोगों को व्यसनमुक्त कर चुके हैं? वे पिछले 25 वर्षों में अपने गांव और आसपास के क्षेत्रों के हजारों लोगों को नशे से दूर कर चुके हैं। 6. कर्मवीर हरियाणा रोडवेज से कब रिटायर हुए? कर्मवीर साल 2021 में हरियाणा रोडवेज की चालक सेवा से सेवानिवृत्त हुए। प्रेरणा और सबक कर्मवीर का जीवन सिखाता है कि पुरानी गलतियों को सुधारकर समाज के लिए एक मिसाल कैसे बना जा सकता है। • दृढ़ संकल्प की शक्ति: 38 साल की उम्र में गंभीर लत के बावजूद एक ही झटके में शराब छोड़ना साबित करता है कि इच्छाशक्ति हर बुराई से बड़ी है। • निःस्वार्थ समाज सेवा: बिना किसी सरकारी अनुदान, दवा या फीस के पिछले 25 वर्षों से लगातार लोगों को व्यसनमुक्त करना निस्वार्थ सेवा का दुर्लभ उदाहरण है। • कार्यस्थल को मंच बनाना: हरियाणा रोडवेज में बस चलाते हुए यात्रियों को जागरूक करना दिखाता है कि नेक काम के लिए किसी विशेष साधन या पद की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। • पारिवारिक उत्तरदायित्व: खुद संभलने के बाद अपने तीनों भाइयों को नशे से बाहर निकालना पारिवारिक जिम्मेदारी का उत्कृष्ट प्रमाण है। https://trendkia.com/haryana/atali-ganva-ke-karamveer-ne-khuda-nasha-chhora-hajaron-ko-nai-jindagi-di-36379 TrendKia — Har trend, sabse pehle.