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  "type": "article",
  "title": "तलाक होने पर क्या पति की जायदाद में पत्नी को सीधे हक मिलता है, जानें गुजारा भत्ता और 70 फीसदी हिस्सेदारी का कानूनी सच",
  "summary": "तलाक के मामलों में पति की संपत्ति में हिस्सेदारी और भरण पोषण को लेकर कानून में कोई एक तय पैमाना नहीं है। फरीदाबाद सेक्टर-12 कोर्ट के वकील डॉ. दीपु सिंह रावत ने साफ किया कि 70 फीसदी संपत्ति देने की बात केवल अफवाह है और फैसला दोनों पक्षों की आर्थिक हैसियत के आधार पर अदालत तय करती है।",
  "content": "वैवाहिक रिश्तों में अलगाव और कानूनी तलाक के दौरान पति की चल-अचल मिल्कियत को लेकर लोगों के बीच कई तरह के भ्रम फैले रहते हैं। अक्सर आम चर्चाओं में यह दावा किया जाता है कि तलाक के बाद महिला को पति की मिल्कियत में से सीधा हिस्सा मिलता है या फिर पति को अपनी कुल जायदाद का सत्तर फीसदी तक छोड़ना पड़ता है। वास्तविकता यह है कि भारतीय पारिवारिक कानून में ऐसा कोई निश्चित प्रतिशत तय नहीं है, बल्कि अदालतें हर विवाद में दोनों पक्षों की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर फैसला लेती हैं।\n\nजायदाद में सीधे मालिकाना हक का कोई सामान्य प्रावधान नहीं\nफरीदाबाद सेक्टर-12 कोर्ट के पूर्व वाइस प्रेसिडेंट, डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन, एडवोकेट डॉ. दीपु सिंह रावत ने इस कानूनी पहलू की बारीकियों पर प्रकाश डाला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल वैवाहिक संबंध विच्छेद होने से महिला को पुरुष के नाम दर्ज मिल्कियत में अपने आप मालिकाना अधिकार हासिल नहीं हो जाता।\n\nकानूनी रूप से महिला को अपने और आश्रितों के जीवन यापन हेतु भरण पोषण मांगने का पूरा अधिकार रहता है। यदि दोनों पक्षों के बीच आपसी बातचीत के बाद कोई औपचारिक समझौता होता है, और पति गुजारा भत्ते अथवा एकमुश्त निपटारे के तहत कोई मकान या जमीन देने पर रजामंदी जताता है, तब वह अचल संपत्ति समझौते के दस्तावेज का हिस्सा बन सकती है। अन्यथा अदालतें सीधे तौर पर पति के नाम की संपत्ति में से टुकड़ा काटकर पत्नी के नाम दर्ज करने का सामान्य आदेश नहीं देतीं।\n\nसत्तर प्रतिशत संपत्ति देने की बात महज एक कोरी अफवाह\nइंटरनेट और अनौपचारिक चर्चाओं में अक्सर यह भ्रांति देखने को मिलती है कि वैवाहिक अलगाव के समय पुरुष को अपनी सत्तर फीसदी दौलत पत्नी को सौंपनी ही पड़ेगी। इस भ्रामक धारणा को खारिज करते हुए डॉ. दीपु सिंह रावत ने बताया कि विधान में 70 प्रतिशत जायदाद सौंपने का कोई अनिवार्य नियम मौजूद नहीं है।\n\nस्थायी गुजारा भत्ता या मासिक भरण पोषण तय करने के लिए कोई निश्चित गणितीय फार्मूला नहीं बनाया गया है। पारिवारिक न्यायालय दोनों पक्षों की सामाजिक स्थिति, जीवन स्तर, देनदारियों और वित्तीय क्षमताओं का समग्र मूल्यांकन करने के उपरांत ही उचित रकम निर्धारित करती है।\n\nअमीर और साधारण नागरिक दोनों के लिए कानून समान\nअक्सर यह धारणा भी बन जाती है कि भरण पोषण के कायदे केवल बेहद साधन संपन्न या हाई प्रोफाइल जोड़ों पर लागू होते हैं। डॉ. दीपु सिंह रावत के अनुसार, देश की न्यायिक व्यवस्था में आम व्यक्ति अथवा धनवान व्यक्ति के लिए अलग-अलग नियम निर्धारित नहीं हैं।\n\nकानून की नजर में सभी नागरिक एक समान दृष्टि से देखे जाते हैं। जब भी गुजारा भत्ते की अर्जी अदालत में पहुंचती है, तो न्यायाधीश दोनों पक्षों की वास्तविक कमाई, आजीविका के साधन और पारिवारिक जिम्मेदारियों को तौलकर अंतिम निर्णय पर पहुंचते हैं।\n\nकामकाजी होने के बावजूद मिल सकता है गुजारा भत्ता\nबहुत से लोगों का मानना है कि यदि पत्नी खुद नौकरीपेशा है या व्यवसाय करती है, तो उसे कानूनी तौर पर कोई आर्थिक सहायता नहीं मिल सकती। डॉ. दीपु सिंह रावत ने स्पष्ट किया कि केवल पत्नी के काम करने भर से गुजारा भत्ते की याचिका स्वतः निरस्त नहीं हो जाती।\n\nअदालत इस तथ्य की पड़ताल करती है कि कामकाजी पत्नी की व्यक्तिगत आमदनी कितनी है और क्या वह रकम गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए पर्याप्त है। यदि उसकी कमाई पति की तुलना में बेहद कम है या जरूरतें पूरी करने में असमर्थ है, तो न्यायालय दोनों की आर्थिक विषमता को संतुलित करने के लिए अंतरिम या स्थायी मदद का निर्देश दे सकता है।\n\nआपसी रजामंदी से तलाक में कैसे तय होता है वित्तीय निपटारा\nविवादों को लंबा खींचने के बजाय जब दोनों पक्ष आपसी सहमति से अलग होना चुनते हैं, तो उसकी प्रक्रिया हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के अंतर्गत संचालित होती है। डॉ. दीपु सिंह रावत ने बताया कि धारा 13B के तहत दोनों पक्ष अपनी सुविधानुसार बैठकर भरण पोषण या एकमुश्त समाधान की राशि तय कर सकते हैं।\n\nइस कानूनी प्रक्रिया में दोनों साझेदारों की स्वेच्छा और आपसी सहमति ही प्राथमिक आधार होती है। तय की गई शर्तों को समझौते के प्रारूप में शामिल कर अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, जिसके आधार पर न्यायालय तलाक की डिक्री जारी करता है।\n\nसंतान की परवरिश और उसके कानूनी अधिकार\nतलाक के मुकदमों में सबसे संवेदनशील मसला बच्चों के भविष्य का होता है। डॉ. दीपु सिंह रावत के अनुसार, बच्चे का संरक्षण किसके पास रहेगा, यह पहलू न्यायालय के फैसले में बहुत अहम भूमिका निभाता है।\n\nयदि नाबालिग बच्चे की कस्टडी मां को मिलती है, तो वह उसकी रोजमर्रा की देखभाल जरूर करती है, लेकिन पिता अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता। बच्चे का अपने पिता से शिक्षा, स्वास्थ्य और भरण पोषण का खर्च पाने का कानूनी हक पूरी तरह बरकरार रहता है। बच्चों की जरूरतों को देखते हुए अदालत पिता को नियमित खर्च वहन करने के कड़े आदेश पारित कर सकती है।\n\nसंपत्ति छिपाने या दूसरे के नाम करने से नहीं बचेगी जिम्मेदारी\nकुछ लोग यह मान लेते हैं कि यदि वे अपने नाम पर कोई संपत्ति नहीं रखेंगे, तो उन्हें गुजारा भत्ता देने की बाध्यता से छूट मिल जाएगी। इस गलतफहमी को दूर करते हुए डॉ. दीपु सिंह रावत ने बताया कि केवल अपनी मिल्कियत दूसरों के नाम कराने से भरण पोषण देने के वैधानिक दायित्व से बचा नहीं जा सकता।\n\nभरण पोषण का निर्धारण केवल इस एक बात पर टिका नहीं होता कि रजिस्टर्ड संपत्ति किसके नाम पर दर्ज है। अदालतें पुरुष की कमाई के वास्तविक स्रोत, उसकी शैक्षणिक योग्यता, वित्तीय पृष्ठभूमि और केस के तमाम व्यावहारिक तथ्यों की गहराई से जांच करती हैं ताकि वास्तविक न्याय सुनिश्चित किया जा सके।\n\nइसका आप पर असर\nयह कानूनी व्याख्या तलाक के मुकदमों में शामिल या वैवाहिक विवादों से जूझ रहे लोगों के अधिकारों और जिम्मेदारियों को स्पष्ट करती है।\n\n• भारत में: तलाक के समय पति की कुल संपत्ति का 70 प्रतिशत सौंपने का कोई कानूनी नियम नहीं है। गुजारा भत्ता या वित्तीय निपटारा दोनों पक्षों की आमदनी और परिस्थितियों के आधार पर ही अदालत तय करती है।\n• कामकाजी महिलाओं के लिए: नौकरी करने मात्र से भरण पोषण की पात्रता अपने आप समाप्त नहीं हो जाती। यदि महिला की निजी कमाई पर्याप्त नहीं है, तो अदालत पुरुष की आय के अनुपात में अतिरिक्त सहायता तय कर सकती है।\n• बच्चों की देखभाल के लिए: कस्टडी मां के पास होने पर भी पिता की वित्तीय जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। पिता को बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी परवरिश का खर्च नियमानुसार देना होगा।\n• संपत्ति छिपाने वालों के लिए: अपने नाम पर संपत्ति न रखने से गुजारा भत्ते की कानूनी देनदारी खत्म नहीं होती। अदालत व्यक्ति की वास्तविक कमाई की क्षमता और सामाजिक स्थिति को देखकर ही अंतिम आदेश जारी करती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह स्पष्टीकरण सोशल मीडिया और आम चर्चाओं में चल रही उन गलत धारणाओं के चलते सामने आया है, जहां तलाक के समय संपत्ति बंटवारे को लेकर फर्जी नियम प्रचारित किए जा रहे थे।\n\n• भ्रामक सूचनाओं का प्रसार: इंटरनेट पर यह अफवाह लगातार फैल रही थी कि तलाक होने पर पति को अपनी 70 फीसदी जायदाद पत्नी को देनी ही पड़ती है। इस निराधार दावे ने अलग हो रहे जोड़ों के बीच बेवजह का कानूनी तनाव और भ्रम पैदा किया।\n• कानूनी प्रावधानों की गलत समझ: लोग गुजारा भत्ते और संपत्ति में सीधे मालिकाना हक के बीच के अंतर को नहीं समझ पा रहे थे। कानून में भरण पोषण जीवन यापन की सुरक्षा के लिए है, न कि पति की पुश्तैनी या निजी संपत्ति का स्वत: बंटवारा करने के लिए।\n• व्यावहारिक न्यायिक प्रक्रिया: पारिवारिक अदालतों में मुकदमों की बढ़ती संख्या के बीच लोग अक्सर बिना कानूनी सलाह के धारणाएं बना लेते हैं। इसीलिए बार एसोसिएशन के अनुभवी अधिवक्ता ने तथ्यों के आधार पर कानूनी स्थिति को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. क्या तलाक के समय पति को अपनी 70 प्रतिशत संपत्ति पत्नी को देनी होती है?\nनहीं, कानून में 70 प्रतिशत संपत्ति देने का ऐसा कोई अनिवार्य नियम या तय फार्मूला नहीं है। गुजारा भत्ते की राशि दोनों पक्षों की वास्तविक वित्तीय स्थिति देखकर अदालत तय करती है।\n\n2. क्या पत्नी को पति की संपत्ति में सीधे मालिकाना हक मिलता है?\nकेवल पत्नी होने के आधार पर पति के नाम दर्ज संपत्ति में सीधा हिस्सा पाने का कोई सामान्य कानूनी प्रावधान नहीं है। हालांकि आपसी समझौते के तहत दोनों पक्ष संपत्ति देने पर राजी हो सकते हैं।\n\n3. यदि पत्नी नौकरी करती है, तो क्या उसे भरण पोषण मिल सकता है?\nहां, केवल कमाने से गुजारा भत्ते का दावा खत्म नहीं होता। अदालत यह देखती है कि उसकी कमाई उसके गरिमापूर्ण जीवन यापन के लिए पर्याप्त है या नहीं।\n\n4. आपसी सहमति से तलाक में भरण पोषण की रकम कैसे तय की जाती है?\nहिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के अंतर्गत दोनों पक्ष आपसी विचार-विमर्श और सहमति से निपटारे की रकम तय करते हैं।\n\n5. बच्चे की कस्टडी मां के पास होने पर खर्च कौन उठाएगा?\nबच्चा मां के पास होने पर भी पिता से भरण पोषण पाने का उसका कानूनी अधिकार रहता है, और अदालत पिता को खर्च वहन करने का आदेश दे सकती है।\n\n6. अगर पति अपने नाम पर कोई संपत्ति न रखे, तो क्या वह गुजारा भत्ता देने से बच सकता है?\nनहीं, संपत्ति अपने नाम न रखने से कानूनी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। अदालत पति की वास्तविक कमाई और क्षमता के आधार पर फैसला लेती है।",
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  "category": "हरियाणा",
  "publishedAt": "2026-10-02",
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