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  "title": "छह माह की कड़ी तपस्या से गढ़ी 16 फीट ऊंची देवी प्रतिमा, गाजियाबाद के भक्तों ने चुकाए दो लाख",
  "summary": "हरियाणा के फरीदाबाद में बंगाल से आए एक मूर्तिकार दंपती ने 16 फीट ऊंची भव्य दुर्गा प्रतिमा तैयार की है, जिसकी कीमत करीब दो लाख रुपये है। इस बार कुल 25 प्रतिमाएं गढ़ी गई हैं, जिनकी मांग कई राज्यों में है।",
  "content": "शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा के आगमन के साथ ही मूर्तिकारों की कला अपनी चमक बिखेरने लगी है। हरियाणा के औद्योगिक शहर फरीदाबाद में पश्चिम बंगाल से आकर बसे एक शिल्पकार दंपती की कारीगरी इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। पदमा और उनके पति पिछले तीन दशकों से यहां रहकर देवी-देवताओं की सजीव मिट्टी की मूरतें गढ़ रहे हैं। इस वर्ष उनके हाथों से तैयार की गई लगभग 16 फीट ऊंची एक विशालकाय दुर्गा प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र बनी है, जिसे गाजियाबाद की एक संस्था ने दो लाख रुपये के मूल्य पर खरीदा है।\n\nअप्रैल से आरंभ हुआ निर्माण, छह महीने में निखरा रूप\nविशाल प्रतिमाओं का निर्माण कोई साधारण काम नहीं होता, बल्कि इसमें महीनों का धैर्य और श्रम लगता है। पदमा के अनुसार, इस 16 फीट ऊंची भव्य संरचना का कार्य अप्रैल के महीने में ही प्रारंभ कर दिया गया था। पूरे छह माह तक लगातार तराशने और संवारने के उपरांत यह प्रतिमा पूरी तरह सज-धजकर तैयार हो पाई है। इस सत्र में कार्यशाला में करीब 25 प्रतिमाओं का निर्माण हुआ है, जबकि सामान्य तौर पर हर साल लगभग 30 प्रतिमाएं गढ़ी जाती हैं। यहां बनने वाली सामान्य मूर्तियों का प्रारंभिक मूल्य 50 हजार रुपये से शुरू होता है और कद-काठी तथा बारीक नक्काशी के आधार पर यह राशि लाखों रुपये तक पहुंच जाती है।\n\nचार किस्म की मिट्टी और कोलकाता से मंगाया साजो-सामान\nप्रतिमाओं को प्राकृतिक मजबूती और सुंदरता देने के लिए विशेष तकनीक अपनाई जाती है। निर्माण प्रक्रिया में कम से कम चार विभिन्न प्रकार की विशिष्ट मिट्टियों का मिश्रण उपयोग में लाया जाता है। मूर्तियों को जीवंत आभा और पारंपरिक रूप-रंग देने के लिए सभी विशेष रंग, आभूषण और साज-सज्जा की सामग्रियां सीधे कोलकाता से मंगाई जाती हैं। शुरुआत में केवल पति-पत्नी ने मिलकर मिट्टी सानने का सफर शुरू किया था, परंतु अब उनके साथ कई अन्य सहायक कारीगर भी जुड़े हुए हैं। इसी हुनर के सहारे न सिर्फ परिवार का भरण-पोषण हो रहा है, बल्कि बच्चों को अच्छी शिक्षा भी मिल सकी है।\n\nविभिन्न प्रांतों तक फैला मूर्तियों का दायरा\nपदमा और उनके परिवार का यह शिल्पकर्म केवल दुर्गा पूजा तक ही सीमित नहीं रहता। दुर्गा उत्सव संपन्न होते ही वे मां लक्ष्मी और फिर दीपावली के पावन पर्व हेतु अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाने में जुट जाते हैं, जिससे वर्षभर काम का सिलसिला चलता रहता है। उनके हुनर की धाक दिल्ली-एनसीआर के अतिरिक्त राजस्थान, बिहार तथा बंगाल जैसे सुदूर राज्यों से आने वाले कद्रदानों के बीच भी जमी हुई है।\n\nगाजियाबाद की पूजा समिति ने 20वें उत्सव पर सौंपी जिम्मेदारी\nगाजियाबाद के इंदिरापुरम क्षेत्र से इस 16 फीट ऊंची प्रतिमा को लेने पहुंचे दिप्तेंद्र बोस ने बताया कि उनकी संस्था इस दफा दुर्गा पूजा का 20वां वार्षिक समारोह आयोजित कर रही है। बोस ने स्पष्ट किया कि उचित लागत और उत्कृष्ट शिल्प कौशल के कारण ही वे वर्षों से फरीदाबाद के इसी कारीगर दंपती से प्रतिमाएं ले जा रहे हैं।\n\nइसका आप पर असर\nयह समाचार पारंपरिक कारीगरों की आजीविका और त्योहारों पर मूर्तियों के बढ़ते बाजार मूल्य को रेखांकित करता है।\n\n• राष्ट्रीय स्तर पर: त्योहारों के दौरान पारंपरिक हस्तकला और मिट्टी की मूर्तियों की भारी मांग भारतीय सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करती है। ग्राहक सीधे कारीगरों से संपर्क करके बिचौलियों के बिना उचित मूल्य पर कलाकृतियां प्राप्त कर सकते हैं।\n• फरीदाबाद और एनसीआर में: गाजियाबाद और दिल्ली-एनसीआर की पूजा समितियां फरीदाबाद में 50 हजार से 2 लाख रुपये तक के बजट में सीधे निर्माताओं से उत्कृष्ट मूर्तियां खरीद सकती हैं। खरीदारों को विशाल प्रतिमाओं के लिए कम से कम छह महीने पहले यानी अप्रैल में ही अग्रिम बुकिंग करानी होगी।\n• कारीगरों और श्रमिकों के लिए: पूरे साल चलने वाले इस व्यवसाय से स्थानीय कामगारों को निरंतर रोजगार और आजीविका का सशक्त साधन प्राप्त होता है। हुनरमंद मूर्तिकार दीपावली और लक्ष्मी पूजन के लिए भी अग्रिम आर्डर हासिल कर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं।\n• पर्यावरण और संस्कृति के संदर्भ में: चार प्रकार की प्राकृतिक मिट्टियों के प्रयोग से बनी मूर्तियां जलस्रोतों को रासायनिक नुकसान से बचाती हैं। आयोजकों को चाहिए कि वे पारंपरिक मिट्टी की कारीगरी को प्राथमिकता देकर पर्यावरण अनुकूल पर्व मनाएं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nदुर्गा पूजा के विशाल आयोजनों और समितियों की विशिष्ट सांस्कृतिक मांगों के कारण इस प्रकार की भव्य प्रतिमाओं का निर्माण कराया जाता है।\n\n• समिति का ऐतिहासिक उत्सव: गाजियाबाद के इंदिरापुरम की संस्था इस वर्ष दुर्गा पूजा का अपना 20वां संस्करण आयोजित कर रही है। इस मील के पत्थर को यादगार बनाने के लिए उन्होंने विशेष रूप से 16 फीट ऊंची प्रतिमा तैयार करवाई।\n• विश्वसनीय कला और उचित मूल्य: आयोजन समिति वर्षों से इसी फरीदाबाद कार्यशाला से खरीदारी करती आ रही है। शिल्पकारों का त्रुटिहीन काम और उचित मूल्य निर्धारण ग्राहकों को बार-बार यहां खींच लाता है।\n• दीर्घकालिक तैयारी: इतनी विशाल प्रतिमा के निर्माण में चार किस्म की मिट्टी, कोलकाता से मंगाए गए साजो-सामान और छह माह की अनवरत मेहनत लगती है। इसी व्यापक प्रक्रिया और उच्च गुणवत्ता के कारण प्रतिमा का मूल्य दो लाख रुपये निर्धारित हुआ।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. फरीदाबाद में तैयार की गई विशाल दुर्गा प्रतिमा की ऊंचाई और कीमत कितनी है?\nइस प्रतिमा की ऊंचाई करीब 16 फीट है और इसकी कीमत लगभग 2 लाख रुपये है।\n\n2. प्रतिमा को बनाने में कितना समय लगा और काम कब शुरू हुआ था?\nइस प्रतिमा का निर्माण कार्य अप्रैल महीने में शुरू हुआ था और इसे पूरा करने में लगभग छह महीने का समय लगा।\n\n3. यह 16 फीट ऊंची मूर्ति किस शहर के संगठन ने खरीदी है?\nगाजियाबाद के इंदिरापुरम निवासी दिप्तेंद्र बोस के संगठन ने अपने 20वें दुर्गा पूजा उत्सव के लिए यह मूर्ति बनवाई है।\n\n4. प्रतिमा बनाने के लिए सामग्री कहां से मंगाई जाती है?\nमूर्ति निर्माण में कम से कम चार तरह की मिट्टी लगती है, जबकि रंग और सजावट का सामान कोलकाता से मंगाया जाता है।\n\n5. शिल्पकार दंपती कितने वर्षों से फरीदाबाद में मूर्तियां बना रहे हैं?\nपश्चिम बंगाल से आए पदमा और उनके पति पिछले 30 वर्षों से फरीदाबाद में मूर्तियां गढ़ने का कार्य कर रहे हैं।\n\n6. कार्यशाला में मूर्तियों की सामान्य शुरुआती कीमत क्या रहती है?\nमूर्तियों की शुरुआती कीमत 50 हजार रुपये से शुरू होती है और आकार व नक्काशी के हिसाब से लाखों रुपये तक जाती है।\n\nप्रेरणा और सबक\nपश्चिम बंगाल से आकर हरियाणा में अपनी पहचान स्थापित करने वाले पदमा और उनके पति की यह यात्रा उद्यम और लगन की मिसाल है।\n\n• मेहनत से पहचान: शून्य से शुरुआत करके तीन दशकों तक लगातार श्रम करने पर किसी भी क्षेत्र में प्रांतीय सीमाओं से परे पहचान बनाई जा सकती है।\n• परिवार की प्रगति: पैतृक हुनर को व्यवसाय में बदलकर यह दंपती न केवल घर चला रहा है बल्कि अपनी नई पीढ़ी को शिक्षित करने में भी सफल रहा।\n• दूसरों को रोजगार: स्वयं काम शुरू करने के बाद अब वे अन्य सहायक कारीगरों को भी रोजी-रोटी उपलब्ध करा रहे हैं।\n• सालभर सक्रियता: एक ही अवसर पर निर्भर रहने के बजाय दुर्गा पूजा, लक्ष्मी पूजन और दिवाली के चक्र को जोड़कर सालभर काम जारी रखा जा सकता है।",
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  "category": "हरियाणा",
  "publishedAt": "2026-10-14",
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