# कंक्रीट के जंगल में पारंपरिक वास्तुकला की मिसाल, सूरजकुंड का मिट्टी से बना घर क्यों खींच रहा लोगों का ध्यान

> फरीदाबाद के सूरजकुंड क्षेत्र में मिट्टी, लकड़ी और पत्थरों से तैयार हुआ तीन दशक पुराना ढांचा अब निजी संग्रहालय के रूप में आगंतुकों और वास्तु प्रेमियों को आकर्षित कर रहा है।

**Type:** article · **Category:** हरियाणा · **Published:** 2026-10-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/haryana/surajkund-mud-house-architecture-43090 · **Language:** Hindi
**Tags:** सूरजकुंड फरीदाबाद, वनभोज मड हाउस, रेवती कामथ, बसंत कामथ, पारंपरिक वास्तुकला, मिट्टी का घर, इकोप्लोर, प्रेरणा प्रसाद

औद्योगिक इकाइयों और गगनचुंबी इमारतों से घिरे फरीदाबाद के बीचों-बीच सूरजकुंड क्षेत्र में एक ऐसा निर्माण मौजूद है जो आधुनिक शहरी जीवन की आपाधापी से बिल्कुल अलग अहसास कराता है। मिट्टी, तराशे गए पत्थरों और प्राकृतिक लकड़ी के मेल से खड़ा किया गया यह ढांचा पहली नजर में किसी शांत पर्वतीय अंचल की बसावट जैसा दृश्य प्रस्तुत करता है। सीमेंट और कंक्रीट से पटे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के माहौल में विशुद्ध पारंपरिक देसी निर्माण सामग्री से तैयार यह आवास आजकल बड़ी संख्या में लोगों को अपनी बनावट से आकर्षित कर रहा है।

## सीमेंट और कंक्रीट के दौर में पुरानी निर्माण शैली की वापसी
मौजूदा दौर में जब आवास निर्माण का दायरा पूरी तरह सीमेंट, बजरी और लोहे की छड़ों तक सिमट चुका है, तब यह आवास पुरखों की जीवनशैली और पारंपरिक भारतीय वास्तुकला की याद दिलाता है। पूर्वजों के समय में रिहायशी ठिकाने बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर सुलभ मिट्टी, धूप में पकाई गई ईंटों, पत्थर और लकड़ी की बल्लियों का उपयोग आम बात थी। इस भवन में मिट्टी की मोटी दीवारें खड़ी की गई हैं, जो प्राकृतिक रोधक का काम करती हैं और तेज गर्मी के मौसम में भी अंदरूनी हिस्से में ठंडक बनाए रखती हैं। आज के यांत्रिक युग में जब कृत्रिम ठंडक पर निर्भरता बढ़ चुकी है, यह निर्माण पर्यावरण के अनुकूल प्राचीन तकनीक का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है।

## वास्तुविदों की सोच और तीन दशक पुराना इतिहास
बाहर से देखने पर भले ही यह परिसर एकदम नया सा प्रतीत हो, लेकिन इसकी वास्तविक पृष्ठभूमि लगभग 30 साल पुरानी है। पर्यावरण केंद्रित उपक्रम इकोप्लोर की संस्थापक प्रेरणा प्रसाद के अनुसार, इस विशिष्ट ढांचे की परिकल्पना और निर्माण प्रसिद्ध वास्तुकार रेवती कामथ और बसंत कामथ ने किया था। समय बीतने के साथ अब इस पूरे परिसर को 'वनभोज' नाम देकर एक निजी संग्रहालय के रूप में संरक्षित और संचालित किया जा रहा है। यहां आने वाले आगंतुकों को न केवल इस अनोखे घर का दीदार करने का अवसर मिलता है, बल्कि वे इसकी रचना प्रक्रिया और पारंपरिक कारीगरी की बारीकियों को भी करीब से समझ सकते हैं।

## भीषण गर्मी में प्राकृतिक ठंडक का अनुभव
इस मिट्टी के घर की सबसे बड़ी व्यावहारिक विशेषता इसका आंतरिक वातावरण है। शहर की तपती धूप से निकलकर जैसे ही कोई व्यक्ति इस परिसर की देहरी पार करता है, उसे तापमान में साफ अंतर महसूस होता है। प्रेरणा प्रसाद बताती हैं कि घर के अंदर का पारा बाहरी वातावरण के मुकाबले काफी कम रहता है। इसके लिए किसी कृत्रिम उपकरण या ऊर्जा खपत की आवश्यकता नहीं पड़ती, बल्कि दीवारों में लगी मिट्टी और पत्थरों की स्वाभाविक तापीय क्षमता ही अंदरूनी वातावरण को सुहावना बनाए रखती है। बिना किसी दिखावे या आधुनिक चकाचौंध के यह सादा ढांचा अपनी स्वाभाविक बनावट से हर दर्शक पर गहरा प्रभाव छोड़ता है।

## विद्यार्थियों और प्रकृति प्रेमियों के लिए ज्ञान का केंद्र
इस परिसर में केवल आम सैलानी या शांति की तलाश में निकले परिवार ही नहीं आ रहे, बल्कि वास्तुकला महाविद्यालयों के छात्र और स्कूली बच्चे भी लगातार पहुंच रहे हैं। प्रेरणा प्रसाद का कहना है कि युवा पीढ़ी और अध्ययनरत विद्यार्थियों के लिए यह स्थान पारंपरिक देसी निर्माण तकनीकों को जमीनी स्तर पर परखने की जीवंत प्रयोगशाला जैसा है। सीमेंट के बिना मात्र मिट्टी, लकड़ी और पत्थरों के सहारे एक टिकाऊ व मजबूत घर कैसे खड़ा किया जा सकता है, यह देखना भावी योजनाकारों और शिल्पकारों के लिए बेहद प्रेरणादायक साबित हो रहा है।

## एनसीआर के प्रदूषण और शोरगुल से दूर स्वच्छ हवा का कोना
दिल्ली और फरीदाबाद समेत समूचे एनसीआर में वायु प्रदूषण और जहरीली हवा एक विकट चुनौती बनी रहती है। ऐसे माहौल में वनभोज का हरा-भरा और प्राकृतिक उपादानों से रचा परिवेश शहर की भीड़ और धुंध से एक दुर्लभ राहत देता है। राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता बिगड़ने के दिनों में भी इस हरित परिसर का वातावरण अपेक्षाकृत स्वच्छ और ताजा बना रहता है। चमक-दमक भरी बहुमंजिला इमारतों के समानांतर यह मिट्टी का घर उन तमाम शहरी नागरिकों के लिए एक सुखद अनुभव है जो अपनी जड़ों और प्रकृति के करीब कुछ पल बिताना चाहते हैं।

## इसका आप पर असर
कंक्रीट पर निर्भर आधुनिक शहरी जीवनशैली के दौर में यह ढांचा पर्यावरण-अनुकूल आवास और प्राकृतिक जीवन के व्यावहारिक विकल्पों को दर्शाता है।

- **भारत में:** देश भर में बढ़ते तापमान और निर्माण लागत के बीच यह स्थल साबित करता है कि पारंपरिक मिट्टी और पत्थरों की वास्तुकला से ऊर्जा की भारी बचत संभव है। पर्यावरण-सजग नागरिक और गृह निर्माता इसे देखकर कम बजट और प्राकृतिक शीतलन वाले मकानों की योजना बना सकते हैं।
- **फरीदाबाद और एनसीआर में:** प्रदूषण और कंक्रीट के फैलाव से जूझ रहे स्थानीय लोगों के लिए सूरजकुंड का यह परिसर स्वच्छ वातावरण में सप्ताहांत बिताने का सुलभ केंद्र है। दिल्ली-एनसीआर के परिवार और वास्तुकला के छात्र यहां पहुंचकर बिना दूर यात्रा किए प्राकृतिक जीवनशैली का अनुभव ले सकते हैं।
- **विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए:** कॉलेज और स्कूल के विद्यार्थियों को पारंपरिक भारतीय भवन निर्माण तकनीक को किताबों से बाहर प्रत्यक्ष देखने का मौका मिलता है। वे समझ सकते हैं कि शून्य कृत्रिम ऊर्जा के साथ घर के अंदर तापमान को कैसे नियंत्रित रखा जा सकता है।
- **पर्यावरण-सचेत गृहस्वामियों के लिए:** यह मॉडल दिखाता है कि महंगे एयर कंडीशनर पर निर्भर रहने के बजाय मोटी मिट्टी की दीवारों से गर्मी रोकी जा सकती है। इससे लंबे समय में बिजली बिल और कार्बन उत्सर्जन दोनों में बड़ी कटौती की जा सकती है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह विशिष्ट निर्माण आधुनिक तकनीक के विकल्प के रूप में पारंपरिक भारतीय वास्तुकला के वैज्ञानिक महत्व को उजागर करने और उसे संरक्षित करने के उद्देश्य से अस्तित्व में आया।

- **मूल निर्माण का उद्देश्य:** प्रसिद्ध वास्तुकार रेवती कामथ और बसंत कामथ ने लगभग 30 वर्ष पहले इस आवास को देसी मिट्टी, लकड़ी और पत्थरों के वैज्ञानिक उपयोग को जमीन पर साकार करने के लिए तैयार किया था।
- **प्राकृतिक शीतलन की जरूरत:** आधुनिक सीमेंट निर्माण गर्मी को सोखकर अंदर तपन बढ़ाता है, जबकि मिट्टी की मोटी दीवारें और प्राकृतिक पत्थर तापीय अवरोधक बनकर अंदर का तापमान कम रखते हैं।
- **निजी संग्रहालय में रूपांतरण:** इकोप्लोर की संस्थापक प्रेरणा प्रसाद की पहल से इस ऐतिहासिक ढांचे को 'वनभोज' नाम देकर एक संग्रहालय का रूप दिया गया ताकि भावी पीढ़ी और शोधकर्ता इसे देखकर सीख सकें।
- **प्रदूषण मुक्त वातावरण की चाह:** एनसीआर के लगातार बिगड़ते पर्यावरण के बीच प्राकृतिक सामग्रियों और घने वृक्षों से आच्छादित यह परिसर स्वच्छ हवा और शांत अनुभव देने के उद्देश्य से विकसित किया गया है।

## सवाल-जवाब

### 1. वनभोज मड हाउस फरीदाबाद में कहां स्थित है?
यह अनोखा घर फरीदाबाद के सूरजकुंड इलाके में ऊंची इमारतों और औद्योगिक वातावरण के बीच स्थित है।

### 2. इस मिट्टी के घर को किसने और कब डिजाइन किया था?
इसे लगभग 30 साल पहले प्रसिद्ध वास्तुकार रेवती कामथ और बसंत कामथ ने तैयार किया था।

### 3. इस घर के निर्माण में किन सामग्रियों का इस्तेमाल हुआ है?
इस ढांचे को सीमेंट के बजाय मुख्य रूप से प्राकृतिक मिट्टी, पत्थरों और लकड़ी का उपयोग करके बनाया गया है।

### 4. गर्मी के मौसम में भी यह घर ठंडा क्यों रहता है?
मिट्टी की मोटी दीवारें और पत्थर प्राकृतिक रोधक का काम करते हैं, जिससे अंदर का तापमान बाहर की तुलना में कम बना रहता है।

### 5. वर्तमान में यह परिसर किस रूप में संचालित हो रहा है?
अब इसे 'वनभोज' नाम से एक निजी संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया है, जहां लोग आकर इसकी बनावट देख और समझ सकते हैं।

### 6. यहां मुख्य रूप से किस तरह के लोग और समूह आते हैं?
यहां परिवार, शांति चाहने वाले सैलानी, पर्यावरण प्रेमी, वास्तुकला महाविद्यालयों के छात्र और स्कूली बच्चे पहुंचते हैं।

## प्रेरणा और सबक
तीन दशक पुराने इस मिट्टी के घर की सफलता साबित करती है कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलने वाले पारंपरिक विचार कभी पुराने नहीं होते।

- **जड़ों से जुड़ने की सीख:** पुरखों की मिट्टी और पत्थर वाली निर्माण तकनीकों को आधुनिक जीवन में अपनाकर पर्यावरण के अनुकूल स्थाई जीवनशैली बनाई जा सकती है।
- **सादा जीवन और प्रभावशीलता:** चकाचौंध और कृत्रिम दिखावे के बिना भी साधारण प्राकृतिक चीजें लोगों को गहराई से प्रभावित और प्रेरित कर सकती हैं।
- **धैर्य और दूरदर्शिता:** 30 साल पहले पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखकर किया गया कार्य आज भी नई पीढ़ी के लिए एक अनूठा शैक्षणिक संग्रहालय बनकर प्रेरणा दे रहा है।

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