# फरीदाबाद के प्रदीप ने भुट्टे के छिलकों से बदली महिलाओं की किस्मत, बेकार कचरे से बना रहे शानदार घरेलू सामान

> फरीदाबाद के सूरजकुंड दिवाली मेले में प्रदीप चंद्र ने भुट्टे के बेकार छिलकों से बने ट्रे और मैट जैसे उत्पाद बेचे हैं। इस अनूठी पहल से दो से तीन गांवों की 100 से ज्यादा महिलाओं को घर बैठे रोजगार मिल रहा है।

**Type:** article · **Category:** हरियाणा · **Published:** 2026-10-24 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/haryana/faridabad-ke-pradeep-ne-corn-husks-se-badali-mahilaon-ki-kismata-bekara-kachare-se-bana-rahe-shanadara-gharelu-samana-51318 · **Language:** Hindi
**Tags:** फरीदाबाद, सूरजकुंड मेला, महिला सशक्तिकरण, हस्तशिल्प, पर्यावरण अनुकूल, रोजगार, स्टार्टअप

फरीदाबाद में एक ऐसी अनोखी पहल देखने को मिल रही है, जहां खाने के बाद बेकार समझकर फेंके जाने वाले भुट्टे के छिलकों से बेहद खूबसूरत घरेलू सामान तैयार किए जा रहे हैं। फरीदाबाद के प्रसिद्ध सूरजकुंड दिवाली मेले में एक खास स्टॉल लगाई गई है, जहां इन छिलकों से बनी ट्रे, मैट और बैठने के आसन लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इस पूरे काम की सबसे खास बात यह है कि इससे दो से तीन गांवों की 100 से ज्यादा महिलाओं को रोजगार मिल रहा है और वे अपने घर पर रहकर ही कमाई कर रही हैं।

## दादी के नुस्खे और पुराने आइडिया से मिली प्रेरणा
फूलजा फाउंडेशन के प्रोग्राम ऑफिसर प्रदीप चंद्र ने बताया कि उनके गांव में पहले भी बुजुर्ग महिलाएं और उनकी दादी भुट्टे के छिलकों से विभिन्न प्रकार की चीजें बनाया करती थीं। उन्होंने और उनके परिवार ने इसी पुरानी परंपरा से प्रेरणा ली और उसी पारंपरिक कला को एक नया और आधुनिक रूप दिया। इस व्यवसाय को शुरू करने का विचार उनके गांव की एक दीदी का था, जो चाहती थीं कि ग्रामीण महिलाओं को ऐसा रोजगार मिले जिसे वे घर की चारदीवारी के भीतर रहकर ही आसानी से कर सकें। आमतौर पर पुरुष काम के सिलसिले में बाहर चले जाते हैं, लेकिन गांवों में महिलाओं के पास रोजगार के सीमित अवसर होते हैं। इसी सोच के तहत इस अनूठे काम की शुरुआत की गई।

## कचरे से ऐसे तैयार होते हैं सुंदर उत्पाद
प्रदीप चंद्र के अनुसार, इस काम को शुरू हुए डेढ़ साल से ज्यादा का समय बीत चुका है। लोग अक्सर भुट्टा खाने के बाद उसके छिलकों को कचरे में फेंक देते हैं, लेकिन उन्होंने और ग्रामीण महिलाओं ने उन्हीं छिलकों को इकट्ठा करना शुरू किया। इसके बाद महिलाओं को थोड़ा प्रशिक्षण दिया गया और उन्होंने यूट्यूब की सहायता से भी कलात्मक वस्तुएं बनानी सीखीं। वर्तमान में भुट्टे के छिलकों से पांच से छह अलग-अलग तरह के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इन वस्तुओं को बनाने में लागत बहुत कम आती है, क्योंकि मुख्य सामग्री यानी छिलके मुफ्त में मिल जाते हैं। सबसे पहले छिलकों को अलग करके अच्छी तरह सुखाया जाता है और फिर पूरी तरह हाथों से बुनाई करके आकर्षक डिजाइन तैयार किए जाते हैं। अकेले एक ट्रे को पूरी तरह तैयार करने में छह से सात घंटे का समय लग जाता है。

## बाजार में क्या है इन उत्पादों की कीमत
इन उत्पादों की कीमत उनकी मेहनत और डिजाइन के हिसाब से तय की गई है। भुट्टे के छिलकों से तैयार की गई एक ट्रे बाजार में 350 रुपये में बेची जाती है। इसके अलावा दो मैट का सेट 500 रुपये में उपलब्ध है। बैठने के लिए छोटे आसन की कीमत 700 रुपये है, जबकि बड़े फ्लोर मैट की कीमत 1500 रुपये रखी गई है। खास बात यह है कि यह सारा सामान सीधे महिलाओं के घरों पर ही तैयार किया जाता है। फिलहाल इस स्टॉल पर सामान का स्टॉक थोड़ा कम चल रहा है, इसलिए कारीगरों द्वारा ग्राहकों से मिलने वाले विशेष ऑर्डर के हिसाब से भी सामान तैयार किया जा रहा है। इस रचनात्मक और पर्यावरण अनुकूल काम ने साबित कर दिया है कि सही सोच और थोड़ी सी मेहनत से कचरे को भी कमाई का जरिया बनाया जा सकता है।

## इसका आप पर असर
यह पहल ग्रामीण महिलाओं को घर बैठे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का बड़ा अवसर दे रही है।

- **स्थानीय महिलाओं के लिए:** फरीदाबाद और आसपास के दो से तीन गांवों की 100 से अधिक महिलाओं को नियमित घरेलू रोजगार मिल रहा है। इससे उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है।
- **पर्यावरण और बाजार के लिए:** भुट्टे के बेकार कचरे का सही उपयोग होने से प्रदूषण कम होता है और ग्राहकों को किफायती दामों पर सुंदर इको-फ्रेंडली उत्पाद मिलते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
इस अनूठे व्यवसाय की शुरुआत ग्रामीण महिलाओं के लिए घर बैठे आय के साधन जुटाने और पारंपरिक कला को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से की गई।

- **प्रेरणा का स्रोत:** गांव की बुजुर्ग महिलाओं और दादियों की पुरानी कला को आधुनिक डिजाइनों के साथ जोड़कर नया रूप दिया गया।
- **कचरे का सदुपयोग:** खाने के बाद फेंके जाने वाले भुट्टे के छिलकों की उपलब्धता मुफ्त में होने के कारण उत्पादन लागत बेहद कम रहती है।
- **कौशल विकास:** महिलाओं को प्रशिक्षित करने के लिए बुनियादी मार्गदर्शन और यूट्यूब का सहारा लिया गया ताकि वे गुणवत्तापूर्ण उत्पाद बना सकें।

## सवाल-जवाब

### 1. यह काम कहाँ और किसके द्वारा शुरू किया गया?
यह काम फरीदाबाद के सूरजकुंड मेले में प्रदर्शित किया गया है, जिसे फूलजा फाउंडेशन के प्रोग्राम ऑफिसर प्रदीप चंद्र और ग्रामीण महिलाओं द्वारा चलाया जा रहा है।

### 2. इस काम से कितनी महिलाओं को रोजगार मिला है?
दो से तीन गांवों की 100 से ज्यादा महिलाएं इस काम से जुड़कर घर बैठे कमाई कर रही हैं।

### 3. उत्पादों को तैयार करने में मुख्य सामग्री क्या है?
भुट्टे खाने के बाद फेंके जाने वाले बेकार छिलकों का उपयोग मुख्य सामग्री के रूप में किया जाता है।

### 4. एक ट्रे को बनाने में कितना समय लगता है?
भुट्टे के छिलकों से बनी एक ट्रे को पूरी तरह तैयार करने में छह से सात घंटे का समय लगता है।

### 5. बाजार में इन उत्पादों की कीमत क्या है?
ट्रे की कीमत 350 रुपये, दो मैट की कीमत 500 रुपये, छोटा आसन 700 रुपये और बड़ा फ्लोर मैट 1500 रुपये का है।

## प्रेरणा और सबक
प्रदीप चंद्र और ग्रामीण महिलाओं का यह प्रयास कई महत्वपूर्ण सबक सिखाता है।

- **पारंपरिक ज्ञान का सम्मान:** बुजुर्गों के पुराने हुनर और तरीकों को पहचान देकर उन्हें आज के बाजार के मुताबिक उपयोगी बनाया जा सकता है।
- **शून्य लागत से शुरुआत:** बेकार समझी जाने वाली चीजों या कचरे का सही इस्तेमाल करके बिना बड़े निवेश के भी कारोबार खड़ा किया जा सकता है।
- **महिला सशक्तिकरण:** घर पर रहकर काम करने के अवसर पैदा करके ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जा सकता है।

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