बाघ और भेड़ियों के बच्चों का वह अनोखा खेल, जिसने रखी हरियाणा में अग्रोहा धाम की ऐतिहासिक नींव हरियाणा के हिसार में स्थित अग्रोहा धाम मां महालक्ष्मी और महाराजा अग्रसेन की पावन गाथा को समेटे हुए है, जहां प्राकृतिक सद्भाव के संकेत से एक समृद्ध नगरी की स्थापना हुई थी। दीपावली और धनतेरस का पर्व आते ही देशभर के प्रमुख देवी मंदिरों में मां महालक्ष्मी की उपासना की विशेष तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इस वर्ष 6 नवंबर दिन शुक्रवार को धनतेरस और 8 नवंबर दिन रविवार को दिवाली का पावन पर्व मनाया जाएगा। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु अपने परिवार की उन्नति, ऐश्वर्य और शांति की कामना लेकर पवित्र तीर्थों में नमन करने पहुंचते हैं। भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थापित महालक्ष्मी मंदिरों में हरियाणा के हिसार जिले में मौजूद अग्रोहा धाम का स्थान बेहद अनूठा है। यह पावन तीर्थ केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध महाराजा अग्रसेन और अग्रवाल समुदाय की ऐतिहासिक व सांस्कृतिक जड़ों से गहराई से जुड़ा हुआ है। प्रकृति का वह शुभ संकेत और एक नए राज्य का उदय प्राचीन लोकमान्यताओं के मुताबिक, महाराजा अग्रसेन मां महालक्ष्मी की कृपा से एक नए और आदर्श राज्य की आधारशिला रखना चाहते थे। अपनी इसी महत्वाकांक्षा को साकार करने के उद्देश्य से वह अपनी धर्मपत्नी रानी माधवी के साथ एक उपयुक्त भौगोलिक क्षेत्र की खोज में भ्रमण पर निकले। यात्रा के दौरान इस युगल ने एक ऐसा असाधारण दृश्य देखा जिसने उनके निर्णय पर अंतिम मुहर लगा दी। महाराजा अग्रसेन और रानी माधवी ने देखा कि एक खुले स्थान पर बाघ के नन्हे शावक और भेड़ियों के बच्चे किसी भी प्रकार की आपसी शत्रुता भुलाकर सहज रूप से एक साथ खेल रहे थे। हिंसक वन्यजीवों के बच्चों के बीच इस दुर्लभ प्राकृतिक सद्भाव और निडरता को दोनों ने ईश्वरीय संकेत माना। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि यह शूरवीरों और वीरों की तपोभूमि है, जहां शांति, सामंजस्य और पुरुषार्थ के दम पर एक अत्यंत वैभवशाली राज्य का निर्माण संभव है। इसी दृढ़ विश्वास के साथ उन्होंने उस भूभाग पर अग्रोहा नगरी की नींव रखी, जो आगे चलकर कृषि उपज और संगठित व्यापार के एक अग्रणी केंद्र के रूप में पुष्पित-पल्लवित हुई। बीसवीं सदी का पुनर्जागरण और 1908 का अग्रवाल दरबार ऐतिहासिक कालखंड में उथल-पुथल के कारण अग्रोहा का पुराना वैभव और राजनीतिक महत्व धीरे-धीरे समय के चक्र में धुंधला पड़ने लगा था। इसके बावजूद इस पवित्र भूमि को दोबारा उसका खोया गौरव लौटाने के सामूहिक प्रयास समय-समय पर होते रहे। इस दिशा में निर्णायक मोड़ 20वीं सदी की शुरुआत में आया, जब साल 1907 में ब्रह्मानंद ब्रह्मचारी नामक एक तपस्वी इस स्थान पर पहुंचे। ब्रह्मानंद ब्रह्मचारी ने अग्रवाल समाज के प्रमुख लोगों को इस धरोहर के कायाकल्प और सामाजिक विकास के लिए संगठित होने की प्रेरणा दी। इस आध्यात्मिक प्रेरणा के परिणामस्वरूप साल 1908 में अग्रवाल दरबार नाम से एक औपचारिक संगठन की स्थापना की गई। इस संगठन के माध्यम से अग्रोहा में गौशाला, देवाधिदेव शिव का मंदिर और 18 सती तीर्थों का निर्माण करवाकर इस पावन भूमि को पुनः एक सक्रिय सांस्कृतिक केंद्र का स्वरूप दिया गया। 1976 का संकल्प और तीन भव्य देव खंडों का निर्माण आधुनिक अग्रोहा धाम के वर्तमान स्वरूप की रूपरेखा 1970 के दशक में तैयार हुई। साल 1976 में आयोजित अखिल भारतीय अग्रवाल प्रतिनिधियों के सम्मेलन में इस पावन स्थल के भव्य पुनर्निर्माण का ऐतिहासिक फैसला लिया गया। इस वृहद परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए अग्रोहा विकास ट्रस्ट का गठन किया गया और उसी साल 1976 में निर्माण कार्य की शुरुआत कर दी गई। सतत प्रयासों के उपरांत साल 1984 में अग्रोहा धाम का मुख्य मंदिर बनकर पूरी तरह तैयार हुआ, जिसके बाद परिसर में अन्य आध्यात्मिक संरचनाओं और तीर्थयात्रियों की सुविधाओं का निरंतर विस्तार किया गया। वर्तमान धाम की मंदिर संरचना तीन प्रमुख हिस्सों में बंटी हुई है। गर्भगृह के बीच वाले प्रमुख भाग में धन-धान्य की अधिष्ठात्री मां महालक्ष्मी विराजमान हैं। मंदिर के पश्चिमी भाग में विद्या और बुद्धि की देवी मां सरस्वती की प्रतिष्ठा है, जबकि पूर्वी खंड महाराजा अग्रसेन की स्मृति और पूजन को समर्पित है। इस प्रकार यहां आने वाले भक्तगण एक ही स्थान पर समृद्धि, ज्ञान और आदर्श नेतृत्व तीनों के दिव्य आशीष प्राप्त करते हैं। 41 पवित्र नदियों का शक्ति सरोवर और विशाल आध्यात्मिक आकर्षण अग्रोहा धाम का परिसर केवल पूजा स्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सनातन स्थापत्य और पौराणिक कला का एक विस्तृत केंद्र है। मुख्य मंदिर के ठीक पीछे शक्ति सरोवर नामक एक विशाल तालाब स्थापित है। इस सरोवर का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि साल 1988 में इसे देश की 41 विभिन्न पवित्र नदियों के संगम जल से भरा गया था। इस सरोवर के उत्तर-पश्चिमी किनारे पर देव-दानव समुद्र मंथन के पावन प्रसंग की अत्यंत जीवंत झांकी उकेरी गई है। इसके साथ ही परिसर में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन चरित्र की लीलाएं, गजमुक्तेश्वर प्रसंग और कई प्रमुख धार्मिक कथाओं को कलाकृतियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। श्रद्धालुओं के लिए धरातल से करीब 15 फीट की गहराई में मां वैष्णो देवी की पवित्र गुफा का प्रामाणिक अनुभव तैयार किया गया है। मंदिर प्रांगण में तिरुपति बालाजी, भैरवनाथ, बाबा अमरनाथ और पवनपुत्र हनुमान जी के पावन विग्रह भी स्थापित हैं। आकाश को छूती हनुमान जी की करीब 90 फीट ऊंची प्रतिमा दूर से ही भक्तों को आकर्षित करती है। हर साल शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर यहां महाकुंभ महोत्सव का आयोजन होता है, जिसमें देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु मां महालक्ष्मी और महाराजा अग्रसेन के चरणों में शीश नवाने पहुंचते हैं। इसका आप पर असर अग्रोहा धाम का यह इतिहास और धार्मिक महत्व श्रद्धालुओं को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर देता है। • भारत में: देश भर के श्रद्धालु और अग्रवाल समुदाय के लोग दिवाली और शरद पूर्णिमा के अवसर पर यहां आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल हो सकते हैं। ज्ञान और समृद्धि दोनों की कृपा पाने के लिए तीर्थयात्री एक ही परिसर में महालक्ष्मी और सरस्वती माता के दर्शन का लाभ उठा सकते हैं। • हरियाणा में: हिसar जिले और आसपास के क्षेत्रों में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और सेवाओं को सीधा लाभ पहुंचता है। राज्य के नागरिक 41 नदियों के पावन जल वाले शक्ति सरोवर और 90 फीट ऊंची हनुमान प्रतिमा जैसी सांस्कृतिक धरोहरों का सुगमता से प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ अग्रोहा धाम की स्थापना और इसका ऐतिहासिक पुनरुत्थान प्राकृतिक संकेतों, आध्यात्मिक प्रेरणा और सामूहिक सामाजिक संकल्प का परिणाम रहा है। • सामंजस्य का प्राकृतिक संकेत: महाराजा अग्रसेन और रानी माधवी ने हिंसक प्रवृत्ति वाले बाघ और भेड़ियों के बच्चों को एक साथ प्रेमपूर्वक खेलते देखा, जिसे उन्होंने निडरता और पारस्परिक सौहार्द का दैवीय संदेश मानकर उसी स्थान पर राज्य बसाया। • आध्यात्मिक पुनर्जागरण की प्रेरणा: सदियों बाद जब अग्रोहा का ऐतिहासिक प्रभाव क्षीण होने लगा, तब साल 1907 में पहुंचे तपस्वी ब्रह्मानंद ब्रह्मचारी ने समाज को इस प्राचीन भूमि के पुनरुद्धार के लिए संगठित होने की दिशा दिखाई। • सामूहिक संस्थागत संकल्प: समाज के प्रतिनिधियों ने 1908 में अग्रवाल दरबार और 1976 में अग्रोहा विकास ट्रस्ट गठित कर निर्माण शुरू कराया, जिसके परिणामस्वरूप 1984 में मुख्य धाम पूर्ण रूप से बनकर तैयार हुआ। सवाल-जवाब 1. अग्रोहा धाम भारत के किस राज्य और जिले में स्थित है? अग्रोहा धाम हरियाणा राज्य के हिसार जिले में स्थित एक प्रमुख ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है। 2. महाराजा अग्रसेन को अग्रोहा नगरी बसाने के लिए क्या शुभ संकेत मिला था? यात्रा के दौरान उन्होंने बाघ के शावकों और भेड़ियों के बच्चों को एक साथ निर्भय होकर खेलते देखा था, जिसे उन्होंने समृद्ध राज्य की स्थापना के लिए शुभ संकेत माना। 3. अग्रोहा धाम के मुख्य मंदिर परिसर में कौन-कौन से देव विग्रह स्थापित हैं? मंदिर के मध्य भाग में मां महालक्ष्मी, पश्चिमी भाग में मां सरस्वती और पूर्वी भाग में महाराजा अग्रसेन का मंदिर स्थापित है। 4. आधुनिक अग्रोहा धाम का निर्माण कब शुरू हुआ और यह कब पूरा हुआ? मंदिर का निर्माण कार्य 1976 में शुरू किया गया था और मुख्य मंदिर 1984 में बनकर तैयार हुआ। 5. शक्ति सरोवर की मुख्य विशेषता क्या है? मंदिर परिसर के पीछे स्थित शक्ति सरोवर को साल 1988 में देश की 41 पवित्र नदियों के पावन जल से भरा गया था। 6. अग्रोहा धाम में स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा कितनी ऊंची है? परिसर में स्थापित हनुमान जी की विशाल प्रतिमा की ऊंचाई करीब 90 फीट है। 7. अग्रोहा धाम में महाकुंभ महोत्सव का आयोजन किस अवसर पर किया जाता है? अग्रोहा धाम में प्रत्येक वर्ष शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर भव्य महाकुंभ महोत्सव आयोजित किया जाता है। https://trendkia.com/haryana/bagha-aura-bheriyon-ke-bachchon-ka-vaha-anokha-khela-jisane-rakhi-haryana-men-agroha-dham-ki-aitihasika-ninva-53811 TrendKia — Har trend, sabse pehle.