मानसून में लौकी की फसल पर काले धब्बे दिखें तो समझ जाएं एन्थ्रेक्नोज का हमला, ऐसे करें बचाव मानसून में लौकी की पत्तियों पर काले धब्बे दिखें तो सतर्क हो जाएं, यह एन्थ्रेक्नोज फफूंद रोग का संकेत हो सकता है जो फसल और उपज दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है। मानसून के मौसम में लौकी उगाने वाले किसानों के लिए एक बड़ी मुसीबत खड़ी हो सकती है, अगर पौधों की पत्तियों पर हल्के भूरे या काले रंग के धब्बे दिखाई दें। बागवानी विशेषज्ञ डॉ. सत्यनारायण के मुताबिक यह एन्थ्रेक्नोज नाम की फफूंदजनित बीमारी का लक्षण हो सकता है, जो बारिश के दिनों में कद्दूवर्गीय सब्जियों में तेजी से फैलती है। समय पर पहचान न हो तो यह रोग उपज और फसल की गुणवत्ता दोनों पर सीधा असर डाल सकता है। कैसे पहचानें एन्थ्रेक्नोज के लक्षण डॉ. सत्यनारायण के अनुसार एन्थ्रेक्नोज की शुरुआत बेहद मामूली दिखती है। लौकी की पत्तियों पर पहले छोटे, हल्के पीले या पानी से भीगे जैसे भूरे धब्बे नजर आते हैं। अगर इस स्तर पर ध्यान न दिया जाए तो संक्रमण बढ़ने के साथ ये धब्बे गहरे कत्थई या पूरी तरह काले रंग के हो जाते हैं। कई बार प्रभावित हिस्सा इतना सूख जाता है कि पत्ती में छेद जैसा नजर आने लगता है, और गंभीर मामलों में पूरी पत्ती झुलस जाती है। यही वजह है कि किसानों को बारिश के बाद हर बार पत्तियों का बारीकी से मुआयना करना चाहिए। सिर्फ पत्तियां नहीं, बेल और फल भी चपेट में यह रोग सिर्फ पत्तियों तक सीमित नहीं रहता। जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता है, बेल की टहनियों और कच्चे फलों पर भी काले धब्बे उभरने लगते हैं। फल पर धब्बे बनने के बाद उसकी सतह पर सड़न शुरू हो सकती है, जिससे उसकी गुणवत्ता खराब हो जाती है और बाजार में मांग घट जाती है। अंबाला जैसे इलाकों में जहां किसान स्थानीय मंडियों के साथ-साथ आसपास के बाजारों में भी सब्जियां बेचते हैं, वहां खराब गुणवत्ता का सीधा असर उनकी कमाई पर पड़ता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ शुरुआती लक्षण दिखते ही फसल की जांच कराने की सलाह देते हैं। अंबाला के किसानों को खास सतर्कता की सलाह अंबाला और उसके आसपास के इलाकों में मानसून के दौरान लौकी उगाने वाले किसानों को विशेष सावधानी बरतनी होगी। बारिश के बाद खेत में पानी जमा रहना और हवा में लगातार नमी बने रहना फफूंदजनित रोगों के फैलने के लिए अनुकूल हालात बनाता है। किसानों को सिर्फ पत्तियों तक सीमित न रहकर बेल और फल की भी नियमित जांच करनी चाहिए। अगर किसी पौधे पर असामान्य धब्बे नजर आएं तो उसे हल्के में लेने की बजाय तुरंत जांच करानी चाहिए, क्योंकि शुरुआती स्तर पर पहचान होने से रोग को पूरे खेत में फैलने से रोका जा सकता है। ज्यादा नमी और जलभराव है बीमारी की जड़ डॉ. सत्यनारायण बताते हैं कि बारिश के बाद खेत में जरूरत से ज्यादा नमी रहना और पत्तियों पर लंबे समय तक पानी की बूंदें टिकी रहना फफूंदजनित रोगों के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है। इसलिए किसानों को खेत में जलभराव बिल्कुल नहीं होने देना चाहिए और बारिश थमते ही फसल की नियमित निगरानी शुरू कर देनी चाहिए। खासकर निचले हिस्सों वाले खेतों में पानी की सही निकासी का इंतजाम करना जरूरी है, क्योंकि वहां पानी रुकने की आशंका ज्यादा रहती है। लक्षण दिखते ही अपने क्षेत्र के बागवानी विभाग या कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेकर ही इलाज शुरू करना चाहिए। संक्रमित पत्तियां और फल तुरंत हटाएं अगर लौकी की फसल में एन्थ्रेक्नोज के लक्षण दिख जाएं तो सबसे ज्यादा प्रभावित पत्तियों और सड़े हुए फलों को तोड़कर खेत से बाहर निकालकर नष्ट कर देना चाहिए। इन्हें खेत में ही पड़ा छोड़ देने से संक्रमण दूसरे पौधों तक फैलने का खतरा बना रहता है। इसके अलावा बेलों के आसपास अनावश्यक नमी जमा न होने देने का भी ध्यान रखना चाहिए। किसानों को नियमित अंतराल पर पूरी फसल का निरीक्षण करते रहना चाहिए, और नए धब्बे या सड़न दिखते ही तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। छिड़काव के लिए किस दवा का इस्तेमाल करें एन्थ्रेक्नोज पर नियंत्रण के लिए थियोफिनेट मिथाइल 70% डब्ल्यूपी का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए 2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर साफ मौसम में छिड़काव करने की सलाह दी जाती है। हालांकि किसानों को किसी भी फफूंदनाशी का इस्तेमाल अपने क्षेत्र के कृषि विभाग की सिफारिश और उत्पाद पर दिए गए लेबल निर्देशों के मुताबिक ही करना चाहिए। अगर बारिश की संभावना हो तो छिड़काव का सही समय भी विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही तय करना बेहतर रहेगा। थियोफिनेट मिथाइल आधारित उत्पादों के इस्तेमाल का जिक्र कई कृषि स्रोतों में मिलता है। मदद के लिए कहां करें संपर्क डॉ. सत्यनारायण की सलाह है कि मानसून के पूरे सीजन में लौकी की फसल पर लगातार नजर बनाए रखें। अगर पत्तियों पर भूरे या काले धब्बे, टहनियों में संक्रमण या फलों में सड़न जैसे लक्षण दिखें तो देर किए बिना कृषि या बागवानी विशेषज्ञ से संपर्क करें। हरियाणा के बागवानी विभाग ने इसके लिए किसान हेल्पलाइन नंबर 1800-180-2021 भी जारी किया है, जहां किसान सीधे संपर्क कर सकते हैं। समय पर पहचान और सही फसल प्रबंधन से इस रोग के फैलाव को काफी हद तक रोका जा सकता है। इसका आप पर असर यह खबर सीधे तौर पर उन किसानों की जेब से जुड़ी है जो मानसून में लौकी और अन्य कद्दूवर्गीय सब्जियां उगाते हैं। • भारत में: बारिश के मौसम में कद्दूवर्गीय फसलों में एन्थ्रेक्नोज जैसी फफूंदजनित बीमारियां तेजी से फैलती हैं। देश भर के किसान अगर पत्तियों, बेल और फलों की नियमित जांच शुरू कर दें तो समय रहते नुकसान को काफी हद तक टाला जा सकता है। • अंबाला और हरियाणा में: अंबाला के किसान स्थानीय मंडियों के साथ आसपास के बाजारों में भी सब्जी सप्लाई करते हैं, इसलिए फल खराब होने से सीधे कमाई घटती है। हरियाणा के बागवानी विभाग की हेल्पलाइन 1800-180-2021 पर किसान तुरंत मदद ले सकते हैं। • छिड़काव का खर्च: थियोफिनेट मिथाइल 70% डब्ल्यूपी 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़कना होता है, इसलिए किसानों को समय रहते दवा और लेबल निर्देश साथ रखने चाहिए। • जलभराव रोकना जरूरी: बारिश के बाद खेत में पानी जमा न होने दें, खासकर निचले हिस्सों में, क्योंकि यही नमी बीमारी को बढ़ाती है। • शुरुआती पहचान से बचाव: पत्तियों पर हल्के पीले या भूरे धब्बे दिखते ही जांच कराएं, ताकि रोग पूरे खेत में न फैले और उपज बची रहे। ऐसा क्यों हुआ एन्थ्रेक्नोज कोई अचानक आने वाली बीमारी नहीं है, बल्कि यह मानसून के मौसम में बनने वाली नम परिस्थितियों का सीधा नतीजा है। • ज्यादा नमी मुख्य वजह: डॉ. सत्यनारायण के मुताबिक बारिश के बाद खेत में जरूरत से ज्यादा नमी और पत्तियों पर देर तक टिकी पानी की बूंदें फफूंद को पनपने का मौका देती हैं। • जलभराव बढ़ाता खतरा: खेत में पानी जमा रहने से फफूंदजनित रोगों के फैलने की रफ्तार और तेज हो जाती है, खासकर निचले इलाकों वाले खेतों में। • कद्दूवर्गीय सब्जियां ज्यादा संवेदनशील: लौकी जैसी कद्दूवर्गीय फसलें बारिश के मौसम में फफूंदजनित रोगों के प्रति खासतौर पर संवेदनशील मानी जाती हैं, इसलिए यह बीमारी बार-बार देखने को मिलती है। • अनदेखी करने पर फैलाव: शुरुआती धब्बों को नजरअंदाज करने या संक्रमित पत्तियों-फलों को खेत में ही छोड़ देने से रोग तेजी से दूसरे पौधों तक पहुंच जाता है। सवाल-जवाब 1. एन्थ्रेक्नोज क्या है? यह एक फफूंदजनित रोग है जो बारिश के मौसम में लौकी जैसी कद्दूवर्गीय सब्जियों में तेजी से फैलता है। 2. इसके शुरुआती लक्षण क्या हैं? पत्तियों पर छोटे, हल्के पीले या पानी से भीगे भूरे धब्बे दिखना इसका पहला संकेत है। 3. क्या यह फल को भी नुकसान पहुंचाता है? हां, संक्रमण बढ़ने पर बेल की टहनियों और कच्चे फलों पर भी काले धब्बे बनते हैं और फल में सड़न शुरू हो सकती है। 4. इसके नियंत्रण के लिए क्या छिड़काव करें? थियोफिनेट मिथाइल 70% डब्ल्यूपी को 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर साफ मौसम में छिड़का जा सकता है, लेकिन कृषि विभाग की सिफारिश और लेबल निर्देशों के अनुसार ही। 5. संक्रमित पत्तियों और फलों का क्या करें? उन्हें तोड़कर खेत से बाहर ले जाकर नष्ट कर देना चाहिए, ताकि संक्रमण दूसरे पौधों तक न फैले। 6. किसान मदद के लिए कहां संपर्क करें? हरियाणा के बागवानी विभाग की किसान हेल्पलाइन नंबर 1800-180-2021 पर संपर्क किया जा सकता है। 7. यह सलाह किसने दी है? बागवानी विशेषज्ञ डॉ. सत्यनारायण ने यह जानकारी और सुझाव दिए हैं। https://trendkia.com/haryana/manasuna-men-lauki-ki-phasala-para-kale-dhabbe-dikhen-to-samajha-jaen-anthracnose-ka-hamala-aise-karen-bachava-29587 TrendKia — Har trend, sabse pehle.