# बच्चों के टिफिन में स्नैक्स की भरमार, लखनऊ के 200 बच्चों पर हुए अध्ययन ने बढ़ाई चिंता

> सेसम वर्कशॉप इंडिया के 'हेल्थी हैबिट्स' अभियान के तहत लखनऊ में 200 से अधिक बच्चों पर हुए अध्ययन में सामने आया कि बच्चे पौष्टिक भोजन छोड़कर पैकेटबंद स्नैक्स पर निर्भर होते जा रहे हैं, जिससे उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है।

**Type:** article · **Category:** स्वास्थ्य · **Published:** 2026-06-16 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/health/bachchon-ke-tiphina-men-snaiksa-ki-bharamara-lakhanau-ke-200-bachchon-para-hue-a-1284 · **Language:** Hindi
**Tags:** बच्चों का स्वास्थ्य, जंक फूड, हेल्थी हैबिट्स अभियान, Sesame Workshop India, बाल पोषण, लखनऊ अध्ययन, बच्चों में मोटापा, स्वस्थ जीवनशैली

घरों में बच्चों की थाली की जगह अब पैकेट तेजी से ले रहे हैं। चिप्स, नमकीन और तरह-तरह के पैकेटबंद स्नैक्स बच्चों की रोज़मर्रा की भूख मिटाने का सबसे आसान ज़रिया बनते जा रहे हैं। हालत यह है कि बहुत से बच्चे अब नियमित भोजन के बजाय इन्हीं स्नैक्स से पेट भर ले रहे हैं। जागरूकता अभियानों की कोई कमी नहीं है, फिर भी बड़ी संख्या में माता-पिता अपने बच्चों को इस अस्वास्थ्यकर आदत से बाहर नहीं निकाल पा रहे।

## स्नैक्स पर बढ़ती निर्भरता क्यों खतरनाक है
विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदत बच्चों के शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के विकास को नुकसान पहुंचा सकती है। साथ ही बच्चों में मोटापा भी तेज़ी से पैर पसार रहा है। एक तरफ़ खेलकूद की गतिविधियां घट रही हैं और दूसरी तरफ़ स्क्रीन के सामने बिताया जाने वाला समय लगातार बढ़ रहा है। यही असंतुलन आगे चलकर गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की वजह बन सकता है।

## क्या कहती हैं सोनाली खान
यह बात सेसम वर्कशॉप इंडिया की प्रबंध निदेशक सोनाली खान ने रखी। उनके मुताबिक उनकी संस्था लंबे समय से बच्चों और अभिभावकों के बीच जागरूकता फैलाने में जुटी हुई है। सेसमी स्ट्रीट और सेसम वर्कशॉप इंडिया के कार्यक्रम भारत समेत दुनिया के 150 से अधिक देशों में देखे जाते हैं। उन्होंने बताया कि संस्था जन्म से लेकर 8 वर्ष तक के बच्चों के विकास और शिक्षा पर काम करती है और स्टोरी टेलिंग, जागरूकता कार्यक्रमों तथा अलग-अलग गतिविधियों के ज़रिए बच्चों और उनके माता-पिता को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करती है।

इसी सोच के साथ संस्था ने अपने 'हेल्थी हैबिट्स' अभियान के तहत वर्ष 2025 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 200 से अधिक बच्चों पर एक अध्ययन किया। इस अभियान को उत्तर प्रदेश सरकार का भी सहयोग मिला।

## पोषण की दृष्टि से अधूरे साबित हो रहे स्नैक्स
अध्ययन में जो तस्वीर उभरी वह सोचने पर मजबूर करती है। कई माता-पिता बच्चों को ऐसे स्नैक्स थमा रहे हैं जो स्वाद में भले ही बढ़िया हों, पर पोषण के लिहाज़ से अधूरे हैं। लगातार इन्हें खाने की वजह से बच्चे सामान्य भोजन, हरी सब्ज़ियों और पौष्टिक आहार से कतराने लगे हैं। सोनाली खान का कहना है कि जब बच्चों को ज़रूरी पोषक तत्व ही नहीं मिलेंगे, तो उनके शरीर और दिमाग के विकास पर असर पड़ना तय है।

## वजन नहीं, सक्रियता है असली पैमाना
सोनाली खान ने एक अहम भ्रम भी तोड़ा। उन्होंने कहा कि किसी बच्चे का ज़्यादा वजन होना उसकी अच्छी सेहत या फिटनेस की गारंटी नहीं है, और इसी तरह हद से ज़्यादा दुबला होना भी स्वस्थ होने का संकेत नहीं माना जा सकता। असल बात यह है कि बच्चा कितना सक्रिय है और उसकी दिनचर्या कितनी संतुलित है। उनके अनुसार जन्म से 8 वर्ष तक का समय बच्चों के मस्तिष्क और शरीर के विकास के लिहाज़ से सबसे कीमती होता है। इसीलिए इस उम्र में माता-पिता को बच्चों के खानपान, दिनचर्या और गतिविधियों पर खास ध्यान देना चाहिए। उन्हें पर्याप्त समय देना, पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना और शारीरिक गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करना बेहद ज़रूरी है।

## खेलकूद और अच्छी आदतें ही बुनियाद
सोनाली खान ने बताया कि उनकी संस्था योग और दूसरी गतिविधियों के माध्यम से भी बच्चों में स्वस्थ आदतें विकसित करने की कोशिश कर रही है। उनका साफ़ कहना है कि बच्चों का नियमित खेलना-कूदना बहुत आवश्यक है, और इन अच्छी आदतों को गढ़ने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी माता-पिता पर ही है। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे बच्चों को बचपन से ही भोजन से पहले हाथ धोने, साफ़-सफ़ाई बनाए रखने, स्वच्छ कपड़े पहनने और संतुलित आहार लेने की आदत सिखाएं। उनका मानना है कि बचपन में सीखी गई अच्छी आदतें जीवनभर साथ निभाती हैं। यही वजह है कि बच्चों को जंक फूड और ढेर सारे स्नैक्स देने के बजाय पौष्टिक और संतुलित भोजन देना कहीं ज़्यादा फ़ायदेमंद है।

## इसका आप पर असर
- **भारत में:** अगर आपके बच्चे नियमित भोजन छोड़कर पैकेटबंद स्नैक्स पर निर्भर हैं तो जन्म से 8 वर्ष की उम्र में उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है, इसलिए घर में पौष्टिक और संतुलित आहार पर ध्यान दें।
- **लखनऊ में:** यहां 200 से अधिक बच्चों पर हुए अध्ययन से सीधा सबक यह है कि वजन नहीं बल्कि बच्चे की सक्रियता और संतुलित दिनचर्या ही उसकी असली सेहत का पैमाना है।

## सवाल-जवाब

### 1. यह अध्ययन कहां और कब किया गया?
यह अध्ययन वर्ष 2025 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 200 से अधिक बच्चों पर किया गया।

### 2. अध्ययन किस संस्था के अभियान के तहत हुआ?
यह सेसम वर्कशॉप इंडिया के 'हेल्थी हैबिट्स' अभियान के तहत किया गया और इसे उत्तर प्रदेश सरकार का सहयोग मिला।

### 3. अध्ययन में मुख्य रूप से क्या सामने आया?
सामने आया कि बहुत से बच्चे पौष्टिक भोजन के बजाय ऐसे स्नैक्स पर निर्भर हो रहे हैं जो स्वाद में अच्छे पर पोषण में अधूरे हैं।

### 4. सोनाली खान के अनुसार बच्चे की सेहत का असली पैमाना क्या है?
उनके अनुसार वजन कम या ज़्यादा होना नहीं, बल्कि बच्चा कितना सक्रिय है और उसकी जीवनशैली कितनी संतुलित है, यही असली पैमाना है।

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