पंचकूला कोर्ट ने ठुकराई CBI की क्लोजर रिपोर्ट, भिवानी की 19 वर्षीय टीचर मनीषा केस में फिर होगी तफ्तीश हरियाणा के भिवानी में 19 वर्षीय शिक्षिका मनीषा की रहस्यमयी मौत के मामले में पंचकूला अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो की क्लोजर रिपोर्ट नामंजूर करते हुए नए सिरे से पड़ताल करने का निर्देश दिया है। मृतका के पिता संजय ने पुलिस और एजेंसी की पड़ताल पर गंभीर सवाल उठाते हुए कॉलेज प्रशासन पर आरोप लगाए हैं। हरियाणा के भिवानी जिले में 19 वर्षीय शिक्षिका मनीषा की मौत के रहस्यमयी मामले में एक अहम मोड़ सामने आया है। पंचकूला अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI की क्लोजर रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया है और इस केस की नए सिरे से तफ्तीश करने का सख्त आदेश जारी किया है। अदालत के इस फैसले के बाद न्याय की आस लगाए बैठे मृतका के पिता संजय को उम्मीद की नई किरण दिखाई दी है। संजय का कहना है कि जब इस मामले के प्रत्येक तथ्य की निष्पक्ष और गहराई से पड़ताल की जाएगी, तभी उनकी दिवंगत बेटी को सही मायनों में इंसाफ मिल सकेगा। लापता होने के दो दिन बाद खेत में मिला था शव यह पूरा मामला पिछले साल का है, जब 11 अगस्त को ढाणी लक्ष्मण गांव की रहने वाली 19 वर्षीय मनीषा अचानक संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गई थी। परिजनों की तलाश के बीच ठीक दो दिन बाद, 13 अगस्त को सिंघानी गांव के एक खेत में नहर के किनारे मनीषा का शव बरामद किया गया था। शव की विचलित करने वाली स्थिति को देखकर साफ लग रहा था कि यह एक अत्यंत जघन्य और सुनियोजित हत्याकांड है। इस घटना के सामने आने के बाद इलाके में आक्रोश फैल गया और इंसाफ की मांग को लेकर एक लंबा जनांदोलन शुरू हुआ। जनता के भारी दबाव के चलते हरियाणा सरकार ने 20 अगस्त को मामले की जांच CBI को सौंपने का फैसला किया, जिसके बाद 21 अगस्त को परिजनों ने मनीषा के शव का अंतिम संस्कार किया। जांच एजेंसी के तौर-तरीकों पर उठे गंभीर सवाल CBI ने औपचारिक तौर पर 5 सितंबर से इस मामले की पड़ताल शुरू की थी। शुरुआत में परिवार को उम्मीद थी कि केंद्रीय एजेंसी तह तक जाएगी, लेकिन महज दो महीने बीतते-बीतते जांच की गति बेहद सुस्त पड़ गई और कोई भी पुख्ता सुराग या नया तथ्य सामने नहीं आ सका। इसके चलते परिवार ने जांच की दिशा पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। बाद में जब जांच एजेंसी ने पंचकूला अदालत में अपनी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की, तो मृतका के परिजनों ने इसके खिलाफ अदालत में याचिका दायर कर दी। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने क्लोजर रिपोर्ट को नामंजूर कर दिया और दोबारा जांच करने का आदेश दिया। अदालत के इस कड़े निर्देश के बाद मृतका के पिता संजय और कई स्थानीय नागरिक भिवानी स्थित स्वामी धर्मशाला में एकत्र हुए। वहां लोगों को संबोधित करते हुए संजय ने कहा कि अदालत ने जांच एजेंसी की क्लोजर रिपोर्ट को नकारते हुए मामले की दोबारा पड़ताल करने को कहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि खापों और 36 बिरादरी के लोगों का मजबूत साथ नहीं मिलता, तो शायद एजेंसी सालों तक अपनी रिपोर्ट ही दाखिल नहीं करती। अदालत द्वारा रिपोर्ट खारिज किया जाना इस बात का प्रमाण है कि एजेंसी की पड़ताल में सच से जुड़े बुनियादी तथ्य ही गायब थे। लापरवाही और साक्ष्यों की अनदेखी के गंभीर आरोप पिता संजय ने आरोप लगाया कि केंद्रीय एजेंसी ने स्वतंत्र रूप से कोई ठोस काम नहीं किया, बल्कि स्थानीय पुलिस द्वारा तैयार की गई पुरानी थ्योरी को ही क्लोजर रिपोर्ट के रूप में अदालत में पेश कर दिया। उनके अनुसार, जांच एजेंसी को जिन महत्वपूर्ण बिंदुओं और लोगों की पड़ताल करनी चाहिए थी, उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। न तो संबंधित कॉलेज प्रशासन से कोई गहन पूछताछ की गई और न ही मनीषा के मोबाइल फोन की उचित तकनीकी जांच कराई गई। इसके अलावा उन्होंने पुलिस की भूमिका पर भी गहरा संदेह जताया। संजय ने बताया कि पुलिस ने कॉलेज का DVR 40 दिनों तक अपने कब्जे में रखा, जिससे पूरी पुलिसिया कार्रवाई संदेह के घेरे में आ जाती है। इस मामले में सामने आए कथित सुसाइड नोट की प्रामाणिकता भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि उसकी हैंडराइटिंग का मिलान नहीं हो सका था। अब उस कथित पत्र को फॉरेंसिक पड़ताल के लिए दो अलग-अलग स्थानों पर भेजा जाएगा। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट और 36 घंटों का अनसुलझा रहस्य संजय ने भिवानी में किए गए पोस्टमार्टम के नतीजों की ओर ध्यान दिलाते हुए कई विसंगतियां गिनाईं। डॉक्टरों की रिपोर्ट में मौत का समय शव मिलने से 36 घंटे पहले बताया गया था, लेकिन यह बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित है कि उन 36 घंटों के दौरान मृतका का शव कहां रखा गया था। इस रहस्य से पर्दा उठाने में जांच एजेंसियां पूरी तरह नाकाम रहीं। इसके साथ ही, न तो किसी ने यह स्पष्ट किया कि मनीषा की गर्दन कटने की असली वजह क्या थी और न ही उसके जहर खाने के किसी दावे की आधिकारिक पुष्टि हो पाई। पीड़ित पिता ने सीधा आरोप लगाया कि इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि सिंघानी गांव स्थित आइडियल कॉलेज में रची गई थी। उन्होंने पुलिस और केंद्रीय एजेंसी की कार्यप्रणाली पर गंभीर उंगली उठाते हुए आइडियल कॉलेज के प्रशासन पर ही इस समूची साजिश को अंजाम देने का खुला आरोप लगाया है। परिवार का कहना है कि अब जब अदालत ने दोबारा जांच का आदेश दिया है, तो इन सभी अनसुलझे बिंदुओं की तह तक पड़ताल होनी चाहिए। इसका आप पर असर अदालत द्वारा जांच एजेंसी की क्लोजर रिपोर्ट खारिज किए जाने से आपराधिक मामलों में केंद्रीय एजेंसियों की जांच प्रक्रिया और जवाबदेही पर असर पड़ेगा। • हरियाणा में: भिवानी और आसपास के क्षेत्रों में निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे लोगों और सामाजिक संगठनों को न्यायिक प्रणाली से राहत मिली है। इससे राज्य में संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौतों के मामलों में पुलिस और जांच एजेंसियों पर ठोस साक्ष्य जुटाने का कानूनी दबाव बढ़ेगा। • भारत में: यह निर्णय देशभर के उन परिवारों के लिए नजीर बनेगा जहां जांच एजेंसियां बिना पुख्ता तफ्तीश के क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर देती हैं। पीड़ित पक्ष अदालत में याचिका दायर कर फॉरेंसिक साक्ष्यों और अधूरी कड़ियों के आधार पर दोबारा जांच की मांग मजबूती से रख सकते हैं। • शैक्षणिक संस्थानों की निगरानी: शिक्षण संस्थानों के परिसरों में छात्रों और महिला कर्मियों की सुरक्षा व्यवस्था व सीसीटीवी फुटेज के रख-रखाव पर कड़े सवाल उठेंगे। प्रबंधन को सुरक्षा संबंधी डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और जांच में पूरा सहयोग देने के लिए सतर्क रहना होगा। • फॉरेंसिक साक्ष्यों की महत्ता: हस्तलेख मिलान और पोस्टमार्टम समय से जुड़ी विसंगतियों पर अदालती सख्ती से स्पष्ट है कि आधे-अधूरे फॉरेंसिक निष्कर्ष खारिज हो सकते हैं। अभियोजन पक्ष को कोर्ट में रिपोर्ट पेश करने से पहले तकनीकी और चिकित्सीय पहलुओं की पुष्टि अनिवार्य रूप से करनी होगी। ऐसा क्यों हुआ यह घटनाक्रम जांच एजेंसी द्वारा केस को बंद करने के प्रयास और उस पर परिजनों द्वारा उठाए गए गंभीर तकनीकी व कानूनी ऐतराज के कारण उत्पन्न हुआ। • जांच में गंभीर कमियां: जांच एजेंसी ने मृतका के मोबाइल फोन का तकनीकी विश्लेषण नहीं किया और न ही कॉलेज प्रशासन से गहन पूछताछ की। केवल पुलिस की पुरानी केस डायरी के आधार पर क्लोजर रिपोर्ट तैयार किए जाने से अदालत असंतुष्ट रही। • साक्ष्यों की संदिग्ध स्थिति: कथित सुसाइड नोट की लिखावट का मिलान न होना और पुलिस द्वारा कॉलेज का डीवीआर 40 दिनों तक अपने पास रखना मुख्य वजह बना। इन संदिग्ध कदमों से साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका को बल मिला। • चिकित्सीय रिपोर्ट और समय का अंतर: पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का समय शव मिलने से 36 घंटे पहले दर्ज था, लेकिन यह समय अंतराल अनसुलझा रहा। गर्दन पर मिले कट के निशानों और जहर खाने के दावों की स्पष्ट पुष्टि न होने से परिजनों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। • सामुदायिक लामबंदी: स्थानीय खाप पंचायतों और 36 बिरादरी के निरंतर समर्थन के कारण परिवार कानूनी लड़ाई जारी रख सका। इसी संगठित दबाव और याचिका के चलते अदालत ने क्लोजर रिपोर्ट रद्द कर पुनः जांच का निर्देश दिया। सवाल-जवाब 1. मनीषा कौन थी और यह मामला कब सामने आया था? मनीषा हरियाणा के भिवानी जिले के ढाणी लक्ष्मण गांव की रहने वाली 19 वर्षीय टीचर थी, जो पिछले साल 11 अगस्त को लापता हुई थी और 13 अगस्त को उसका शव मिला था। 2. पंचकूला कोर्ट ने क्या आदेश दिया है? पंचकूला कोर्ट ने केंद्रीय जांच एजेंसी CBI की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करते हुए मनीषा मौत मामले की दोबारा जांच करने के आदेश दिए हैं। 3. मृतका के पिता ने पुलिस जांच पर क्या आरोप लगाए हैं? पिता संजय ने आरोप लगाया कि पुलिस ने कॉलेज की DVR को 40 दिन तक अपने पास रखा और CBI ने बिना कॉलेज प्रशासन या फोन की जांच किए पुरानी पुलिस रिपोर्ट पेश कर दी। 4. मनीषा के पोस्टमार्टम और कथित सुसाइड नोट में क्या खामियां सामने आईं? पोस्टमार्टम में मौत 36 घंटे पहले बताई गई लेकिन शव कहां रहा यह स्पष्ट नहीं हुआ, गर्दन कटने या जहर की पुष्टि नहीं हुई और सुसाइड नोट की हैंडराइटिंग का मिलान नहीं हो सका। 5. मामले की जांच सीबीआई को कब सौंपी गई थी? लंबे जनआंदोलन के बाद हरियाणा सरकार ने 20 अगस्त को यह केस सीबीआई को सौंपा था, जिसने 5 सितंबर से अपनी जांच शुरू की थी। https://trendkia.com/haryana/panchkula-court-ne-thukarai-cbi-ki-klojara-riporta-bhiwani-ki-19-varshiya-tichara-manisha-kesa-men-phira-hogi-taphtisha-56657 TrendKia — Har trend, sabse pehle.