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  "type": "article",
  "title": "पराली जलाने के बजाय पशु चारा और खाद बनाकर फरीदाबाद के किसान कुंवरपाल कमा रहे अतिरिक्त मुनाफा",
  "summary": "फरीदाबाद के डीग गांव के किसान कुंवरपाल धान की हाथ से कटाई करवाकर पराली को 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल चारे के रूप में बेच रहे हैं और बचे अवशेष से नीले आलू की उपज बढ़ा रहे हैं।",
  "content": "दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के आसपास हर साल दिवाली के मौसम में धान की कटाई के साथ ही पराली जलाने और वायु प्रदूषण की बहस छिड़ जाती है। फरीदाबाद की मंडियों में इस समय नए धान की आवक शुरू हो गई है और आने वाले दिनों में फसल कटाई की रफ्तार और तेज होने वाली है। जब चारों तरफ खेतों में धुआं उठने की चिंताएं बढ़ रही हैं, तब हरियाणा के फरीदाबाद जिले में कई किसान पारंपरिक ढर्रे से अलग राह चुनकर पराली प्रबंधन की एक मिसाल पेश कर रहे हैं। ये किसान फसल अवशेष को समस्या या कचरा मानने के बजाय उससे अतिरिक्त आय पैदा कर रहे हैं और खेत की उर्वरता भी मजबूत कर रहे हैं।\n\nहाथ से कटाई का तरीका और चारे से सीधी कमाई\nफरीदाबाद के डीग गांव में बड़े पैमाने पर खेती करने वाले किसान कुंवरपाल पिछले कई वर्षों से अपने खेतों में पराली में आग लगाने से पूरी तरह परहेज कर रहे हैं। धान की फसल की कटाई वे मशीनों के स्थान पर अधिकांशतः मजदूरों से हाथ से करवाते हैं। हाथ से कटाई करवाने की इस प्रक्रिया में धान का डंठल और पुआल सुरक्षित बच जाता है, जो दुधारू पशुओं के लिए बेहतरीन सूखा चारा बनता है। कुंवरपाल का स्पष्ट मानना है कि जिस कृषि अवशेष को बेचकर किसान नकद आमदनी हासिल कर सकता है, उसे जलाकर राख कर देना पर्यावरण और किसान की जेब दोनों के लिए भारी नुकसान का सौदा है।\n\nबाजार में धान के इस सूखे चारे की काफी अच्छी मांग रहती है। कुंवरपाल बताते हैं कि हाथ से कटाई के बाद बचने वाला धान का चारा करीब 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से आसानी से बिक जाता है। जो किसान पराली को बोझ समझकर माचिस दिखा देते हैं, वे इस चारे को संभालकर और डेयरी पालकों को बेचकर एक नई कमाई का जरिया बना सकते हैं। इस प्रकार बिना किसी प्रदूषण के किसान के हाथ में लागत निकालने के बाद भी सीधा मुनाफा पहुंचता है और पशुपालकों को पौष्टिक आहार मिल जाता है।\n\nशुगर फ्री नीले आलू की पैदावार और प्राकृतिक खाद\nकुंवरपाल केवल सामान्य फसलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे इस क्षेत्र में शुगर फ्री नीले आलू की व्यावसायिक खेती के लिए भी जाने जाते हैं। वे कई वर्षों से इस किस्म के आलू की बुआई कर रहे हैं, जहां पराली उनके लिए खाद का काम करती है। धान की कटाई के बाद जमीन पर जो थोड़ा बहुत फसल अवशेष बचता है, उसे खेत की जुताई के दौरान मिट्टी में ही दबा दिया जाता है। यह अवशेष मिट्टी में मिलकर प्राकृतिक कंपोस्ट खाद की तरह काम करता है, जिससे अगली फसल के रूप में बोए जाने वाले शुगर फ्री नीले आलू की गुणवत्ता और पैदावार दोनों में भारी इजाफा होता है।\n\nमिट्टी को मिलते हैं पोटाश और कैल्शियम के पोषक तत्व\nफसल अवशेष को मिट्टी में मिलाने से खेत की भौतिक और रासायनिक संरचना में सकारात्मक सुधार आता है। जब धान के डंठल सड़कर मिट्टी में समाते हैं, तो खेत की मिट्टी को पोटाश और कैल्शियम जैसे जरूरी पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में प्राप्त होते हैं। इससे खेत की जुताई आसान हो जाती है और मिट्टी की जल धारण क्षमता भी बेहतर होती है। रासायनिक खादों पर निर्भरता घटाने के साथ-साथ यह प्रक्रिया जमीन की जैविक सेहत को टिकाऊ बनाए रखती है। कुंवरपाल के अनुसार पराली में आग लगाने से खेत की उपजाऊ मिट्टी के मित्र कीट और पोषक तत्व जलकर नष्ट हो जाते हैं, जिससे जमीन बंजर होने की ओर बढ़ती है।\n\nखेत, पशु और किसान तीनों के लिए तिहरा लाभ\nपराली का यह वैज्ञानिक और व्यावहारिक प्रबंधन तीन स्तरों पर फायदा पहुंचाता है। पहला लाभ जमीन को मिलता है, जिसे बिना रासायनिक खर्च के पोटाश और कैल्शियम जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व मिल जाते हैं। दूसरा लाभ दुधारू पशुओं को मिलता है, जिन्हें साल भर के लिए सस्ता और सुपाच्य सूखा चारा प्राप्त होता है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण फायदा खुद किसान को मिलता है, जो प्रति क्विंटल 400 से 500 रुपये की सीधी कमाई करने के साथ-साथ अगली फसल की बेहतर उपज से मुनाफा कमाता है। प्रदूषण फैलाने के आरोपों के बीच डीग गांव के किसान का यह तरीका अन्य किसानों को भी पराली जलाने से रोकने की व्यावहारिक प्रेरणा दे रहा है।\n\nइसका आप पर असर\nइस खबर से स्पष्ट होता है कि धान की पराली को जलाने के बजाय उसका सुरक्षित प्रबंधन करके किसान अतिरिक्त आय कमा सकते हैं और डेयरी लागत घटा सकते हैं।\n\n• भारत में: धान उत्पादक क्षेत्रों में पराली न जलाने से उत्तर भारत में वायु प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। इससे डेयरी उद्योग और ग्रामीण इलाकों में पशुओं के लिए सस्ते सूखे चारे की आपूर्ति साल भर बनी रहती है।\n• फरीदाबाद में: स्थानीय किसान अपनी पराली को 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से डेयरी फार्मों को बेचकर तुरंत नकद राशि कमा सकते हैं। इसके अलावा खेत में बची पराली को खाद बनाकर रासायनिक पोटाश और कैल्शियम पर होने वाला भारी खर्च बचाया जा सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nधान की कटाई के बाद खेतों में अगली रबी फसल की बुआई के लिए कम समय बचता है, जिससे अधिकांश किसान जल्दीबाजी में खेत खाली करने के लिए पराली में आग लगा देते हैं। हालांकि हाथ से कटाई और फसल अवशेष के व्यावसायिक उपयोग की जानकारी मिलने पर यह रुख बदला है।\n\n• हाथ से कटाई का लाभ: कंबाइन हार्वेस्टर से कटाई करने पर पुआल बिखर जाता है, जबकि हाथ से कटाई करवाने पर डंठल सुरक्षित बचता है जो पशु चारे के रूप में इस्तेमाल होता है। यह साबुत पुआल डेयरी पालकों की पहली पसंद बन जाता है।\n• चारे की बाजार में मांग: आसपास के दुग्ध उत्पादकों और पशुपालकों में सूखे चारे की भारी मांग रहती है, जिससे यह आसानी से 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल बिक जाता है। इस आर्थिक लाभ के चलते किसान आग लगाने के बजाय इसे एकत्र करना पसंद करते हैं।\n• आलू की फसल के लिए पोषण: धान के बाद शुगर फ्री नीले आलू की खेती में खेत की जमीन को पोटाश और कैल्शियम जैसे तत्वों की जरूरत होती है। खेत में बचे डंठल को जोतकर मिलाने से प्राकृतिक खाद तैयार होती है और मिट्टी उपजाऊ बनती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. फरीदाबाद के किसान कुंवरपाल पराली का क्या उपयोग करते हैं?\nकुंवरपाल धान की कटाई हाथ से करवाकर पराली को पशुओं के चारे के रूप में बेचते हैं और खेत में बचे अवशेष को मिट्टी में मिलाकर खाद तैयार करते हैं।\n\n2. धान का चारा किस कीमत पर बिकता है?\nकुंवरपाल के अनुसार हाथ से कटाई के बाद बचने वाला धान का चारा करीब 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिक जाता है।\n\n3. पराली को मिट्टी में दबाने से खेत को कौन से पोषक तत्व मिलते हैं?\nधान के अवशेष को मिट्टी में जोतने से जमीन को पोटाश और कैल्शियम जैसे आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं, जिससे खेत की उर्वरता बढ़ती है।\n\n4. कुंवरपाल पराली के बाद कौन सी विशेष फसल उगाते हैं?\nवे धान की कटाई के बाद उसी खेत में शुगर फ्री नीले आलू की खेती करते हैं, जिसमें सड़ी हुई पराली खाद का काम करती है।\n\n5. कुंवरपाल धान की कटाई हाथ से क्यों करवाते हैं?\nहाथ से कटाई करवाने से धान की पराली पूरी तरह सुरक्षित बच जाती है, जिसे आसानी से पशुओं के चारे के रूप में उपयोग या बिक्री के लिए तैयार किया जा सकता है।\n\nप्रेरणा और सबक\nडीग गांव के किसान कुंवरपाल ने साबित किया है कि पर्यावरण के अनुकूल खेती और पारंपरिक तरीके अपनाकर भी किसान अपनी आमदनी को कई गुना बढ़ा सकते हैं।\n\n• समस्या को संसाधन में बदलना: जिस पराली को पूरे उत्तर भारत में वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण और बोझ माना जाता है, कुंवरपाल ने उसे 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल की आय का स्रोत बना दिया।\n• प्राकृतिक पोषण पर भरोसा: रासायनिक उर्वरकों पर अंधाधुंध खर्च करने के बजाय उन्होंने खेत के ही जैविक अवशेष को मिट्टी में मिलाकर जमीन को पोटाश और कैल्शियम से भरपूर बनाया।\n• विविधतापूर्ण और उन्नत खेती: पारंपरिक गेहूं-चावल के चक्र से आगे बढ़कर उन्होंने शुगर फ्री नीले आलू जैसी विशिष्ट फसल अपनाई, जिसकी उपज बढ़ाने में भी धान के अवशेष का उपयोग किया।",
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  "category": "हरियाणा",
  "publishedAt": "2026-09-29",
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