फरीदाबाद के दयालपुर स्टेडियम में झाड़ियों और गड्ढों के बीच अभ्यास को मजबूर खिलाड़ी, मैदान में निकलते हैं सांप फरीदाबाद के दयालपुर स्थित छह एकड़ के खेल परिसर में टूटे ट्रैक और जंगली घास के कारण खिलाड़ियों को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के पदक विजेता देने वाला यह मैदान अब उपेक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है। हरियाणा के फरीदाबाद स्थित दयालपुर गांव का ग्रामीण खेल परिसर करीब 6 एकड़ भूमि में फैला हुआ है, जिसने बीते दौर में खेलों की दुनिया को कई विख्यात चेहरे दिए। जूडो, कबड्डी, तीरंदाजी और कुश्ती जैसे मुकाबलों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले खिलाड़ी इसी मिट्टी से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचे। वर्तमान समय में वही ऐतिहासिक मैदान भीषण प्रशासनिक उपेक्षा और बदहाली का शिकार बना हुआ है। पूरे परिसर में बड़े आकार की जंगली झाड़ियां और घास उग आई है, जिसके चलते वहां अभ्यास करने आने वाले युवा खिलाड़ियों के सामने जहरीले जीवों का खतरा मंडरा रहा है। दौड़ने के लिए बना हुआ ट्रैक जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो चुका है और सुबह-शाम के वक्त खेल गतिविधियों के लिए मैदान में रोशनी की पर्याप्त व्यवस्था तक उपलब्ध नहीं है। परिसर के मुख्य प्रवेश द्वार को भी लंबे समय तक उपेक्षित रखा गया, जिसके दो साल से टूटे रहने के बाद अब जाकर लगाने की कवायद शुरू हुई है। चैंपियनों की इस नर्सरी से निकले एशियन गोल्ड मेडलिस्ट गांव के निवासी पदम सिंह के अनुसार दयालपुर हमेशा से खिलाड़ियों की धरती रहा है और इस मैदान ने खेल जगत को अद्वितीय प्रतिभाएं सौंपी हैं। इसी 6 एकड़ के परिसर में पसीना बहाकर तैयार हुए खिलाड़ियों ने जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का गौरव बढ़ाया है। जूडो खेल में परविंदर हुड्डा ने एशियन स्तर पर गोल्ड मेडल हासिल कर इलाके का नाम रोशन किया, जबकि सरदार ने अंतरराष्ट्रीय कबड्डी स्पर्धाओं में पदक जीतकर अपनी छाप छोड़ी। इसके अतिरिक्त तीरंदाजी स्पर्धा के तहत कल्पना ने राष्ट्रीय स्तर पर पदक अपने नाम किया। वहीं वीरभान और टीटू हुड्डा जैसे एथलीटों ने भी जूडो प्रतियोगिता के राष्ट्रीय मंचों पर गांव का परचम लहराया है। ग्रामीणों का स्पष्ट तौर पर मानना है कि यदि इस खेल मैदान को उचित संसाधन और बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जाएं, तो आने वाली पीढ़ी के सैकड़ों बच्चे भविष्य में देश के लिए बड़े पदक जीत सकते हैं। गड्ढों से भरे ट्रैक और आवारा पशुओं से अभ्यास में बाधा स्टेडियम परिसर के रखरखाव की कोई ठोस व्यवस्था न होने के कारण वहां आवारा मवेशी लगातार घूमते रहते हैं। देखरेख के अभाव का आलम यह रहा कि पिछले दिनों बारिश का मौसम शुरू होने से पहले स्थानीय खिलाड़ियों ने खुद ही संसाधन जुटाकर ट्रैक की जुताई करवाई थी ताकि उस पर दौड़ना मुमकिन हो सके। मैदान की वर्तमान दशा पर बात करते हुए स्थानीय खिलाड़ी मनीष का कहना है कि रनिंग ट्रैक पर जगह-जगह गहरे गड्ढे बन गए हैं, जिनकी वजह से तेज गति में दौड़ते समय पैर मुड़ने और गंभीर चोट लगने का अंदेशा हर पल बना रहता है। ट्रैक के किनारों पर घनी घास उगी होने से जहरीले कीड़े और सांप छिपे रहते हैं। खिलाड़ियों ने बताया कि अभ्यास सत्रों के दौरान कई बार मैदान में सांप रेंगते हुए देखे गए हैं। युवा खिलाड़ियों की मांग है कि इस कच्चे और उबड़-खाबड़ ट्रैक को पक्का कर सुरक्षित बनाया जाए, जिससे अभ्यास में व्यवधान न आए। अंधेरे और जंगली झाड़ियों से बना रहता है भय का वातावरण ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ने वाले युवा छात्र प्रिंस नियमित रूप से अभ्यास के लिए इसी मैदान पर आते हैं। उनका कहना है कि खेल मैदान के एक बड़े हिस्से में घनी और ऊंची घास उगी हुई है, जहां शाम होते ही गहरा अंधेरा छा जाता है। ट्रैक पर मौजूद गड्ढे और झाड़ियों के बीच से अचानक निकलने वाले सांपों की वजह से बच्चों और किशोरों में लगातार डर का माहौल बना रहता है। अभ्यास के दौरान एकाग्रता बनाए रखने के बजाय खिलाड़ियों का ध्यान अपनी सुरक्षा और जहरीले जीवों से बचने पर लगा रहता है। इस समस्या से निजात पाने के लिए मैदान से घास-फूस की सफाई कराने और प्रकाश के लिए पर्याप्त लाइटों की व्यवस्था तुरंत करने की आवश्यकता है। सफाई कर्मचारियों की स्थायी तैनाती और कीटनाशक छिड़काव की मांग स्थानीय निवासी राजेश कुमार ने बताया कि यह स्टेडियम बहुत पुराना है और इसने देश-विदेश में नाम कमाने वाले पहलवान दिए हैं। कबड्डी और जूडो के लिए पहचाने जाने वाले इस गांव के मैदान में आज कांटे और झाड़ियां उगने से खिलाड़ियों का दौड़ना तक दूभर हो चुका है। उनका कहना है कि खेल परिसर की रोजमर्रा की सुरक्षा और साफ-सफाई सुनिश्चित करने के लिए कम से कम एक स्थायी कर्मचारी की नियुक्ति की जानी चाहिए, जिससे यहां की व्यवस्थाएं नियमित बनी रहें। दूसरी ओर, घास की बेकाबू बढ़त पर काबू पाने के लिए मैदान में रासायनिक दवा का छिड़काव शुरू किया गया है। दवा छिड़काव का कार्य कर रहे मंटोस कुमार ने बताया कि बड़ी घास के चलते मैदान में अक्सर सांप दिखाई देते हैं। एक संगठन के निर्देश पर वह सुबह से करीब 10 से 12 टंकी दवा का छिड़काव कर चुके हैं, जिससे यह अनचाही घास सूख जाए और मैदान साफ सुथरा नजर आने लगे। स्थानीय खेल प्रेमियों का कहना है कि नियमित साफ-सफाई और ठोस सुरक्षा उपाय होने पर ही खिलाड़ियों को अभ्यास के लिए एक महफूज माहौल मिल सकेगा। इसका आप पर असर इस बदहाल खेल मैदान का सीधा असर ग्रामीण प्रतिभाओं के भविष्य और स्थानीय खिलाड़ियों की सुरक्षा पर पड़ रहा है। • भारत में: देश में जमीनी स्तर की खेल प्रतिभाएं अक्सर बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षित मैदानों के अभाव में दम तोड़ देती हैं। जब तक ग्रामीण खेल परिसरों का आधुनिकीकरण नहीं होगा, तब तक अंतरराष्ट्रीय पदकों की संख्या बढ़ाना चुनौतीपूर्ण रहेगा। • फरीदाबाद में: दयालपुर और आसपास के गांवों के युवा खिलाड़ियों को अभ्यास के लिए चोटिल होने और जहरीले जीवों के काटने का खतरा उठाना पड़ रहा है। मैदान की समुचित देखभाल न होने से सैकड़ों एथलीटों का नियमित प्रशिक्षण प्रभावित हो रहा है। • खिलाड़ियों की सुरक्षा: ट्रैक पर मौजूद गड्ढों और झाड़ियों के कारण धावकों के पैर मुड़ने और सांप निकलने की आशंका बनी रहती है। सुबह और शाम के समय पर्याप्त लाइट न होने से अंधेरे में अभ्यास करना जोखिम भरा हो गया है। • बुनियादी ढांचे की स्थिति: स्टेडियम का मुख्य गेट दो साल से टूटा पड़ा था और सुरक्षा कर्मचारी न होने से आवारा पशु अंदर घुस आते हैं। रख-रखाव का जिम्मा किसी स्थायी तंत्र के पास न होने से मैदान की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। ऐसा क्यों हुआ दयालपुर खेल स्टेडियम की यह दुर्दशा लंबे समय से प्रशासनिक अनदेखी और किसी समर्पित देखरेख तंत्र की कमी के कारण हुई है। • रखरखाव तंत्र का अभाव: खेल मैदान की नियमित साफ-सफाई और सुरक्षा के लिए किसी स्थायी कर्मचारी की तैनाती नहीं की गई थी। इसके कारण परिसर में बेकाबू घास उग आई और रनिंग ट्रैक धीरे-धीरे गड्ढों में तब्दील हो गया। • सुरक्षा ढांचे की अनदेखी: स्टेडियम का मुख्य प्रवेश द्वार करीब दो साल तक टूटा पड़ा रहा और उसकी सुध नहीं ली गई। खुला परिसर होने की वजह से आवारा मवेशी मैदान में घुसते रहे और स्थिति बदतर होती गई। • अस्थायी समाधान पर निर्भरता: बरसात से पहले खिलाड़ियों को खुद ही चंदा या संसाधन जुटाकर ट्रैक की जुताई करनी पड़ी। हाल ही में किसी संगठन द्वारा घास सुखाने के लिए 10 से 12 टंकी दवा का छिड़काव करवाया गया, जो केवल तात्कालिक उपाय है। सवाल-जवाब 1. दयालपुर खेल स्टेडियम कितने क्षेत्रफल में फैला हुआ है? फरीदाबाद के दयालपुर गांव का यह ग्रामीण खेल स्टेडियम करीब 6 एकड़ भूमि में फैला हुआ है। 2. इस स्टेडियम से निकले किन खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई? परविंदर हुड्डा ने जूडो में एशियन गोल्ड मेडल जीता है, जबकि सरदार ने अंतरराष्ट्रीय कबड्डी स्पर्धाओं में पदक हासिल किया है। 3. मैदान में खिलाड़ियों को किन मुख्य दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है? खिलाड़ियों को ट्रैक पर गड्ढों, बड़ी जंगली घास, सांप निकलने के खतरे और सुबह-शाम पर्याप्त रोशनी न होने की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। 4. स्टेडियम के मुख्य गेट की क्या स्थिति थी? ग्रामीणों के अनुसार स्टेडियम का मुख्य प्रवेश द्वार करीब दो साल से टूटा पड़ा था, जिसे अब ठीक कर लगाया जा रहा है। 5. घास हटाने के लिए मैदान में क्या कदम उठाए गए हैं? एक संगठन के कहने पर घास सुखाने के लिए रसायन का छिड़काव किया गया है, जिसके तहत 10 से 12 टंकी दवा डाली जा चुकी है। https://trendkia.com/haryana/faridabad-ke-dayalpur-stadium-men-jhariyon-aura-gaddhon-ke-bicha-abhyasa-ko-majabura-khilari-maidana-men-nikalate-hain-sanpa-40978 TrendKia — Har trend, sabse pehle.