# पालतू कुत्ते के हमले पर क्या कहता है कानून, जानिए इलाज का खर्च और केस दर्ज कराने के पूरे नियम

> डॉग बाइट की घटनाओं में मालिक के दायित्व, इलाज के खर्च, पुलिस शिकायत और अदालती प्रक्रिया को लेकर कानूनी पहलुओं का विस्तृत ब्यौरा।

**Type:** article · **Category:** हरियाणा · **Published:** 2026-10-01 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/haryana/pet-dog-attack-legal-guide-who-pays-for-medical-treatment-and-how-to-file-a-police-complaint-40994 · **Language:** Hindi
**Tags:** कुत्ता काटना, डॉग बाइट कानून, कानूनी अधिकार, पुलिस शिकायत, इलाज खर्च, मोहन तिवारी

आवासीय इलाकों और कॉलोनियों में कुत्तों के काटने की घटनाएं अक्सर देखने को मिलती हैं, लेकिन ऐसी स्थिति बनते ही पीड़ित व्यक्ति और उसके परिजन कानूनी अधिकारों को लेकर उलझन में पड़ जाते हैं। अधिकांश मामलों में लोगों को यह स्पष्ट नहीं होता कि अस्पताल के उपचार का खर्च किससे वसूला जा सकता है और पुलिस प्रशासन के समक्ष अपनी बात कैसे रखी जाए। कई बार पालतू कुत्ते का स्वामी यह तर्क देकर अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ने की कोशिश करता है कि उसका जानवर पूरी तरह टीकाकृत यानी वैक्सीनेटेड है। इस पूरे विषय पर सेक्टर-12 अदालत के वकील मोहन तिवारी ने कानूनी प्रावधानों, पुलिस प्रक्रिया और साक्ष्यों के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला है।

## टीकाकरण के बावजूद दर्ज हो सकती है प्राथमिकी
वकील मोहन तिवारी के अनुसार, किसी जानवर के वैक्सीनेटेड होने का पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराने से कोई सीधा टकराव या बचाव का संबंध नहीं बनता है। किसी भी शिकायत पर पुलिस की कार्रवाई मौके की परिस्थितियों और सामने आए ठोस तथ्यों के आधार पर आगे बढ़ती है। यदि किसी कुत्ते के अचानक झपटने या काटने से कोई नागरिक घायल हुआ है, तो उस जानवर को टीका लगे होने के बाद भी मामले में औपचारिक केस दर्ज किया जा सकता है। सिर्फ इंजेक्शन लगवा देने भर से पशुपालक अपनी कानूनी और नागरिक जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता।

## उपचार के खर्चे की भरपाई और कानूनी आधार
अस्पताल में होने वाले इलाज का खर्च किस पक्ष से दिलवाया जाएगा, इसका निर्धारण पूरी तरह से घटना से जुड़े तथ्यों और साक्ष्यों पर टिका होता है। एडवोकेट मोहन तिवारी स्पष्ट करते हैं कि पीड़ित पक्ष के पास अपनी बात साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेजी प्रमाण मौजूद होने चाहिए। अस्पताल अथवा डॉक्टर द्वारा तैयार की गई चोट की मेडिकल रिपोर्ट, उपचार के पर्चे, घटना से जुड़े दस्तावेज और अन्य भौतिक साक्ष्य इस प्रक्रिया में अत्यंत प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं। इन्हीं बुनियादी तथ्यों के आधार पर संबंधित व्यक्ति की आर्थिक व विधिक जवाबदेही तय करने का कानूनी कदम उठाया जा सकता है।

## जब स्वामी जानवर को अपना मानने से मना कर दे
कई बार विवाद बढ़ने पर पालतू का मालिक उसे अपना जानवर मानने से साफ मुकर जाता है या फिर जख्मी व्यक्ति के दवा-इलाज का खर्च वहन करने से बचता है। ऐसी परिस्थिति में आहत व्यक्ति को सीधे पुलिस थाने पहुंचकर लिखित शिकायत दर्ज करानी चाहिए। इस प्रकार की कानूनी लड़ाई में यह प्रमाणित करना बेहद जरूरी हो जाता है कि हमला वास्तव में किस जानवर ने किया था और उसका वास्तविक स्वामी कौन है। इस बिंदु को साबित करने में मोहल्ले के निवासियों और आसपास मौजूद लोगों के बयान बेहद मददगार सिद्ध होते हैं।

## कैमरे की रिकॉर्डिंग और गवाहों की अहम भूमिका
डॉग बाइट के मामलों में आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक निगरानी उपकरण यानी सीसीटीवी फुटेज एक बेहद निर्णायक साक्ष्य साबित हो सकता है। कैमरे की वीडियो रिकॉर्डिंग से यह साफ तौर पर देखा जा सकता है कि हमले के वक्त वास्तव में क्या घटित हुआ था और जानवर ने किस तरह हमला किया। इसके अलावा घटनास्थल पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों और पड़ोसियों की गवाही भी कानूनी रूप से काफी वजन रखती है। आसपास के गवाह यह तस्दीक करने में मदद करते हैं कि वह जानवर इलाके में किसके घर में रहता है और घटना किन हालात में पेश आई। इसलिए पीड़ित को सीसीटीवी फुटेज को फौरन सुरक्षित कर लेना चाहिए और मौके पर मौजूद गवाहों का विवरण पुलिस को उपलब्ध कराना चाहिए।

## थाने में अर्जी देने के बाद अदालत तक का रास्ता
पुलिस थाने में औपचारिक तहरीर मिलने के उपरांत जांच अधिकारी पूरे प्रकरण की तफ्तीश शुरू करते हैं। इस कानूनी पड़ताल के दौरान वारदात की वास्तविक परिस्थितियों, दोनों पक्षों की स्थिति और उपलब्ध सभी सबूतों का गहनता से मुआयना किया जाता है। तफ्तीश में जुटाए गए तथ्यों के आधार पर ही आगे की दंडात्मक या निवारक कानूनी कार्रवाई की जाती है। यदि किसी कारणवश स्थानीय पुलिस उचित संज्ञान नहीं लेती या कार्रवाई करने में हीलाहवाली करती है, तो आहत पक्ष न्याय पाने के लिए सीधे सक्षम न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। अदालत में वाद प्रस्तुत करने के लिए मेडिकल रिपोर्ट, थाने में दी गई अर्जी की प्रति और अन्य संबंधित साक्ष्यों को सुरक्षित रखना अनिवार्य है।

## पालतू जानवर रखने वालों के विधिक कर्तव्य
घर में जानवर पालने वाले प्रत्येक नागरिक की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह समाज और राहगीरों की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखे। एडवोकेट मोहन तिवारी बताते हैं कि यदि किसी पालतू के हमले से कोई व्यक्ति चोटिल होता है, तो परिस्थितियों के अनुसार उसके स्वामी के विरुद्ध कानूनी मुकदमा चलाया जा सकता है। ऐसे विवादों में साक्ष्यों की विश्वसनीयता ही मुकदमे का रुख तय करती है। पीड़ित को अपनी मेडिकल जांच रिपोर्ट संभालकर रखनी चाहिए और बिना किसी देरी के मामले की जानकारी पुलिस तंत्र को देनी चाहिए, ताकि उपलब्ध साक्ष्यों के सहारे कानून सम्मत कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।

## इसका आप पर असर
पालतू जानवर के हमले की स्थिति में पीड़ितों और पशुपालकों दोनों के लिए अपने विधिक अधिकारों और कर्तव्यों को समझना व्यावहारिक रूप से आवश्यक है।

- **इलाज का खर्च:** घटना के साक्ष्य और मेडिकल पर्चे सुरक्षित रखकर पीड़ित पक्ष पशुपालक से उपचार खर्च की कानूनी मांग कर सकता है। समय पर साक्ष्य न जुटाने पर आर्थिक क्षति की भरपाई पाना मुश्किल हो सकता है।
- **एफआईआर दर्ज कराने का अधिकार:** कुत्ता वैक्सीनेटेड होने पर भी पीड़ित के पास पुलिस में सीधे प्राथमिकी दर्ज कराने का विधिक अधिकार सुरक्षित रहता है। टीका लगा होना मालिक को किसी आपराधिक या दीवानी जवाबदेही से नहीं बचाता।
- **सबूतों का संग्रह:** घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज और पड़ोसियों की गवाही केस को मजबूत बनाने के लिए फौरन एकत्र करनी चाहिए। यही फुटेज तय करती है कि मालिक ने लापरवाही बरती या नहीं।
- **कोर्ट जाने का विकल्प:** यदि स्थानीय पुलिस शिकायत पर उचित कदम न उठाए, तो पीड़ित मेडिकल पर्चों के सहारे सीधे अदालत में अर्जी लगा सकता है। इसके लिए प्रारंभिक शिकायत की प्रति संभालकर रखना अनिवार्य है।

## ऐसा क्यों हुआ
मोहल्लों में डॉग बाइट की घटनाएं बढ़ने और उनके बाद कानूनी विवाद पैदा होने के पीछे मुख्य रूप से पशुपालकों की असावधानी और जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति शामिल होती है।

- **जिम्मेदारी से मुकरना:** अनेक पशुपालक केवल वैक्सीनेशन का हवाला देकर या जानवर को अपना मानने से इनकार कर इलाज के खर्च से बचने का प्रयास करते हैं। इसी टालमटोल के चलते पीड़ितों को पुलिस और अदालती प्रक्रिया का सहारा लेना पड़ता है।
- **लापरवाही और साक्ष्यों की कमी:** सार्वजनिक स्थानों पर पालतू जानवरों को खुला छोड़ना या उचित नियंत्रण न रखना हादसों का कारण बनता है। विवाद की स्थिति में सीसीटीवी फुटेज और गवाह ही वास्तविक सच्चाई स्पष्ट करते हैं।
- **कानूनी जागरूकता का अभाव:** लोगों में इस बात की स्पष्ट जानकारी नहीं होती कि टीकाकरण किसी मालिक को कानूनी उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं करता। इस जागरूकता की कमी के कारण मामलों में अक्सर विवाद थाने और कचहरी तक पहुंचते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. क्या कुत्ता वैक्सीनेटेड होने पर भी मालिक के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो सकती है?
हां, कुत्ते के टीकाकृत होने के बावजूद यदि उसने किसी को चोट पहुंचाई है, तो घटना की परिस्थितियों के आधार पर प्राथमिकी दर्ज हो सकती है।

### 2. डॉग बाइट के बाद इलाज का खर्च वसूलने के लिए क्या जरूरी है?
पीड़ित के पास चोट की मेडिकल रिपोर्ट, उपचार के बिल और घटना से जुड़े पर्याप्त साक्ष्य होना अनिवार्य है।

### 3. यदि मालिक कुत्ते को अपना मानने से इनकार कर दे तो क्या करें?
पीड़ित को पुलिस में शिकायत दर्ज करानी चाहिए और पड़ोसियों की गवाही व सीसीटीवी फुटेज के जरिए स्वामित्व साबित करना चाहिए।

### 4. पुलिस द्वारा कार्रवाई न किए जाने पर क्या विकल्प बचता है?
यदि पुलिस उचित कदम नहीं उठाती है, तो पीड़ित व्यक्ति मेडिकल रिकॉर्ड और शिकायत की प्रति के साथ सीधे अदालत का रुख कर सकता है।

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