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  "title": "बकरियों की सुस्त बढ़त से मुनाफा घटने का खतरा, पशु चिकित्सक ने बताया सही पोषण और देखभाल का तरीका",
  "summary": "लखीमपुर खीरी के राजकीय पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. हेमंत सिंह के अनुसार केवल भरपेट चारा खिलाना काफी नहीं है, बल्कि परजीवियों से बचाव और अवस्था के अनुकूल संतुलित दाना ही बकरियों का सही वजन बढ़ा सकता है।",
  "content": "गांवों में पशुपालन करने वाले परिवारों के लिए बकरियां नियमित आमदनी का एक मजबूत जरिया मानी जाती हैं, लेकिन अक्सर पशुपालक इस बात से परेशान रहते हैं कि भरपूर खुराक मिलने के बाद भी उनके मवेशियों का वजन नहीं बढ़ पा रहा है। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के ग्रामीण अंचलों में महिलाएं और छोटे किसान सीमित लागत तथा कम जगह में यह काम संभाल रहे हैं। बाजार में मटन और दूध की निरंतर मांग बनी रहने से पशुओं की बिक्री पर अच्छा मुनाफा संभव है, परंतु यदि बकरियों की शारीरिक बढ़त रुक जाए तो मंडी में खरीदार उनकी उचित कीमत नहीं लगाते। इस वित्तीय नुकसान से बचने के लिए पशुपालकों को चारे की पारंपरिक समझ से आगे बढ़कर वैज्ञानिक देखभाल अपनाने की जरूरत है।\n\nकेवल चरने से क्यों नहीं मिलता पूरा पोषण\nदेहात में आम तौर पर बकरियों को खुले मैदानों, मेड़ों या खेतों के आसपास चरने के लिए छोड़ दिया जाता है, जहां वे केवल घास-फूस या टहनियां खाती हैं। राजकीय पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. हेमंत सिंह का कहना है कि सिर्फ हरा चारा खा लेने से पेट तो भर जाता है, लेकिन आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति नहीं हो पाती। एक स्वस्थ जानवर के संपूर्ण शारीरिक विकास के लिए ताजे हरे चारे के साथ-साथ पर्याप्त सूखा चारा और पौष्टिक दाना मिश्रण देना अनिवार्य होता है। जब तक खुराक में ऊर्जा और प्रोटीन का उचित संतुलन नहीं होगा, तब तक मवेशी की मांसपेशियां मजबूत नहीं बनेंगी और उसका वजन सामान्य स्तर से नीचे ही बना रहेगा।\n\nउम्र और शारीरिक अवस्था के आधार पर तय करें आहार\nपशु चिकित्सक के मुताबिक हर उम्र की बकरी की शारीरिक जरूरतें एक जैसी नहीं होतीं। बढ़ती उम्र के मेमनों, दूध देने वाली बकरियों और गाभिन बकरियों की खुराक में अंतर रखना बेहद जरूरी है। गर्भावस्था के महीनों में मादा पशु के गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास के लिए अतिरिक्त पोषण की दरकार होती है। वहीं जिन बकरियों से दूध लिया जा रहा है, उन्हें भी साधारण दिनों के मुकाबले कहीं अधिक ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। यदि इस नाज़ुक दौर में उन्हें विशेष राशन नहीं दिया गया, तो उनका अपना वजन तेजी से गिरने लगेगा और दूध उत्पादन में भी भारी गिरावट दर्ज की जाएगी।\n\nपेट के कीड़े छीन लेते हैं पौष्टिक तत्व\nकई बार भरपूर आहार देने के बावजूद वजन न बढ़ने की सबसे बड़ी वजह आंतरिक परजीवी होते हैं। पेट में पनपने वाले कृमि पशु के खाए हुए भोजन के तमाम विटामिन्स और पोषक तत्वों को खुद सोख लेते हैं, जिससे जानवर धीरे-धीरे कमजोर होता चला जाता है। डॉ. हेमंत सिंह ने बताया कि बकरियों को लगभग तीन महीने के अंतराल पर पेट के कीड़ों की दवा देनी चाहिए। नियमित अंतराल पर कृमिनाशक दवा पिलाने से शरीर में मौजूद परजीवियों का खात्मा होता है और जो कुछ भी चारा दिया जाता है, उसका पूरा लाभ जानवर के शरीर को मिलता है।\n\nस्वच्छ पानी, टीकाकरण और बीमारी में सतर्कता\nअक्सर किसान केवल दाने-चारे पर ध्यान केंद्रित करते हैं और पीने के पानी की गुणवत्ता को अनदेखा कर देते हैं, जो एक बड़ी चूक साबित होती है। यदि पशु को पर्याप्त मात्रा में साफ पानी न मिले तो उसके पाचन तंत्र पर बुरा असर पड़ता है और उसकी भूख घट जाती है। इसके साथ ही संक्रामक बीमारियों से रक्षा के लिए समय सारिणी के मुताबिक टीके लगवाना, डॉक्टर की सलाह पर मिनरल मिक्सचर शामिल करना और नवजात मेमनों की शुरुआती अवस्था में अतिरिक्त देखरेख करना जरूरी है। यदि कोई बकरी अस्वस्थ नजर आए, तो संक्रमण फैलने से रोकने के लिए उसे फौरन बाकी झुंड से अलग कर देना चाहिए और बिना विशेषज्ञ की सलाह के मनमाने सप्लीमेंट देने से बचना चाहिए।\n\nइसका आप पर असर\nबकरियों के सही वजन प्रबंधन और स्वास्थ्य से जुड़े नियमों का पालन करने पर पशुपालक अपनी बिक्री आय में सीधा सुधार ला सकते हैं।\n\n• बाजार मूल्य पर: स्वस्थ और भारी बकरियां मंडियों में काफी ऊंचे दामों पर बिकती हैं। सही वजन मिलने से पशुपालक को औने-पौने दामों में मवेशी बेचने की मजबूरी नहीं रहती।\n• लागत नियंत्रण पर: तीन महीने में एक बार कीड़े की दवा देने का खर्च बहुत कम होता है। समय पर दवा देकर चारे की बर्बादी रोकी जा सकती है, जिससे हर दाने का पूरा लाभ शरीर को मिलता है।\n• दूध उत्पादन पर: गाभिन और दूध देने वाली बकरियों को अतिरिक्त पोषण देने से उनकी दूध देने की क्षमता बनी रहती है। इससे रोजमर्रा की घरेलू जरूरत पूरी होने के साथ अतिरिक्त दूध से कमाई भी बढ़ती है।\n• लखीमपुर खीरी में: ग्रामीण महिलाओं और छोटे किसानों की आजीविका सीधे तौर पर बकरियों की सेहत से बंधी है। पशु चिकित्सालय से मार्गदर्शन लेकर चलने पर बीमारी के कारण होने वाले भारी नुकसान से पूरी तरह बचा जा सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nग्रामीण क्षेत्रों में बकरियों का वजन अपेक्षा के अनुरूप न बढ़ने के पीछे पारंपरिक खानपान के तरीके और परजीवियों की अनदेखी प्रमुख वजह है।\n\n• असंतुलित आहार: अधिकांश पशुपालक बकरियों को केवल खुले में चरने या केवल हरे चारे पर छोड़ देते हैं। सिर्फ घास से पेट भर जाता है, परंतु शरीर निर्माण के लिए जरूरी सूखा चारा, दाना और खनिज लवण नहीं मिल पाते।\n• आंतरिक कृमि संक्रमण: पेट में मौजूद कीड़े बकरियों द्वारा खाए गए पोषक तत्वों को हजम कर जाते हैं। नियमित अंतराल पर दवा न दिए जाने से भरपूर चारा खाने के बाद भी पशु दुर्बल बना रहता है।\n• विशेष शारीरिक अवस्थाओं की उपेक्षा: गाभिन और दूध देने वाली बकरियों को साधारण बकरियों के बराबर ही खुराक दी जाती है। इस अतिरिक्त जैविक भार के समय अधिक पोषण न मिलने से उनका वजन तेजी से घटने लगता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. बकरियों को पेट के कीड़ों की दवा कितने दिनों के अंतराल पर देनी चाहिए?\nपशु चिकित्सक के अनुसार बकरियों को लगभग हर तीन महीने के अंतराल पर डॉक्टर की सलाह लेकर कृमिनाशक दवा पिलानी चाहिए।\n\n2. क्या सिर्फ हरा चारा खिलाने से बकरियों का पूरा विकास हो सकता है?\nनहीं, केवल हरे चारे से पेट भर सकता है लेकिन पोषक तत्व पूरे नहीं होते; अच्छे विकास के लिए सूखा चारा और दाना भी जरूरी है।\n\n3. गर्भवती और दूध देने वाली बकरियों की खुराक में क्या बदलाव करना चाहिए?\nगर्भावस्था और दूध देने के समय बकरियों को सामान्य दिनों के मुकाबले अतिरिक्त संतुलित पोषण और पौष्टिक दाना देना आवश्यक होता है।\n\n4. यदि कोई बकरी लगातार कमजोर हो रही हो तो पशुपालक को क्या कदम उठाना चाहिए?\nमनमाने सप्लीमेंट देने से बचते हुए तुरंत नजदीकी राजकीय पशु चिकित्सालय से संपर्क कर डॉक्टर की जांच के अनुसार इलाज कराना चाहिए।",
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  "category": "स्वास्थ्य",
  "publishedAt": "2026-10-09",
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