दरोगा की नौकरी छोड़कर रावण बनाने वाले मोहम्मद वकील की अनूठी कहानी अंबाला में दशहरे के लिए रावण के पुतले तैयार कर रहे मोहम्मद वकील ने अपनी गहरी दोस्ती और पुश्तैनी हुनर को बचाने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा की नौकरी छोड़ दी थी। अंबाला के रामबाग ग्राउंड में जब दशहरे के पावन अवसर पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के विशालकाय पुतलों का दहन किया जाएगा, तो उस क्षण के पीछे एक लंबे समय की कड़ी मेहनत और एक परिवार की पीढ़ियों पुरानी कला समाहित होगी। इन दिनों अंबाला कैंट की कुम्हार मंडी में विजय दशमी के पर्व को लेकर जबरदस्त हलचल और तैयारियां चल रही हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ से आए मुस्लिम कारीगर मोहम्मद वकील अपनी कुशल कारीगरों की टीम के साथ मिलकर इन भव्य पुतलों को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे खास और दिलचस्प बात यह है कि मोहम्मद वकील ने कभी उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा के पद पर सरकारी नौकरी हासिल की थी, लेकिन गहरी दोस्ती और अपने खानदानी पुश्तैनी काम के प्रति अटूट प्रेम ने उन्हें बिल्कुल अलग राह पर चलने के लिए मजबूर कर दिया। आज लगभग 65 साल पुरानी दोस्ती की खूबसूरत यादें और तीन से अधिक पीढ़ियों से चला आ रहा हुनर उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा बन चुका है। सालों पुरानी परंपरा और कारीगरों की टीम मोहम्मद वकील ने इस परंपरा के बारे में विस्तार से बात करते हुए बताया कि वह पिछले 27 वर्षों से लगातार दशहरे के खास मौके पर रावण के पुतले बनाने के लिए अंबाला आ रहे हैं। उनके परिवार में यह काम बहुत पहले से चला आ रहा है और उनसे पहले उनके पिता तथा दादा भी इसी पैतृक पेशे से जुड़े हुए थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि आतिशबाजी का सामान तैयार करना और पुतले बनाना उनके पूरे परिवार का पारंपरिक कार्य है। इस बार भी वह करीब 10 से 12 अनुभवी कारीगरों के एक समर्पित दल के साथ अंबाला पहुंचे हैं और दिन-रात काम में जुटे हैं। पिछले 25 दिनों से लगातार पुतले बनाने और आतिशबाजी सेट करने में लगे ये कारीगर अब त्योहार के अंतिम आयोजनों को सफल बनाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। अंबाला में कई स्थानों पर बन रहे हैं पुतले मोहम्मद वकील के अनुसार, इस बार अंबाला शहर में कुल चार अलग-अलग जगहों पर उनकी टीम के सदस्य रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले तैयार करने का काम कर रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि स्थानीय लोगों को हर साल उनकी कलाकारी और काम बेहद पसंद आता है और यही सराहना उन्हें इस पुरानी परंपरा को लगातार आगे बढ़ाते रहने की प्रेरणा देती है। बड़े आकार के पुतलों को पूरी तरह तैयार करने में अमूमन 20 से 30 दिन का लंबा वक्त लग जाता है। सामान्य परिस्थितियों में बड़े और भव्य रावण के पुतले की कीमत 5 से 10 लाख रुपये या उससे भी अधिक तक जा सकती है, जबकि इस बार अंबाला में तैयार किए जा रहे कुछ चुनिंदा पुतलों की लागत करीब 30 से 40 हजार रुपये आंकी गई है। इस बार के आयोजन के लिए 45 फुट, 50 फुट और 55 फुट तक ऊंचे पुतले विशेष तौर पर तैयार किए जा रहे हैं। दोस्ती के लिए छोड़ी सरकारी नौकरी मोहम्मद वकील के जीवन का सबसे अनोखा और प्रेरणादायक पहलू उनकी पक्की दोस्ती से जुड़ा हुआ है। उन्होंने साझा किया कि उन्होंने केवल हाईस्कूल तक की पढ़ाई पूरी की थी, जिसके बाद उनकी उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा के पद पर नौकरी लग गई थी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि नौकरी ज्वाइन करने के करीब चार महीने बाद ही उन्होंने उसे अलविदा कह दिया। वकील के मुताबिक, बचपन से ही उनका एक जिगरी दोस्त उनके साथ रहा है और दोनों की मित्रता को अब 65 साल से भी अधिक का समय बीत चुका है। जब वह दरोगा की नौकरी पर चले गए थे, तो उनके दोस्त को काफी अकेलापन महसूस होने लगा था और वह अक्सर उनसे कहता था कि उनके नौकरी पर चले जाने के कारण उसका मन बिल्कुल नहीं लगता है। रिश्तों को दी करियर से ज्यादा अहमियत वकील बताते हैं कि उस दौर में उनकी दोस्ती इतनी प्रगाढ़ और गहरी थी कि दोनों एक-दूसरे को अपनी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा मानते थे। अंततः उन्होंने भौतिक सुख और सरकारी नौकरी के मुकाबले अपनी इस अनमोल दोस्ती और पुश्तैनी काम को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का फैसला किया। आज वह उसी खानदानी काम को पूरी निष्ठा और लगन के साथ निभा रहे हैं। उनकी यह दास्तान हमें सिखाती है कि जीवन में हर बड़ा फैसला केवल मोटी कमाई या नौकरी के दायरे में नहीं बंधा होता, बल्कि कई बार इंसान के लिए आपसी रिश्ते और अपनी पैतृक पहचान भी उतनी ही मायने रखती है। साल के बाकी समय में वकील शादियों, फिल्मों और विभिन्न नाटकों के आयोजनों में आतिशबाजी का काम संभालते हैं। उनका कहना है कि जब तक उनका शरीर उनका साथ देगा, वह इस कला को जीवित रखेंगे। हालांकि, उन्हें इस बात का गहरा मलाल जरूर है कि आज की नई पीढ़ी इस पारंपरिक और हुनरमंद पेशे में अब ज्यादा रुचि नहीं दिखा रही है। इसका आप पर असर यह खबर मुख्य रूप से पारंपरिक कारीगरों के जीवन और त्योहारी आयोजनों से जुड़ी है, जिसका पाठकों पर कोई प्रत्यक्ष आर्थिक या प्रशासनिक प्रभाव नहीं पड़ता है। • भारत में: यह कहानी देश भर के पारंपरिक शिल्पकारों और पुश्तैनी हुनर से जुड़े लोगों के संघर्ष व समर्पण को उजागर करती है। इससे पाठकों को यह समझने में मदद मिलती है कि त्योहारों के पीछे कितनी मेहनत छिपी होती है। • अंबाला में: स्थानीय निवासियों और दशहरे के आयोजकों को इस बार भी शहर में चार अलग-अलग जगहों पर 45 से 55 फुट तक ऊंचे पुतले देखने को मिलेंगे। लोग पारंपरिक कारीगरी के इन आयोजनों का भरपूर आनंद उठा सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ यह घटना मोहम्मद वकील द्वारा अपने पैतृक पेशे और बचपन के दोस्त के प्रति गहरे लगाव के कारण लिए गए व्यक्तिगत फैसलों का परिणाम है। इस तरह के मामलों में कोई प्रशासनिक कारण नहीं होता, बल्कि यह पारिवारिक विरासत और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं पर आधारित होता है। • पुश्तैनी विरासत: मोहम्मद वकील का परिवार कई पीढ़ियों से आतिशबाजी और पुतले बनाने के पारंपरिक काम से जुड़ा रहा है, जिसके कारण उन्होंने इस कला को छोड़ने के बजाय अपनाए रखा। • गहरी दोस्ती: उनके बचपन के दोस्त का अकेलापन और उनके साथ रहने का आग्रह इतना गहरा था कि उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर अपने पैतृक काम और दोस्ती को चुना। सवाल-जवाब 1. मोहम्मद वकील अंबाला क्यों आते हैं? वह पिछले 27 वर्षों से हर साल दशहरे पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले बनाने के लिए अंबाला आते हैं। 2. मोहम्मद वकील ने कौन सी सरकारी नौकरी छोड़ी थी? उन्होंने उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा के पद पर हासिल की गई नौकरी छोड़ दी थी। 3. उन्होंने दरोगा की नौकरी क्यों छोड़ी? अपने बचपन के दोस्त के अकेलेपन और पुश्तैनी काम के प्रति लगाव के कारण उन्होंने चार महीने बाद ही नौकरी छोड़ दी थी। 4. अंबाला में इस बार कितने बड़े पुतले तैयार हो रहे हैं? इस बार अंबाला में 45, 50 और 55 फुट तक के पुतले तैयार किए जा रहे हैं। 5. इन पुतलों की लागत कितनी है? अंबाला में तैयार किए जा रहे कुछ पुतलों की लागत करीब 30 से 40 हजार रुपये है। प्रेरणा और सबक मोहम्मद वकील का जीवन उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो अपनी जड़ों और रिश्तों को सबसे ऊपर रखते हैं। • रिश्तों की अहमियत: भौतिक सुख और सरकारी नौकरी से ऊपर दोस्ती और अपनों के साथ को प्राथमिकता देना इंसान को मानसिक संतोष देता है। • हुनर का सम्मान: पुश्तैनी और पारंपरिक कला के प्रति निष्ठा बनाए रखना अपनी संस्कृति को जीवित रखने में मदद करता है। • कड़ी मेहनत: किसी भी काम को पूरी लगन और 27 साल के लंबे अनुभव के साथ करना सफलता और सम्मान दोनों दिलाता है। https://trendkia.com/haryana/daroga-ki-naukari-chhorakara-ravana-banane-vale-mohammed-vakil-ki-anuthi-kahani-48762 TrendKia — Har trend, sabse pehle.