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  "type": "article",
  "title": "फरीदाबाद के प्रदीप ने भुट्टे के छिलकों से बदली महिलाओं की किस्मत, बेकार कचरे से बना रहे शानदार घरेलू सामान",
  "summary": "फरीदाबाद के सूरजकुंड दिवाली मेले में प्रदीप चंद्र ने भुट्टे के बेकार छिलकों से बने ट्रे और मैट जैसे उत्पाद बेचे हैं। इस अनूठी पहल से दो से तीन गांवों की 100 से ज्यादा महिलाओं को घर बैठे रोजगार मिल रहा है।",
  "content": "फरीदाबाद में एक ऐसी अनोखी पहल देखने को मिल रही है, जहां खाने के बाद बेकार समझकर फेंके जाने वाले भुट्टे के छिलकों से बेहद खूबसूरत घरेलू सामान तैयार किए जा रहे हैं। फरीदाबाद के प्रसिद्ध सूरजकुंड दिवाली मेले में एक खास स्टॉल लगाई गई है, जहां इन छिलकों से बनी ट्रे, मैट और बैठने के आसन लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इस पूरे काम की सबसे खास बात यह है कि इससे दो से तीन गांवों की 100 से ज्यादा महिलाओं को रोजगार मिल रहा है और वे अपने घर पर रहकर ही कमाई कर रही हैं।\n\nदादी के नुस्खे और पुराने आइडिया से मिली प्रेरणा\nफूलजा फाउंडेशन के प्रोग्राम ऑफिसर प्रदीप चंद्र ने बताया कि उनके गांव में पहले भी बुजुर्ग महिलाएं और उनकी दादी भुट्टे के छिलकों से विभिन्न प्रकार की चीजें बनाया करती थीं। उन्होंने और उनके परिवार ने इसी पुरानी परंपरा से प्रेरणा ली और उसी पारंपरिक कला को एक नया और आधुनिक रूप दिया। इस व्यवसाय को शुरू करने का विचार उनके गांव की एक दीदी का था, जो चाहती थीं कि ग्रामीण महिलाओं को ऐसा रोजगार मिले जिसे वे घर की चारदीवारी के भीतर रहकर ही आसानी से कर सकें। आमतौर पर पुरुष काम के सिलसिले में बाहर चले जाते हैं, लेकिन गांवों में महिलाओं के पास रोजगार के सीमित अवसर होते हैं। इसी सोच के तहत इस अनूठे काम की शुरुआत की गई।\n\nकचरे से ऐसे तैयार होते हैं सुंदर उत्पाद\nप्रदीप चंद्र के अनुसार, इस काम को शुरू हुए डेढ़ साल से ज्यादा का समय बीत चुका है। लोग अक्सर भुट्टा खाने के बाद उसके छिलकों को कचरे में फेंक देते हैं, लेकिन उन्होंने और ग्रामीण महिलाओं ने उन्हीं छिलकों को इकट्ठा करना शुरू किया। इसके बाद महिलाओं को थोड़ा प्रशिक्षण दिया गया और उन्होंने यूट्यूब की सहायता से भी कलात्मक वस्तुएं बनानी सीखीं। वर्तमान में भुट्टे के छिलकों से पांच से छह अलग-अलग तरह के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इन वस्तुओं को बनाने में लागत बहुत कम आती है, क्योंकि मुख्य सामग्री यानी छिलके मुफ्त में मिल जाते हैं। सबसे पहले छिलकों को अलग करके अच्छी तरह सुखाया जाता है और फिर पूरी तरह हाथों से बुनाई करके आकर्षक डिजाइन तैयार किए जाते हैं। अकेले एक ट्रे को पूरी तरह तैयार करने में छह से सात घंटे का समय लग जाता है。\n\nबाजार में क्या है इन उत्पादों की कीमत\nइन उत्पादों की कीमत उनकी मेहनत और डिजाइन के हिसाब से तय की गई है। भुट्टे के छिलकों से तैयार की गई एक ट्रे बाजार में 350 रुपये में बेची जाती है। इसके अलावा दो मैट का सेट 500 रुपये में उपलब्ध है। बैठने के लिए छोटे आसन की कीमत 700 रुपये है, जबकि बड़े फ्लोर मैट की कीमत 1500 रुपये रखी गई है। खास बात यह है कि यह सारा सामान सीधे महिलाओं के घरों पर ही तैयार किया जाता है। फिलहाल इस स्टॉल पर सामान का स्टॉक थोड़ा कम चल रहा है, इसलिए कारीगरों द्वारा ग्राहकों से मिलने वाले विशेष ऑर्डर के हिसाब से भी सामान तैयार किया जा रहा है। इस रचनात्मक और पर्यावरण अनुकूल काम ने साबित कर दिया है कि सही सोच और थोड़ी सी मेहनत से कचरे को भी कमाई का जरिया बनाया जा सकता है।\n\nइसका आप पर असर\nयह पहल ग्रामीण महिलाओं को घर बैठे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का बड़ा अवसर दे रही है।\n\n• स्थानीय महिलाओं के लिए: फरीदाबाद और आसपास के दो से तीन गांवों की 100 से अधिक महिलाओं को नियमित घरेलू रोजगार मिल रहा है। इससे उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है।\n• पर्यावरण और बाजार के लिए: भुट्टे के बेकार कचरे का सही उपयोग होने से प्रदूषण कम होता है और ग्राहकों को किफायती दामों पर सुंदर इको-फ्रेंडली उत्पाद मिलते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nइस अनूठे व्यवसाय की शुरुआत ग्रामीण महिलाओं के लिए घर बैठे आय के साधन जुटाने और पारंपरिक कला को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से की गई।\n\n• प्रेरणा का स्रोत: गांव की बुजुर्ग महिलाओं और दादियों की पुरानी कला को आधुनिक डिजाइनों के साथ जोड़कर नया रूप दिया गया।\n• कचरे का सदुपयोग: खाने के बाद फेंके जाने वाले भुट्टे के छिलकों की उपलब्धता मुफ्त में होने के कारण उत्पादन लागत बेहद कम रहती है।\n• कौशल विकास: महिलाओं को प्रशिक्षित करने के लिए बुनियादी मार्गदर्शन और यूट्यूब का सहारा लिया गया ताकि वे गुणवत्तापूर्ण उत्पाद बना सकें।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. यह काम कहाँ और किसके द्वारा शुरू किया गया?\nयह काम फरीदाबाद के सूरजकुंड मेले में प्रदर्शित किया गया है, जिसे फूलजा फाउंडेशन के प्रोग्राम ऑफिसर प्रदीप चंद्र और ग्रामीण महिलाओं द्वारा चलाया जा रहा है।\n\n2. इस काम से कितनी महिलाओं को रोजगार मिला है?\nदो से तीन गांवों की 100 से ज्यादा महिलाएं इस काम से जुड़कर घर बैठे कमाई कर रही हैं।\n\n3. उत्पादों को तैयार करने में मुख्य सामग्री क्या है?\nभुट्टे खाने के बाद फेंके जाने वाले बेकार छिलकों का उपयोग मुख्य सामग्री के रूप में किया जाता है।\n\n4. एक ट्रे को बनाने में कितना समय लगता है?\nभुट्टे के छिलकों से बनी एक ट्रे को पूरी तरह तैयार करने में छह से सात घंटे का समय लगता है।\n\n5. बाजार में इन उत्पादों की कीमत क्या है?\nट्रे की कीमत 350 रुपये, दो मैट की कीमत 500 रुपये, छोटा आसन 700 रुपये और बड़ा फ्लोर मैट 1500 रुपये का है।\n\nप्रेरणा और सबक\nप्रदीप चंद्र और ग्रामीण महिलाओं का यह प्रयास कई महत्वपूर्ण सबक सिखाता है।\n\n• पारंपरिक ज्ञान का सम्मान: बुजुर्गों के पुराने हुनर और तरीकों को पहचान देकर उन्हें आज के बाजार के मुताबिक उपयोगी बनाया जा सकता है।\n• शून्य लागत से शुरुआत: बेकार समझी जाने वाली चीजों या कचरे का सही इस्तेमाल करके बिना बड़े निवेश के भी कारोबार खड़ा किया जा सकता है।\n• महिला सशक्तिकरण: घर पर रहकर काम करने के अवसर पैदा करके ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जा सकता है।",
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  "category": "हरियाणा",
  "publishedAt": "2026-10-24",
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