# अमेरिकी राजनीति में बढ़ती कड़वाहट की जड़ में विचारधारा नहीं, गहरा अस्तित्व-भय है

> नए शोध का दावा है कि अमेरिका की सबसे तीखी राजनीतिक लड़ाइयों के पीछे विचारधारा नहीं, बल्कि सुरक्षा, अस्तित्व और अर्थ को लेकर एक साझा गहरा डर है, और यही डर कमेंट सेक्शन की आक्रामकता की असली वजह हो सकता है।

**Type:** article · **Category:** स्वास्थ्य · **Published:** 2026-08-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/health/american-rajaniti-men-barhati-karavahata-ki-jara-men-vicharadhara-nahin-gahara-astitva-bhaya-hai-13396 · **Language:** Hindi
**Tags:** अस्तित्वगत चिंता, राजनीतिक ध्रुवीकरण, सोशल मीडिया विवाद, पॉल टिलिच, कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी, एक्सेप्टेंस एंड कमिटमेंट थेरेपी, आक्रामकता पर शोध, अमेरिकी राजनीति

सोशल मीडिया पर हाथ में फोन लेकर स्क्रॉल करते ही अक्सर एक जैसा नजारा दिखता है, एक-दूसरे से बिल्कुल उलट राजनीतिक विचार रखने वाले दोस्त, और कमेंट्स में सिर्फ असहमति नहीं बल्कि सीधी गाली-गलौज और चरित्र पर हमले। हाल ही में हुए एक सर्वे में भी यही बात सामने आई कि ज्यादातर अमेरिकी अब मानते हैं कि उनका देश अपने मौजूदा राजनीतिक मतभेदों से उबर ही नहीं पाएगा। लेकिन बीते 20 साल से बचपन के दर्दनाक अनुभवों और अस्तित्वगत चिंता पर शोध कर रहीं मानव विकास और पारिवारिक अध्ययन की एक शोधकर्ता का कहना है कि इस कड़वाहट के पीछे विचारधारा नहीं बल्कि एक गहरा डर छिपा है।

 

## झगड़े के पीछे छिपा डर

शोधकर्ता ने अपनी सोशल मीडिया फीड पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े पोस्ट पढ़ते हुए एक अजीब बात नोटिस की, दोनों पक्ष भले अलग-अलग छोर से बात कर रहे हों, लेकिन असल में दोनों एक जैसी भावना जाहिर कर रहे थे, यानी अस्तित्व को लेकर गहरा डर। आमतौर पर राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए विचारधारा, मीडिया के अपने-अपने दायरे या समूह की पहचान को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन अस्तित्वगत चिंता एक ऐसा पहलू है जिस पर बहुत कम ध्यान दिया गया है, जबकि यही ऑनलाइन की कई तीखी बहसों की जड़ हो सकता है।

 

## आखिर क्या है यह "अस्तित्वगत चिंता"

इस अवधारणा पर दार्शनिक सदियों से बहस करते आए हैं, लेकिन जिस शोध ढांचे पर यह अध्ययन टिका है, वह 20वीं सदी के मध्य के दार्शनिक पॉल टिलिच से जुड़ा है। उनकी किताब द करेज टू बी में इंसान के इस बुनियादी डर के तीन पहलू बताए गए हैं, पहला भाग्य और मौत का डर यानी अपने अस्तित्व के खत्म होने और भविष्य की अनिश्चितता को लेकर चिंता, दूसरा खालीपन और अर्थहीनता का डर यानी जिंदगी के गहरे मकसद को लेकर शक, और तीसरा अपराधबोध और निंदा का डर यानी नैतिक रूप से गलत होने या अपनी नैतिक पहचान पर खतरे की आशंका। मतलब यह कि अस्तित्वगत चिंता दरअसल मौत, नैतिक जिम्मेदारी और जिंदगी के मकसद की तलाश से इंसान का सीधा सामना है।

यह डर सोचने से कहीं ज्यादा आम है। कई अध्ययनों में शामिल 75% से 86% लोगों ने माना कि उन्हें इनमें से कम से कम एक तरह की अस्तित्वगत चिंता जरूर होती है। जिन लोगों में यह चिंता ज्यादा गहरी पाई गई, उनमें डिप्रेशन के लक्षण और आत्महत्या के विचार जैसी मानसिक सेहत की खराब स्थितियां भी ज्यादा देखी गईं। जिन लोगों ने किसी जानलेवा हादसे का सामना किया हो, उनमें यह आंकड़ा और बढ़ जाता है, एक अध्ययन के मुताबिक किसी प्राकृतिक आपदा से बचे 94% लोगों ने माना कि उन्हें इस डर का कम से कम एक पहलू जरूर महसूस हुआ।

 

## डर से आक्रामकता तक का सफर

सबसे चौंकाने वाला नतीजा यह है कि अस्तित्वगत चिंता का सीधा संबंध आक्रामकता से भी पाया गया। किशोरों पर हुए एक अध्ययन में अस्तित्वगत चिंता प्रश्नावली नाम के एक टूल का इस्तेमाल किया गया, जिसमें ज्यादा गहरी अस्तित्वगत चिंता दो तरह की आक्रामकता से जुड़ी पाई गई, पहली प्रोएक्टिव यानी सोच-समझकर, बिना किसी उकसावे के की गई आक्रामकता, और दूसरी रिएक्टिव यानी किसी असली या समझे गए खतरे के जवाब में भड़कने वाली आक्रामकता। यही फर्क ऑनलाइन बहसों में साफ नजर आता है, जहां एक ही पोस्ट को कोई उकसावा या अपनी सोच पर सीधा हमला मान सकता है, और यहीं से कमेंट सेक्शन में भड़कने वाली रिएक्टिव आक्रामकता शुरू होती है।

 

## अलग-अलग राजनीति, एक जैसा डर

अस्तित्वगत चिंता को आज के ध्रुवीकरण से जोड़ने वाली सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसकी जड़ें लगभग हर किसी में एक जैसी होती हैं, भले ही हर व्यक्ति की सोच के हिसाब से इसे भड़काने वाली वजहें अलग-अलग हों। फीड के एक तरफ कुछ दोस्तों की पोस्ट में बुनियादी सुरक्षा, देश के भविष्य, संस्कृति के कमजोर पड़ने और पुरानी परंपराओं के खत्म होने की चिंता दिखती है। वहीं दूसरी तरफ के दोस्तों की पोस्ट में पर्यावरण के बर्बाद होने, लोकतंत्र के कमजोर पड़ने और बराबरी के खत्म होने का डर नजर आता है। दिखने में दोनों पोस्ट एक-दूसरे के बिल्कुल उलट हैं, लेकिन दोनों के भीतर एक ही गहरी चिंता छिपी है, समाज के भविष्य, मौत या पतन का डर, और एक सार्थक जीवनशैली के खत्म हो जाने का डर। दोनों तरफ एक बात अनकही रहती है, यह भरोसा कि "दूसरा पक्ष" उनके अस्तित्व के लिए सच में खतरा है। शोध बताता है कि इस तरह का छिपा डर आक्रामकता को बढ़ा सकता है, और अगर इसे काबू में न किया जाए तो यह असली हिंसा में भी बदल सकता है।

 

## क्या इस डर को शांत किया जा सकता है

शोध का उम्मीद जगाने वाला पहलू भी है। भले ही अस्तित्व से जुड़ा मूल डर पूरी तरह कभी खत्म न हो, लेकिन इसे पहचाना जा सकता है, कम किया जा सकता है, और सही दिशा में मोड़ा भी जा सकता है। कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी और एक्सेप्टेंस एंड कमिटमेंट थेरेपी जैसी तकनीकें साझा जमीन तलाशने और अस्तित्वगत डर को हिंसा में बदलने से रोकने का रास्ता दिखाती हैं। दोनों तकनीकों की बुनियाद एक ही है, डर को पहचानना और उसका सीधे सामना करना, बजाय उससे बचने के। ये तकनीकें लोगों को आम गलतियों से भी बचाती हैं, जैसे सिर्फ एक तरफ का सबूत देखना या हालात को असल से कहीं ज्यादा बुरा मान लेना। खासतौर पर एक्सेप्टेंस एंड कमिटमेंट थेरेपी लोगों को मानसिक लचीलापन सिखाती है, असहज विचारों और भावनाओं को सहने की आदत डालती है, और अपने मूल मूल्यों के मुताबिक काम करना सिखाती है, यह सब मिलकर विनाशकारी प्रतिक्रिया की बजाय सकारात्मक कदम की तरफ ले जाता है।

 

## बंटवारे के बीच उम्मीद की एक झलक

इतने शोर के बीच भी कभी-कभी लोग बंटवारे को पाटते हुए दिख जाते हैं। शोध में बताए एक वाकये में, एक यूजर ने दूसरे यूजर के कमेंट का शुक्रिया अदा किया क्योंकि उसकी बात से उसे समझ आया कि उस दूसरे शख्स के लिए उसका नजरिया अस्तित्व से जुड़ी कितनी बड़ी बात रखता है। इसके जवाब में दूसरे यूजर ने भी माना कि अब तक वह सिर्फ एक ही तरफ का पहलू देख रहा था। दोनों ने एक-दूसरे के अस्तित्वगत डर को पहचान लिया, और बस इतना पहचानना ही टकराव को शांत करने और बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए काफी था।

बड़ी बात यह है कि हर मुद्दे के हर पक्ष में खड़े लोग आखिरकार एक ही चीज चाहते हैं, सुरक्षा, मकसद और अपनेपन का एहसास। यह समझना कि ध्रुवीकृत डर के पीछे यही साझा अस्तित्वगत चिंताएं छिपी हैं, बंटवारे को पाटने और डर से उपजी आक्रामकता का खतरा कम करने की दिशा में एक अहम कदम हो सकता है।

## इसका आप पर असर
**आपके लिए इसका मतलब:**

- अगर आपकी अपनी सोशल मीडिया फीड पर राजनीतिक बहसें निजी हमले जैसी लगने लगती हैं, तो शोध बताता है कि यह गुस्सा अक्सर सुरक्षा और अर्थ को लेकर साझा गहरे डर से निकलता है, सिर्फ अलग राय से नहीं, और इसे समझना बहस को शांत करने में मदद कर सकता है।
- कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी और एक्सेप्टेंस एंड कमिटमेंट थेरेपी की सरल तकनीकें, जैसे भड़कने की बजाय अपने डर को पहचानना, ऑनलाइन भड़काऊ राजनीतिक कंटेंट से निपटने में आपके काम आ सकती हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. अस्तित्वगत चिंता क्या होती है?
यह मौत और भाग्य की अनिश्चितता, जिंदगी के अर्थहीन होने के डर, और नैतिक रूप से गलत होने की आशंका से जुड़ा एक बुनियादी मानवीय डर है, जिसे दार्शनिक पॉल टिलिच ने तीन हिस्सों में बांटा था।

### 2. यह डर कितना आम है?
अध्ययनों में 75% से 86% लोगों ने माना कि उन्हें इनमें से कम से कम एक तरह की अस्तित्वगत चिंता होती है, और किसी प्राकृतिक आपदा से बचे लोगों में यह आंकड़ा 94% तक पहुंच जाता है।

### 3. क्या अस्तित्वगत चिंता राजनीतिक ध्रुवीकरण की वजह है?
शोध बताता है कि दोनों तरफ के लोग, भले उनकी सोच अलग हो, असल में एक जैसा अस्तित्वगत डर महसूस करते हैं और "दूसरे पक्ष" को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानने लगते हैं।

### 4. क्या यह डर हिंसा तक ले जा सकता है?
हां, शोध के मुताबिक अगर इस छिपे डर को काबू में न किया जाए तो यह आक्रामकता को बढ़ाकर असली हिंसा में बदल सकता है।

### 5. इस तरह की राजनीतिक कड़वाहट को कम करने का तरीका क्या है?
कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी और एक्सेप्टेंस एंड कमिटमेंट थेरेपी जैसी तकनीकें डर को पहचानने, उसका सामना करने और मानसिक लचीलापन बढ़ाने में मदद करती हैं।

### 6. अस्तित्वगत चिंता के सिद्धांत के पीछे किसका शोध है?
इसका आधार 20वीं सदी के मध्य के दार्शनिक पॉल टिलिच की किताब द करेज टू बी में दिए गए विचार हैं।

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