# फरीदाबाद के अटाली में स्थित बाबा लाल दास मंदिर, जहां आकर लोग छोड़ रहे हैं नशे की आदत

> फरीदाबाद के अटाली गांव स्थित करीब 475 साल पुरानी विरासत से जुड़े बाबा लाल दास मंदिर में प्रार्थना करने से नशा छोड़ने का संकल्प मजबूत होता है, हालांकि ग्रामीण चिकित्सकीय इलाज की महत्ता भी बताते हैं।

**Type:** article · **Category:** हरियाणा · **Published:** 2026-10-07 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/haryana/faridabad-ke-atali-men-sthita-baba-lal-das-temple-jahan-akara-loga-chhora-rahe-hain-nashe-ki-adata-44252 · **Language:** Hindi
**Tags:** बाबा लाल दास मंदिर, अटाली गांव, फरीदाबाद, नशा मुक्ति, हरियाणा मंदिर, शेरपुर अलवर

नशीले पदार्थों का सेवन आज के दौर में असंख्य परिवारों के सुख और शांति को तहस-नहस कर देता है। शराब, गुटखा, तंबाकू और अन्य घातक नशों की गिरफ्त में फंसकर रिश्ते टूट की कगार पर पहुंच जाते हैं और घर बर्बाद होने लगते हैं। ऐसी स्थिति से उबरने के लिए लोग दवाओं, नशा मुक्ति केंद्रों और तमाम उपचारों का सहारा लेते हैं। इसी बीच, हरियाणा के फरीदाबाद जिले में स्थित अटाली गांव का एक धार्मिक स्थल लोगों के बीच गहरा विश्वास जगा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, अटाली के ऐतिहासिक बाबा लाल दास जी महाराज मंदिर में आकर शांत मन से बैठने और प्रार्थना करने पर लोगों को नशा छोड़ने का आत्मबल मिलता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस पवित्र स्थान पर मत्था टेकने के बाद कई लोगों ने अपनी बुरी लतों को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है।

## करीब पौने पांच सौ साल पुराना है संत का इतिहास
इस धाम से जुड़ी परंपराओं और इतिहास के बारे में स्थानीय ग्रामीण कर्मवीर सिंह ने अहम जानकारियां साझा की हैं। उनके अनुसार, बाबा लाल दास जी महाराज का कालखंड करीब 475 साल पहले का माना जाता है। संत की आध्यात्मिक शक्ति और व्यक्तित्व ऐसा था कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के अनुयायी समान निष्ठा से उनके चरणों में शीश नवाते थे। बाबा लाल दास भगवान राम के अनन्य उपासक थे और निरंतर राम नाम के जाप में लीन रहते थे। संत की शिक्षाओं का असर उनके शिष्यों के आचरण पर पूरी तरह दिखता था। उनके भक्त हर किस्म के नशे से कोसों दूर रहते थे और किसी भी प्रकार के मांसाहार, अंडे अथवा मदिरा के सेवन से पूरी तरह परहेज रखते थे।

## जहरीले कुएं का पानी मीठा करने की लोककथा
बाबा लाल दास के जीवन से जुड़े कई चमत्कारिक प्रसंग आज भी जनमानस में जीवित हैं। कर्मवीर सिंह के मुताबिक, राजस्थान के अलवर अंचल में एक कुआं हुआ करता था, जिसे लोग जहर का कुआं नाम से पुकारते थे। आम मान्यता थी कि उस कुएं का घातक पानी यदि कोई पी ले, तो उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती थी। जनश्रुतियों में उल्लेख मिलता है कि बाबा लाल दास ने स्वयं उस कुएं का पानी ग्रहण किया, जिसके उपरांत उसका सारा विष समाप्त हो गया और पानी पूरी तरह मीठा व अमृत तुल्य बन गया। इसके अलावा, तत्कालीन शासकों की तरफ से बाबा लाल दास को तरह-तरह से प्रताड़ित करने और उन्हें कारागार में बंदी बनाए जाने के किस्से भी लोककथाओं में गहराई से दर्ज हैं।

## अलवर के मुख्य धाम से हरियाणा तक फैली है मान्यता
संत के प्रति आस्था केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि राजस्थान से लेकर हरियाणा तक फैली हुई है। कर्मवीर के अनुसार, बाबा लाल दास का सबसे विशाल और प्रमुख मंदिर राजस्थान के अलवर जिले स्थित शेरपुर क्षेत्र में स्थापित है। इसके अतिरिक्त हरियाणा सहित आसपास के अनेक अंचलों में भी उनके स्मृति मंदिर खड़े हैं। अटाली गांव का यह मंदिर भी सदियों पुराना बताया जाता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह गांव के बसने के समय से ही अस्तित्व में है। इस विशाल मंदिर परिसर में केवल बाबा लाल दास ही नहीं, बल्कि भगवान शिव, माता पार्वती, हनुमान जी तथा राधा-कृष्ण के मंदिर भी प्रतिष्ठित हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए परिसर में एक पवित्र तालाब और अध्ययन प्रेमियों के लिए एक पुस्तकालय हॉल का निर्माण भी कराया गया है।

## पहली तनख्वाह समर्पित करने की अनोखी परंपरा
अटाली स्थित इस मंदिर में दूर-दराज के इलाकों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं। कर्मवीर सिंह बताते हैं कि जब युवाओं को सरकारी नौकरी हासिल होती है, तो कई लोग अपनी पहली पूरी तनख्वाह मंदिर की सेवा में भेंट कर देते हैं। उन्होंने खुद इस सेवा कार्य की शुरुआत की थी, जिसे देखकर आज कई अन्य लोग भी इस परिपाटी को आगे बढ़ा रहे हैं। न केवल सरकारी कर्मचारी, बल्कि निजी कंपनियों में नौकरी पाने वाले और नया व्यापार शुरू करने वाले लोग भी अपनी सफलता के बाद कृतज्ञता प्रकट करने यहां आते हैं। हर साल फाल्गुन पूर्णिमा के पावन अवसर पर मंदिर में एक विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है, जिसमें लगभग 5 से 7 हजार श्रद्धालुओं के लिए भोजन प्रसाद तैयार कर वितरित किया जाता है।

## आध्यात्मिक शांति और चिकित्सकीय परामर्श का संतुलन
ग्रामीणों का दृढ़ मत है कि जो भी व्यक्ति किसी भी प्रकार के नशे की लत से जूझ रहा हो, यदि वह पूरे समर्पण के साथ इस मंदिर में आकर कुछ समय बिताए और अंतर्मन से प्रार्थना करे, तो उसके भीतर नशा छोड़ने की असीम प्रेरणा जागृत होती है। इसे बाबा लाल दास की असीम अनुकंपा और मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रभाव माना जाता है। परिसर में रहने के दौरान व्यक्ति का ध्यान नशीले पदार्थों की तलब से पूरी तरह हट जाता है। हालांकि, कर्मवीर सिंह यह भी स्पष्ट करते हैं कि लत से मुक्ति में आस्था के साथ वैज्ञानिक और चिकित्सकीय उपाय भी जरूरी हैं। नशे की बीमारी एक गंभीर शारीरिक व मानसिक समस्या है, इसलिए केवल धार्मिक भावना के भरोसे चिकित्सा उपचार छोड़ना सही कदम नहीं है। गंभीर रूप से पीड़ित व्यक्तियों को पेशेवर डॉक्टरों की राय और विधिवत नशा मुक्ति चिकित्सा लेनी चाहिए, जबकि यह मंदिर आत्मबल और मानसिक संकल्प को सुदृढ़ करने का बड़ा जरिया बनता है।

## इसका आप पर असर
यह जानकारी नशे की समस्या से जूझ रहे परिवारों के लिए आध्यात्मिक संबल और व्यावहारिक उपचार का संतुलित मार्ग सुझाती है।

- **भारत में:** देश भर में नशा मुक्ति के लिए संकल्प शक्ति और चिकित्सकीय मदद दोनों का समन्वय जरूरी माना जाता है। पीड़ित परिवार धार्मिक स्थलों से सकारात्मक माहौल लेने के साथ डॉक्टरों की पेशेवर मदद भी जारी रखें।
- **फरीदाबाद में:** स्थानीय निवासी और आसपास के श्रद्धालु अटाली गांव स्थित इस शांत मंदिर में जाकर मानसिक एकाग्रता पा सकते हैं। यदि परिवार में कोई सदस्य नशे की लत से परेशान है, तो वे यहां दर्शन के साथ पास के स्वास्थ्य केंद्रों से उपचार भी ले सकते हैं।
- **युवाओं के लिए:** रोजगार मिलने पर समाज और धर्मार्थ कार्यों में योगदान देने की प्रेरणा मिलती है। पहली कमाई का हिस्सा सेवा में लगाकर युवा अपनी जड़ों और सामाजिक सरोकारों से जुड़े रह सकते हैं।
- **वार्षिक उत्सव:** फाल्गुन पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धालुओं को बड़े सामुदायिक भंडारे में शामिल होने का अवसर मिलता है। इस दौरान 5 से 7 हजार लोगों के लिए आयोजित प्रसाद वितरण में भाग लेकर लोग सामूहिक सेवा से जुड़ सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
अटाली गांव का यह मंदिर ऐतिहासिक आस्था और स्थानीय लोगों के सकारात्मक अनुभवों के कारण चर्चा में बना हुआ है।

- **संत की ऐतिहासिक विरासत:** लगभग 475 वर्ष पूर्व संत बाबा लाल दास ने सात्विक जीवन, राम नाम और नशा मुक्ति का संदेश दिया था। उनकी शिक्षाओं ने उस दौर से ही लोगों को मांसाहार और मदिरा से दूर रहने के लिए प्रेरित किया।
- **लोककथाओं का प्रभाव:** अलवर के जहरीले कुएं के पानी को मीठा करने जैसे प्रसंगों ने जनमानस में संत के प्रति गहरा चमत्कारिक विश्वास स्थापित किया। समय बीतने के साथ यह आस्था कई पीढ़ियों में निरंतर मजबूत होती चली गई।
- **सामुदायिक परंपराएं:** नौकरी लगने पर पहली तनख्वाह अर्पित करने और फाल्गुन पूर्णिमा पर विशाल भंडारा कराने जैसी गतिविधियों ने मंदिर को निरंतर जीवंत रखा है। ग्रामीणों के साझा सहयोग से मंदिर परिसर में आस्था और अनुशासन दोनों बने रहते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. अटाली गांव का बाबा लाल दास मंदिर किस जिले में स्थित है?
यह मंदिर हरियाणा के फरीदाबाद जिले के अटाली गांव में स्थित है।

### 2. बाबा लाल दास जी महाराज का समय कब का माना जाता है?
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार बाबा लाल दास जी महाराज लगभग 475 वर्ष पहले हुए थे।

### 3. बाबा लाल दास का सबसे मुख्य मंदिर कहां स्थित है?
उनका सबसे बड़ा और प्रमुख मंदिर राजस्थान के अलवर जिले के शेरपुर इलाके में बना हुआ है।

### 4. मंदिर में नौकरी लगने पर लोग क्या परंपरा निभाते हैं?
सरकारी या निजी नौकरी लगने पर कई युवा अपनी पहली पूरी तनख्वाह मंदिर में सेवा के रूप में समर्पित करते हैं।

### 5. मंदिर में वार्षिक भंडारा कब आयोजित किया जाता है और कितने लोग शामिल होते हैं?
फाल्गुन पूर्णिमा के आसपास हर साल भंडारा होता है, जिसमें 5 से 7 हजार लोगों के लिए प्रसाद तैयार किया जाता है।

### 6. क्या मंदिर में जाने से नशा पूरी तरह छूटने का दावा किया गया है?
ग्रामीणों के अनुसार मंदिर में प्रार्थना करने से नशा छोड़ने का आत्मबल मिलता है, लेकिन गंभीर लत के लिए डॉक्टरी इलाज भी अनिवार्य बताया गया है।

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