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  "type": "article",
  "title": "व्हीलचेयर पर सिमटी जिंदगी को खेलों में दी उड़ान, फरीदाबाद के प्रणव सूरमा की प्रेरणादायक कहानी",
  "summary": "सोलह साल की उम्र में हुए एक गंभीर हादसे के बाद व्हीलचेयर तक सीमित रहने वाले प्रणव सूरमा ने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर खेल जगत में देश का नाम रोशन किया है।",
  "content": "जीवन की सबसे बड़ी बाधाओं को दरकिनार करते हुए फरीदाबाद के पैरा एथलीट प्रणव सूरमा ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर सफलता के नए मुकाम हासिल किए हैं। महज सोलह वर्ष की कच्ची उम्र में उन्हें एक भयानक दुर्घटना का सामना करना पड़ा था, जिसकी वजह से उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई। उस वक्त डॉक्टरों ने यह साफ कह दिया था कि अब उनका दोबारा अपने पैरों पर खड़ा हो पाना बेहद मुश्किल है और उन्हें अपनी बाकी की जिंदगी व्हीलचेयर पर ही गुजारनी होगी। ऐसी कठिन और नाउम्मीदी भरी परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और हर चुनौती का डटकर मुकाबला किया।\n\n \n\nहादसे से लेकर खेलों के मैदान तक का सफर\n दुर्घटना के बाद का समय प्रणव और उनके पूरे परिवार के लिए किसी बड़े इम्तिहान से कम नहीं था। शुरुआत में यह समझ पाना बेहद कठिन था कि आने वाले समय में जिंदगी किस दिशा में आगे बढ़ेगी। तमाम मुश्किलों और निराशा के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू की और आगे चलकर नौकरी भी की। हालांकि उनके भीतर खेल के प्रति एक अलग ही जुनून था, जिसने उन्हें साल 2018 में पैरा एथलेटिक्स की दुनिया में कदम रखने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत में उन्होंने घरेलू स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया, लेकिन बीच में कोरोना महामारी के कारण उनकी खेल यात्रा में कुछ बाधा जरूर आई। इसके बाद साल 2022 में उन्होंने कोच नवल के मार्गदर्शन में एक बार फिर से अपनी ट्रेनिंग की शुरुआत की और यहीं से उनके करियर को एक नई और सही दिशा मिल गई।\n\n \n\nरिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन और अंतरराष्ट्रीय मंच पर सफलता\n कड़ी मेहनत और निरंतर अभ्यास का ही परिणाम था कि प्रणव ने साल 2023 में आयोजित एशियन पैरा गेम्स में पहली बार भाग लिया और क्लब थ्रो स्पर्धा में स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसके बाद उन्होंने साल 2024 में पेरिस पैरालंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया और क्लब थ्रो स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए रजत पदक जीता। हाल ही में उन्होंने एशियन पैरा गेम्स-2026 में दो स्वर्ण पदक जीतकर अपनी इस सफलता के सिलसिले को और आगे बढ़ाया है। उन्होंने क्लब थ्रो एफ-51 स्पर्धा में 32.87 मीटर का बेहतरीन थ्रो फेंककर नया गेम्स रिकॉर्ड कायम किया, जबकि डिस्कस थ्रो स्पर्धा में 11.66 मीटर का प्रदर्शन करते हुए एशियाई रिकॉर्ड अपने नाम किया और स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया।\n\n \n\nमानसिक दृढ़ता और सकारात्मक सोच का महत्व\n किसी भी बड़े और अंतरराष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट में उतरने से पहले खिलाड़ियों के मन में तमाम तरह की उथल-पुथल चलती रहती है। पहली बार जब कोई खिलाड़ी वैश्विक मंच पर उतरता है, तो उसे खुशी के साथ-साथ घबराहट का भी अहसास होता है। प्रणव का मानना है कि इस तरह के दबाव से निपटने के लिए शारीरिक ताकत के साथ-साथ मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत होना भी उतना ही आवश्यक है। वह हमेशा अपने प्रदर्शन को लेकर सकारात्मक कल्पना करते थे और अपने भीतर कभी भी नकारात्मक विचारों को नहीं आने देते थे। अब इन दोहरी स्वर्ण सफलताओं के बाद उनका पूरा ध्यान आगामी वर्ल्ड चैंपियनशिप और पैरालंपिक खेलों की तैयारियों पर केंद्रित है।\n\n \n\nपरिवार का साथ और पिता का अटूट समर्थन\n इस पूरे सफर में प्रणव के पिता संजीव शर्मा का सहयोग उनके लिए सबसे बड़ा संबल रहा है। एक पिता के रूप में वह अपने बेटे के हर अभ्यास सत्र के दौरान साथ रहते थे और उसकी जरूरत का पूरा ध्यान रखते थे। खानपान के मामले में भी परिवार पूरी तरह सतर्क रहता है और प्रणव बाहर के खाने के बजाय घर का बना भोजन ही पसंद करते हैं। संजीव शर्मा का कहना है कि जब अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराता है और देश का राष्ट्रगान गूंजता है, तो उस पल को शब्दों में बयां कर पाना किसी के लिए भी मुसंभल नहीं होता। हालांकि, जब प्रणव प्रतियोगिता के लिए रवाना हो रहे थे, उसी दौरान उनके दादाजी का निधन हो गया था, जिससे परिवार और खुद प्रणव काफी आहत थे, क्योंकि दादाजी से उनका जुड़ाव बहुत गहरा था। इसके बावजूद उन्होंने अपने दुख को पीछे छोड़ते हुए देश के लिए खेलने का कठिन फैसला लिया और अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई।\n\n \n\nदेश के शीर्ष नेतृत्व से मिल चुका है सम्मान\n अपनी खेल उपलब्धियों के दम पर प्रणव देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी दो बार मुलाकात कर चुके हैं। उनका मानना है कि सरकार की तरफ से मिलने वाला समर्थन और प्रोत्साहन खिलाड़ियों के भीतर एक नया जोश भर देता है। उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस बार एशियन पैरा गेम्स में मिली ऐतिहासिक सफलता के बाद उन्हें प्रधानमंत्री से एक बार फिर मिलने का सौभाग्य प्राप्त होगा। उनकी यह संघर्ष गाथा इस बात की सबसे बड़ी मिसाल है कि अगर इंसान के भीतर सच्ची लगन और कुछ कर दिखाने का जज्बा हो, तो वह हर नामुमकिन चीज को मुमकिन बना सकता है।\n\nइसका आप पर असर\nप्रणव सूरमा की यह उपलब्धि देश के दिव्यांग युवाओं और उभरते हुए एथलीटों के लिए खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने का बड़ा संदेश देती है।\n\n• भारत में: यह सफलता देश के पैरा एथलीटों के मनोबल को ऊंचा करती है और सरकारी सहयोग के महत्व को रेखांकित करती है। युवा खिलाड़ियों को कठिन परिस्थितियों के बावजूद खेलों में करियर बनाने की प्रेरणा मिलती है।\n• फरीदाबाद में: स्थानीय युवाओं और खेल प्रेमियों के लिए यह गर्व का विषय है कि उनके शहर के एक एथलीट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन किया है। इससे क्षेत्रीय स्तर पर खेल बुनियादी ढांचे और सुविधाओं को बेहतर बनाने की मांग को और बल मिल सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nप्रणव सूरमा की यह सफलता अचानक नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे वर्षों का कठिन परिश्रम, सही कोचिंग और अटूट पारिवारिक सहयोग रहा है।\n\n• दुर्घटना और शारीरिक चुनौती: सोलह साल की उम्र में रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगने के बाद उन्हें जीवनभर व्हीलचेयर पर रहने की डॉक्टरों की आशंका का सामना करना पड़ा। इस विपरीत परिस्थिति ने उन्हें मानसिक रूप से और अधिक मजबूत बनने के लिए प्रेरित किया।\n• प्रशिक्षण और सही मार्गदर्शन: साल 2018 में पैरा एथलेटिक्स में शुरुआत करने के बाद, कोविड-19 महामारी के कारण उनकी यात्रा में कुछ रुकावट आई। हालांकि, साल 2022 में कोच नवल के मार्गदर्शन में दोबारा अभ्यास शुरू करने से उनके खेल में तकनीकी सुधार हुआ।\n• मानसिक दृढ़ता: बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों के दबाव से निपटने के लिए उन्होंने सकारात्मक सोच और मानसिक संतुलन बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया।\n• परिवार का समर्थन: उनके पिता संजीव शर्मा ने उनके खानपान, ट्रेनिंग और हर जरूरत में लगातार साथ देकर इस सफर को मुमकिन बनाया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. प्रणव सूरमा ने एशियन पैरा गेम्स में कौन सा रिकॉर्ड बनाया?\nप्रणव ने क्लब थ्रो एफ-51 में 32.87 मीटर का थ्रो कर गेम्स रिकॉर्ड बनाया और डिस्कस थ्रो में 11.66 मीटर के प्रदर्शन के साथ एशियाई रिकॉर्ड स्थापित किया।\n\n2. प्रणव सूरमा को किस दुर्घटना का सामना करना पड़ा था?\nवर्ष 2011 में हुए एक हादसे में उनकी रीढ़ की हड्डी और दाहिने पैर में गंभीर चोट आई थी, जिसके बाद उन्हें व्हीलचेयर पर रहना पड़ा।\n\n3. प्रणव ने पैरा एथलेटिक्स की शुरुआत कब की थी?\nप्रणव ने वर्ष 2018 में पैरा एथलेटिक्स की शुरुआत की थी और बाद में वर्ष 2022 में कोच नवल के मार्गदर्शन में अभ्यास फिर से शुरू किया।\n\n4. पेरिस पैरालंपिक में प्रणव ने कौन सा पदक जीता था?\nप्रणव ने पेरिस पैरालंपिक 2024 में देश का प्रतिनिधित्व करते हुए क्लब थ्रो स्पर्धा में रजत पदक जीता था।\n\n5. प्रणव के खेल सफर में उनके पिता की क्या भूमिका रही है?\nउनके पिता संजीव शर्मा उनकी ट्रेनिंग के दौरान साथ रहे, उनके खानपान का विशेष ध्यान रखा और हर जरूरत में पूरा सहयोग दिया।\n\n6. प्रणव कितनी बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिल चुके हैं?\nप्रणव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अब तक दो बार मिल चुके हैं और उन्हें सरकार से पूरा प्रोत्साहन मिला है।\n\nप्रेरणा और सबक\nप्रणव सूरमा का जीवन संघर्ष और सफलता की एक ऐसी मिसाल है जो हर व्यक्ति को मुश्किल समय में अडिग रहना सिखाती है।\n\n• विपरीत परिस्थितियों में हार न मानना: जीवन में आने वाली गंभीर बाधाओं के बावजूद अपने लक्ष्यों के प्रति समर्पित रहना सबसे जरूरी है।\n• मानसिक मजबूती: शारीरिक चुनौतियों के साथ-साथ मानसिक और भावनात्मक संतुलन बनाए रखना सफलता की कुंजी है।\n• परिवार का सहयोग: कठिन समय में परिजनों का साथ और उनका अटूट विश्वास इंसान को बड़ी से बड़ी मंजिल तक पहुंचा सकता है।\n• सकारात्मक सोच: हर स्थिति में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाकर ही नकारात्मकता को हराया जा सकता है।",
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  "category": "हरियाणा",
  "publishedAt": "2026-10-28",
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