# फरीदाबाद के कुम्हारों पर त्योहारी सीजन में दोहरी मार, मिट्टी महंगी और ग्राहकों की भारी मोलभाव से कमाई घटी

> करवा चौथ और अहोई अष्टमी के मौके पर फरीदाबाद के बल्लभगढ़ में मिट्टी के करवे और दीये बनाने वाले कारीगर ग्राहकों की भारी मोलभाव और महंगी कच्ची सामग्री से परेशान हैं। लागत न निकलने के कारण पारंपरिक कारीगरों को अपनी अगली पीढ़ी के इस पेशे से दूर होने का डर सता रहा है।

**Type:** article · **Category:** हरियाणा · **Published:** 2026-10-28 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/haryana/faridabad-ke-kumharon-para-tyohari-sijana-men-dohari-mara-mitti-mahngi-aura-grahakon-ki-bhari-molabhava-se-kamai-ghati-52656 · **Language:** Hindi
**Tags:** फरीदाबाद, बल्लभगढ़, कुम्हार, मिट्टी के बर्तन, करवा चौथ, अहोई अष्टमी, दीये

त्योहारी सीजन में घरों को रोशन करने वाले पारंपरिक मिट्टी के कारीगर फरीदाबाद में इस बार गहरी आर्थिक परेशानी का सामना कर रहे हैं। करवा चौथ और अहोई अष्टमी जैसे पर्वों पर मिट्टी के करवे, दीये और मटके बेचकर साल भर के बड़े मुनाफे की आस लगाने वाले कुम्हार परिवारों को बाजार की सुस्ती ने मायूस कर दिया है। पूरे दिन चाक पर पसीना बहाने, बर्तनों को धूप में सुखाने, भट्टी में पकाने और फिर बाजार तक ढोने की भारी मशक्कत के बावजूद कारीगरों को उनकी लागत के बराबर भी दाम नहीं मिल पा रहे हैं। कच्ची मिट्टी की बढ़ती कीमतों और खरीदारों की ओर से की जा रही अत्यधिक मोलभाव ने उनकी बचत को पूरी तरह खत्म कर दिया है।

## लागत के मुकाबले ग्राहकों की भारी मोलभाव
बल्लभगढ़ स्थित कुम्हार मोहल्ले के कारीगरों का कहना है कि त्योहारी सीजन में खरीदार मिट्टी के बर्तनों की कीमत गिराकर मांग रहे हैं। लाडो देवी के अनुसार साधारण बिना रंग वाले जिस करवे की कीमत 30 रुपये रखी गई है, उसके लिए ग्राहक केवल 10 रुपये या 20 रुपये देने की जिद करते हैं। वहीं 50 रुपये में बिकने वाले रंगे हुए करवे पर खरीदार 30 से 40 रुपये की पेशकश करते हैं। पूजा के साधारण दीयों की कीमत महज 1 रुपये प्रति पीस होने के बावजूद लोग 10 रुपये में 15 दीये मांगते हैं। इस तरह के औने-पौने दामों में सामान बेचने से न तो मिट्टी और ईंधन का खर्च निकल पाता है और न ही दिनभर की मजदूरी हाथ आती है।

## कच्चे माल की महंगाई और घटती बिक्री
बल्लभगढ़ के कुम्हार मोहल्ले की निवासी बुलबुल गोला बताती हैं कि पिछले साल की तुलना में इस बार कारोबार में भारी गिरावट दर्ज की गई है। दूर-दराज से मिट्टी मंगवाने, उसे तैयार करने और फिर बर्तनों को पकाने में लगने वाले ईंधन के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। इसके विपरीत जब तैयार माल बाजार में पहुंचता है, तो खरीदारों की संख्या काफी कम दिखती है। जो लोग खरीदारी करने आते भी हैं, वे उत्पादन में लगी मेहनत को समझे बिना बेहद सस्ते में सामान चाहते हैं। स्थिति यह हो गई है कि जितनी मेहनत पूरा परिवार मिलकर करता है, शाम तक उतनी बुनियादी आमदनी भी नहीं जुट पाती।

## बाजार में नए विक्रेताओं के आने से बंटा कारोबार
त्रिवेणी देवी और ऊषा देवी बताती हैं कि पहले गलियों और आवासीय कॉलोनियों में घूम-घूमकर भी सामान बिक जाता था, लेकिन अब केवल मुख्य बाजार में ही थोड़ी-बहुत बिक्री हो रही है। पारंपरिक रूप से खुद मिट्टी तैयार कर बर्तन बनाने वालों के सामने अब यह चुनौती भी है कि बाजार में कई अन्य विक्रेता भी तैयार मिट्टी के बर्तन बेचने लगे हैं। इससे पारंपरिक कारीगरों का ग्राहक वर्ग बंट गया है। त्रिवेणी देवी खुद भी मिट्टी के बर्तन बनाने के साथ-साथ तैयार उत्पाद खरीदकर बेचती हैं, लेकिन कम लाभ मार्जिन के चलते दुकान का खर्च चलाना भी कठिन हो गया है।

## पुश्तैनी काम से दूर होती नई पीढ़ी
कुम्हार परिवारों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि उनका पुश्तैनी हुनर अब आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं रह गया है। मिट्टी की बढ़ती कीमतें, भारी शारीरिक श्रम और नाममात्र के मुनाफे को देखते हुए युवा पीढ़ी इस काम को अपनाने से कतरा रही है। कारीगरों का मानना है कि यदि बाजार में हस्तशिल्प और मिट्टी के काम को वाजिब कीमत नहीं मिली, तो आने वाले वर्षों में परिवार के युवा इस पुश्तैनी पेशे को हमेशा के लिए छोड़ देंगे।

## इसका आप पर असर
पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों की बिक्री घटने और कारीगरों की घटती आय से स्थानीय हस्तशिल्प और त्योहारी बाजारों पर सीधा असर पड़ रहा है।

- **भारत में:** त्योहारी सीजन में देश भर में पारंपरिक हस्तशिल्प और मिट्टी के बर्तनों की जगह वैकल्पिक उत्पादों के बढ़ते चलन से कारीगरों की आजीविका प्रभावित हो रही है। ग्राहकों द्वारा उचित मूल्य न दिए जाने से कई क्षेत्रों में यह कला संकट में पड़ सकती है।
- **फरीदाबाद में:** बल्लभगढ़ और आसपास के इलाकों में मिट्टी के करवे और दीये बनाने वाले परिवारों की आमदनी सीधे तौर पर कम हो गई है। अगर स्थानीय स्तर पर कारीगरों को सही मूल्य नहीं मिला तो पारंपरिक मिट्टी के सामान की उपलब्धता आने वाले समय में घट सकती है।
- **खरीदारों पर:** मिट्टी के दीयों और करवों की खरीद पर अत्यधिक मोलभाव करने से पारंपरिक कारीगरों की लागत नहीं निकल पा रही है। उपभोक्ताओं को अपनी त्योहारी खरीदारी में पारंपरिक कारीगरों के परिश्रम का ध्यान रखना होगा।
- **आने वाली पीढ़ी पर:** कम लाभ और अधिक मेहनत के चलते युवा पीढ़ी अब इस पुश्तैनी काम को जारी रखने के पक्ष में नहीं है। इससे भविष्य में पारंपरिक चाक और मिट्टी के बर्तनों का हुनर धीरे-धीरे लुप्त हो सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
फरीदाबाद में मिट्टी के बर्तनों के कारोबार में मंदी और कारीगरों के संकट के पीछे कई बुनियादी आर्थिक कारण मौजूद हैं।

- **कच्चे माल की बढ़ती लागत:** बर्तनों के निर्माण के लिए जरूरी अच्छी मिट्टी और भट्टियों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ गई हैं। इसके चलते कारीगरों की उत्पादन लागत पिछले वर्षों के मुकाबले काफी बढ़ चुकी है।
- **ग्राहकों का आक्रामक मोलभाव:** त्योहारी बाजार में खरीदार 30 रुपये के करवे को 10 से 20 रुपये में और 1 रुपये के दीयों को 10 रुपये में 15 की दर से मांग रहे हैं। इस भारी छूट के दबाव के कारण कारीगरों का मुनाफा खत्म हो रहा है।
- **बाजार में नए विक्रेताओं का प्रवेश:** पहले यह काम केवल पारंपरिक कुम्हार परिवारों तक सीमित था, लेकिन अब अन्य व्यापारियों द्वारा भी बाजार में तैयार मिट्टी के उत्पाद बेचे जाने लगे हैं। इससे पारंपरिक कारीगरों का ग्राहक वर्ग बंट गया है।
- **सीमित बिक्री के रास्ते:** कॉलोनियों और गलियों में घूमकर सामान बेचने का चलन कम हो गया है और कारोबार केवल चुनिंदा बाजारों तक सिमट गया है। मांग घटने से कारीगरों के लिए पूरा माल निकाल पाना कठिन हो रहा है।

## सवाल-जवाब

### 1. फरीदाबाद के कुम्हार इस त्योहारी सीजन में क्यों परेशान हैं?
कच्ची मिट्टी की बढ़ती कीमतों, ग्राहकों की अत्यधिक मोलभाव और बर्तनों की कम बिक्री के कारण कुम्हारों की कमाई काफी घट गई है।

### 2. ग्राहक मिट्टी के करवे और दीयों के लिए क्या दाम मांग रहे हैं?
ग्राहक 30 रुपये वाले करवे को 10 से 20 रुपये में, 50 रुपये वाले रंगे करवे को 30 से 40 रुपये में और 1 रुपये वाले 15 दीये 10 रुपये में मांग रहे हैं।

### 3. बल्लभगढ़ के कुम्हार मोहल्ले के कारीगरों के अनुसार पिछले साल के मुकाबले क्या बदलाव आया है?
कारीगरों का कहना है कि पिछले साल बिक्री काफी अच्छी थी, लेकिन इस बार महंगाई बढ़ने और बिक्री घटने से मेहनत के अनुपात में कमाई नहीं हो रही है।

### 4. कुम्हार परिवारों को अपने पुश्तैनी काम को लेकर क्या डर सता रहा है?
ज्यादा मेहनत, महंगी मिट्टी और कम मुनाफे की वजह से कारीगरों को डर है कि उनकी आने वाली पीढ़ी इस पुश्तैनी काम को हमेशा के लिए छोड़ देगी।

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