पारंपरिक खेती छोड़ फरीदाबाद के ललित मोहन ने लगाया कीनू का बाग, अब हर सीजन कर रहे लाखों की कमाई हरियाणा के फरीदाबाद जिले में किसान ललित मोहन सैनी ने मौसम की मार से परेशान होकर गेहूं और धान की खेती छोड़ दी। अब वे ऑर्नामेंटल पौधों और कीनू की खेती से सीजन में लाखों रुपये कमा रहे हैं। हरियाणा के फरीदाबाद जिले में स्थित फतेहपुर बिल्लौच गांव के किसान ललित मोहन सैनी ने मौसम की अनिश्चितता और अनिश्चित मुनाफे से तंग आकर पारंपरिक खेती का तरीका बदल दिया है। पहले वे अपने खेतों में धान, गेहूं और हरी सब्जियों की पैदावार करते थे, लेकिन मौसम की मार के कारण लगातार नुकसान झेलना पड़ रहा था। कभी भारी बारिश तो कभी सूखे के हालात उनकी मेहनत पर पानी फेर देते थे। कई बार अचानक हुई ओलावृष्टि से पूरी फसल तबाह हो जाती थी। इस लगातार बनी रहने वाली आर्थिक अनिश्चितता को दूर करने के लिए उन्होंने व्यावसायिक बागवानी की ओर रुख किया और आज वे इससे शानदार कमाई कर रहे हैं। पारंपरिक फसलों के नुकसान से उबारने वाली नई रणनीति ललित मोहन सैनी के अनुसार, गेहूं और धान जैसी पारंपरिक फसलों में लागत ज्यादा और बचत बेहद कम रह गई थी। लगातार अनिश्चित मौसम के कारण किसान कर्ज और घाटे में डूबता जा रहा था। इसी स्थिति से बाहर निकलने के लिए उन्होंने खेती में विविधता लाने का फैसला किया। उन्होंने सबसे पहले ऑर्नामेंटल यानी सजावटी पौधों की नर्सरी तैयार की और फिर फलों के बाग लगाने की योजना बनाई। उनका मुख्य उद्देश्य एक ऐसा कृषि मॉडल तैयार करना था जो न केवल उन्हें सुरक्षित आमदनी दे, बल्कि स्थानीय मजदूरों को भी नियमित रोजगार उपलब्ध करा सके। डेढ़ एकड़ जमीन में बेंगलुरु की किस्म का बाग फलों की खेती के तहत ललित मोहन ने अपने खेत के डेढ़ एकड़ हिस्से में कीनू के पौधे लगाए। इन पौधों की विशेष किस्म वे लगभग चार साल पहले बेंगलुरु से खरीदकर लाए थे। उस समय प्रत्येक पौधे की शुरुआती लागत करीब 200 रुपये आई थी। चार साल की देखरेख के बाद अब ये पौधे पूरी तरह तैयार हो चुके हैं और फल देने लगे हैं। इस समय उनके बाग के प्रति पेड़ से लगभग एक क्विंटल (100 किलोग्राम) तक कीनू की पैदावार मिल रही है, जिससे फसल का कुल उत्पादन काफी अच्छा रहता है। कम लागत, कीटों से सुरक्षा और बेहतर मंडी भाव कीनू की खेती का एक बड़ा फायदा यह है कि इसमें कीटों और बीमारियों का खतरा गेहूं-धान की तुलना में बहुत कम होता है। फसल को सुरक्षित रखने के लिए केवल समय-समय पर सामान्य स्प्रे की जरूरत पड़ती है, जिससे कीटनाशकों पर होने वाला खर्च काफी नियंत्रित रहता है। वर्तमान में स्थानीय मंडियों में कीनू का थोक भाव 30 रुपये से 35 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल रहा है। बाजार में इस फल की मांग मौसमी के साथ मिलाकर जूस निकालने में काफी अधिक रहती है। सजावटी पौधों और फलों के तालमेल से स्थायी आमदनी ऑर्नामेंटल प्लांट्स की ब्रिकी और कीनू के बाग से होने वाली पैदावार के बल पर ललित मोहन हर सीजन में लाखों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं। उनका मानना है कि यदि किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ बाजार की मांग के अनुरूप बागवानी या व्यावसायिक पौधे लगाएं, तो खेती को घाटे का सौदा बनने से रोका जा सकता है। जोखिम कम करने और मुनाफा बढ़ाने का यह तरीका अन्य किसानों के लिए भी एक बेहतरीन उदाहरण बन रहा है। इसका आप पर असर पारंपरिक खेती में मौसम के जोखिम से परेशान किसानों के लिए यह मॉडल एक व्यावहारिक विकल्प पेश करता है। • भारत में: फसल चक्र में विविधता लाने से देश भर के किसानों को सूखे और अतिवृष्टि जैसे मौसमी नुकसान से सुरक्षा मिलती है। इससे कृषि में बेहतर मुनाफा और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन संभव होता है। • फरीदाबाद में: फरीदाबाद और आसपास के क्षेत्रों के किसान धान-गेहूं के चक्र से निकलकर कीनू और सजावटी पौधों की खेती अपनाकर प्रति सीजन लाखों रुपये तक की बेहतर कमाई कर सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ मौसम की मार और फसलों के भारी नुकसान के कारण फरीदाबाद के किसान ने खेती की रणनीति बदली। • मौसम का जोखिम: भारी बारिश, सूखा और ओलावृष्टि के कारण गेहूं और धान की फसलें बार-बार तबाह हो रही थीं। • पारंपरिक फसलों में कम मुनाफा: गेहूं और धान की खेती में बढ़ती लागत और घटते मुनाफे से किसानों को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा था। • वैकल्पिक व्यावसायिक विकल्प: बेंगलुरु से कीनू के पौधे लाकर डेढ़ एकड़ में रोपने और सजावटी पौधों की नर्सरी से कम लागत में अधिक कमाई का रास्ता तैयार हुआ। सवाल-जवाब 1. किसान ललित मोहन सैनी किस गांव और जिले के रहने वाले हैं? वे हरियाणा के फरीदाबाद जिले में स्थित फतेहपुर बिल्लौच गांव के रहने वाले हैं। 2. ललित मोहन सैनी ने कीनू के पौधे कितने क्षेत्रफल में लगाए हैं? उन्होंने अपने खेत के डेढ़ एकड़ हिस्से में कीनू के पौधे लगाए हैं। 3. कीनू के एक पेड़ से लगभग कितना उत्पादन होता है? चार साल पुराना एक कीनू का पेड़ प्रति सीजन लगभग एक क्विंटल (100 किग्रा) फल देता है। 4. कीनू के पौधों की शुरुआती लागत कितनी थी और वे कहां से लाए गए थे? वे बेंगलुरु से पौधे लाए थे और शुरुआती समय में एक पेड़ की कीमत लगभग 200 रुपये आई थी। 5. मंडी में कीनू का क्या भाव मिल रहा है? स्थानीय मंडी में कीनू 30 रुपये से 35 रुपये प्रति किलोग्राम तक के भाव पर बिक रहा है। प्रेरणा और सबक ललित मोहन सैनी की सफलता यह दिखाती है कि नए प्रयोग और सही योजना से खेती को बेहद लाभदायक बनाया जा सकता है। • जोखिम प्रबंधन: मौसम की मार से बचने के लिए एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय विविधता अपनाएं। • बाजार की समझ: उन फलों या पौधों का चुनाव करें जिनकी बाजार और मंडियों में नियमित रूप से मांग रहती है। • दीर्घकालिक सोच: शुरुआत में पौधों पर प्रति पेड़ 200 रुपये जैसी नियंत्रित लागत लगाकर 4 साल बाद लगातार उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। • रोजगार का सृजन: कृषि व्यवसाय ऐसा चुनें जिससे स्वयं के मुनाफे के साथ स्थानीय मजदूरों को भी काम मिल सके। https://trendkia.com/haryana/parnparika-kheti-chhora-faridabad-ke-lalit-mohan-ne-lagaya-kinu-ka-baga-aba-hara-sijana-kara-rahe-lakhon-ki-kamai-31491 TrendKia — Har trend, sabse pehle.